SP को ब्लास्ट में उड़ाया-अब पत्नी को लगता है डर:कहती है- बेटियां जवान हो गईं, कब वो उठाकर ले जाएंगे, नक्सलियों के गढ़ से रिपोर्ट

SP को ब्लास्ट में उड़ाया-अब पत्नी को लगता है डर:कहती है- बेटियां जवान हो गईं, कब वो उठाकर ले जाएंगे, नक्सलियों के गढ़ से रिपोर्ट

‘डर लगता था पुलिस कहीं एनकाउंटर न कर दे। वे घर आकर कहते- तुम्हारा पति जहां मिलेगा मार देंगे, तुम्हें घसीटकर पहाड़ पर ले जाएंगे। अपने पति का सरेंडर करा दो। पति नक्सली बना तो मुझे और मेरे बेटे को जेल जाना पड़ा। मैं जंगल गई, पति से मिलकर उसे सरेंडर के लिए मनाया।’ ‘आज वह जेल में है तो मुझे चैन है। खौफ भी है कि बाहर निकला तो नक्सलियों का कमांडर सुरेश मार डालेगा। वह किसी भी समय मुझे और मेरे बच्चों को मार सकता है। इसके चलते गांव से बाहर नहीं जाती। डर से सो नहीं पाती। बेटियां जवान हो गईं। लगता है पता नहीं कब वे आएंगे उठाकर ले जाएंगे।’ यह कहना है जमुई के चोरमारा गांव की मंगनी देवी का। पति बालेश्वर कोड़ा नक्सलियों का जोनल कमांडर था। SP केसी सुरेन्द्र बाबू और 5 अन्य लोगों को IED धमाका कर मार डालने में उसका हाथ था। 31 मार्च 2026 तक बिहार को पूरी तरह नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य है। ऐसे में हम बिहार के जमुई जिले के चोरमारा गांव से ग्राउंड रिपोर्ट लेकर आए हैं। यह कभी नक्सलियों का गढ़ था। यहां उनका ट्रेनिंग कैंप था। इस गांव में रह रहे पूर्व नक्सलियों के परिवारों की क्या हालत है? एसपी को मारने वाले नक्सलियों का क्या हुआ? गांव में नक्सलियों का कितना आतंक था? पढ़िए खास रिपोर्ट… सबसे पहले उस दिन की यादें, जब नक्सलियों ने SP केसी सुरेन्द्र की हत्या की दिन- 5 जनवरी, 2005। समय- शाम के करीब 6 बजे। मुंगेर और जमुई की पुलिस टीम नक्सलियों के खिलाफ संयुक्त ऑपरेशन कर लौट रही थी। सोनबरसा से पेसरा जाने वाले रास्ते पर नक्सलियों ने जमीन के नीचे IED लगाया था। मुंगेर के एसपी केसी सुरेंद्र बाबू की गाड़ी भीम बांध से जैसे ही आगे बढ़ी भीषण विस्फोट हो गया। धमाके की चपेट में आकर एसपी और इनके साथ मौजूद 5 अन्य लोग (ड्राइवर इस्लाम और पुलिसकर्मी ओमप्रकाश गुप्ता, अब्दुल कलाम, शिव कुमार और ध्रुव कुमार) मारे गए। शवों की हालत ऐसी थी कि किसी को पहचान पाना भी मुश्किल था। इसके बाद नक्सलियों ने पोस्टर चिपकाए कि हमारे इलाके में घुसने और हमें छेड़ने की कोशिश करने वाले का यही हाल होगा। घटना के 20 साल बाद इसमें शामिल 3 नक्सलियों ने सरेंडर किया है। ये थे जोनल कमांडर नारायण कोड़ा, सब जोनल कमांडर बहादुर कोड़ा और विनोद कोड़ा। तीनों पर 3-3 लाख रुपए इनाम था। इस घटना में शामिल अन्य नक्सली जोनल कमांडर बालेश्वर कोड़ा और एरिया कमांडर अर्जुन कोड़ा चोरमारा गांव के रहने वाले हैं। अर्जुन, बालेश्वर, नागेश्वर और सुरेंद्र कोड़ा ने सरेंडर कर दिया है। नक्सलियों के लिए सेफ जोन था भीम बांध से लगा इलाका भीमबांध के पास का जंगल वाला इलाका नक्सलियों के लिए सेफ जोन था। यहां चोरमारा गांव है, जहां नक्सली ट्रेनिंग कैंप चलाते थे। इसके आसपास के करीब दर्जन भर गांव पर नक्सलियों का कब्जा था। यहां उनकी सरकार चलती। उनके कोर्ट (जन अदालत) लगते। इस इलाके के नक्सलियों ने किऊल-जसीडीह रेलखंड के कुंदर हाल्ट के समीप इंटरसिटी एक्सप्रेस पर हमला, 2011 में कजरा के जंगल में सुरक्षाबलों पर हमला, किऊल-भागलपुर रेलखंड के जमालपुर के समीप ट्रेन पर हमला और जमुई के मलयपुर में सोना कारोबारी के घर लूटपाट जैसी घटनाओं को अंजाम दिया था। इन नक्सलियों ने नक्सली नेता प्रवेश को पुलिस से छुड़ाने सहित कई बड़े वारदात किए थे। नक्सलियों के गढ़ चोरमारा की हालत, बिजली के पोल, लेकिन तार नहीं नक्सलियों का गढ़ रहा चोरमारा गांव अब नक्सल मुक्त है। यहां की जमीनी स्थिति जानने के लिए हम पटना से करीब 150 km दूर जमुई पहुंचे। यहां से लक्ष्मीपुर गए। इसके आगे जंगल के बीच से गुजरे। भीमबांध के बाद कच्चा रास्ता है। जंगल इतना घना कि चंद मीटर के आगे कुछ नजर न आए। रास्ता एकदम सुनसान। कुछ किलोमीटर आगे बढ़े तो एक स्थानीय व्यक्ति नजर आए। हमने चोरमारा गांव का रास्ता पूछा तो उन्होंने इशारे से बताया। साथ में हिदायत दी, अंधेरा होने से पहले लौट आइएगा। हम भीमबांध से जैसे आगे बढ़े, मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और घने जंगल के बीच रास्ता एकदम सुनसान। हम चोरमारा गांव पहुंचे तो देखा कि अधिकतर घर खपरैल और मिट्टी के हैं। चंद पक्के मकान हैं। गांव के सभी लोग आदिवासी हैं। बिजली के खंभे तो हैं, लेकिन इन पर बिजली के तार नहीं। लोगों के घरों के सामने सोलर प्लेट लगे दिखे। इस गांव के तीन हार्डकोर नक्सली थे। एरिया कमांडर अर्जुन कोड़ा, जोनल कमांडर बालेश्वर कोड़ा और सुरेंद्र कोड़ा। गांव के सरकारी स्कूल में बच्चे पढ़ने जाते थे तो इन तीनों ने उसे बम लगाकर उड़ा दिया था। जोनल कमांडर बालेश्वर कोड़ा की पत्नी को डर, कभी भी हो सकती है हत्या सबसे पहले हमने नक्सलियों के परिवार वालों से बात की। इसके लिए जोनल कमांडर रहे बालेश्वर कोड़ा के घर पहुंचे। उसका घर CRPF कैंप के ठीक सामने है। दरवाजे पर बालेश्वर की पत्नी मंगनी देवी और उसका बड़ा बेटा संजय कोड़ा मिले। हमने दोनों से बात की। मंगनी देवी से जाना कि बालेश्वर कैसे नक्सली बना? जब नक्सली था तब जीवन कैसा था? उसे सरेंडर के लिए कैसे तैयार किया? आगे पढ़ें जैसा मंगनी देवी ने बताया… बेटियां जवान हो गईं, कैसे शादी करूंगी, पता नहीं मेरे पति ने सरेंडर तो कर दिया, लेकिन हमें डर रहता है कि नक्सलियों का कमांडर सुरेश मार देगा। पति के सरेंडर करने से सुरेश नाराज है। मेरे परिवार का कोई भी आदमी गांव से बाहर नहीं जाता। बेटियां जवान हो गईं हैं। खौफ में रहते है कि पता नहीं कब वे आएंगे और उठाकर ले जाएंगे। उनकी शादी करनी है। पता नहीं कैसे होगी? उनके लिए लड़का खोजने नहीं निकल पा रही हूं। मेरी शादी बहुत छोटी उम्र में हो गई थी। पति खेती करता था। बच्चे छोटे-छोटे थे तभी वह नक्सलियों के साथ चला गया। बीरबल नाम का नक्सली मेरे पति को अपने साथ ले गया था। बीरबल गांव आता था। पति से मिलता था। जब वह गया तो मुझे पता नहीं था कि नक्सलियों की पार्टी में शामिल होने जा रहा है। वह 30 साल नक्सलियों के साथ रहा। कभी गांव आता भी तो घर नहीं आता था। पति के नक्सली बनने के बाद घर की हालत खराब हो गई। मुझे बच्चों को मायके भेजना पड़ा। दूसरे के खेतों में मजदूरी कर घर चलाती थी। छोटे-छोटे बच्चे थे। पूछते थे कि पापा कहां हैं। पुलिस परेशान करती थी। पुलिस ने मुझे और मेरे बेटे को केस में फंसा दिया। हम दोनों नक्सलियों की मदद के आरोप में 1 साल जेल में रहे। घर की कुर्की जब्ती की गई। दरवाजा तक तोड़ दिया गया। पुलिस कहती थी तुम्हारा पति जहां दिखेगा मार देंगे मुझे डर था कि कहीं पुलिस एनकाउंटर न कर दे। पुलिस के लोग कहते कि तुम्हारा पति जहां मिलेगा, वहीं मार देंगे। तुम्हें घसीटकर पहाड़ पर ले जाएंगे। अन्यथा, पति का सरेंडर करवा दो। गांव के ही अर्जुन कोड़ा की पत्नी उससे मिलती थी। जब पुलिस तंग करने लगी तो मैं उसकी मदद लेकर अपने पति से मिली। मेरा पति इसी जंगल में रहता था, लेकिन मुझसे नहीं मिलता था। मैं अपनी पति से मिली और कहा कि तुम्हारे चलते पूरा परिवार परेशान है। घर से सारा सामान पुलिस ले गई। मुझे और बेटे को पुलिस बार-बार पकड़कर जेल में बंद कर रही है। उसे काफी समझाया। वह जब भी पास के जंगल में आता तो जाकर मिलती। काफी समझा-बुझाकर उसे सरेंडर के लिए मनाया। वह पहले तैयार नहीं था। बोल रहा था कि सरेंडर किया तो पुलिस मार देगी। पति के सरेंडर करने के बाद बाकी नक्सली परेशान करने लगे। हम कहीं बाहर नहीं जाते। मैं और हमारे बच्चे गांव में ही रहते हैं। नक्सली अभी भी धमकी देते हैं। कहते हैं कि तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को मार देंगे। डर के मारे सो नहीं पाती हूं। खेती-बाड़ी कर घर चलाती हूं। सरेंडर के बाद सरकार की तरफ से मिलने वाले इनाम को लेकर मंगनी देवी ने बताया कि मेरे पति पर 50 हजार रुपए इनाम था। उतना पैसा ही मिला है। सरेंडर करने पर 3 लाख रुपए देने की बात हुई थी। वह पैसा अभी नहीं मिला है। पति ने सरेंडर किया तब एक चेक की फोटो कॉपी हमें दी गई। पुलिस ने ओरिजिनल चेक रख लिया। कहा था कि सरेंडर के 3 साल पूरा होने के बाद पैसे मिल जाएंगे। मेरे पति नक्सली थे तब से आज जीवन थोड़ा बेहतर है। मन में शांति रहती है कि कम से कम वह सुरक्षित तो हैं। साथ ही डर लगा रहता है कि नक्सली मेरी या मेरे बेटे की हत्या कर देंगे। पहले पुलिस धमकी देती कि पति को मार देंगे। अब नक्सली धमकी देते हैं। मुंगेर और जमुई जाने में डर लगता है। अब उतने नक्सली तो नहीं, लेकिन पूरी तरह खत्म भी नहीं हुए हैं। हमने बालेश्वर कोड़ा के बड़े बेटे संजय कोड़ा से बात की। वह वन विभाग में गार्ड हैं। संजय ने कहा, हमने अपने पिता को मिस किया है। मुझे संजय कोड़ा से डर लगता है। वह धमकी देता है। कहता है कि कहीं अकेले मिल गया तो मार दूंगा।’ AK-47 लिए नक्सली घर में घुसे, पति से कहा- साथ चलो नहीं तो परिवार खत्म कर देंगे हमने गांव के दूसरे पूर्व नक्सली अर्जुन कोड़ा की पत्नी सरस्वती देवी से बात की। सरस्वती ने बताया… मेरा पति नक्सली नहीं बनना चाहता था। करीब 20 साल पहले की बात है। गांव में नक्सली आते थे। वे किसी के भी घर पहुंच जाते और खाना बनाने के लिए बोलते थे। ऐसे ही मेरे घर भी आकर खाना के लिए ऑर्डर करते थे। घर पर एक साथ 50-60 नक्सली आते और खाना खाते थे। अर्जुन ने सरकार की मदद से आटा चक्की शुरू की। इसके बाद नक्सलियों ने कहना शुरू किया कि अर्जुन पुलिस के लिए मुखबिरी कर रहा है। पहले तो नक्सलियों ने अर्जुन की पिटाई की। कहा कि सरकार से कुछ नहीं लेना है। इसके बाद भी उसने चक्की चलाना बंद नहीं किया तो एक रात 40 से अधिक नक्सली घर में घुस आए। सभी के हाथ में AK-47 और ड्रेस के पैकेट में गोलियां थी। उनलोगों ने अर्जुन को नींद से जगाया। कहा कि पार्टी के साथ चलो। नहीं चलोगे तो पूरे परिवार को मार देंगे। डर के मारे मेरा पति नक्सलियों के साथ चला गया। इसके बाद वह घर नहीं आता था। कई घटनाओं में उसका नाम जुड़ा तो पुलिस उसे खोजने लगी। पुलिस कहती थी कि सरेंडर करा दो, नहीं तो जहां मिलेगा वहीं मार देंगे। मैं डर गई थी। पुलिस घर के सारे सामान, यहां तक कि खिड़की-दरवाजा तक उखाड़ ले गई। पुलिस आती तो मैं बच्चों को लेकर जंगल में भाग जाती थी। एक दिन मुझे जानकारी मिली कि अर्जुन पास के गांव में खाना खाने आया है। मैं जाकर उससे मिली। अर्जुन को सरेंडर करने के लिए मनाने लगी। वह पहले तैयार नहीं था। मुझपर विश्वास नहीं कर रहा था। बोल रहा था कि मुझे मरवा दोगी। मैंने उसे पूरा विश्वास दिलाया। कहा कि मैं भी साथ चलूंगी। वह मुझसे प्रेम करता था। कहीं भी रहता था तो मिलने आ ही जाता था। काफी समझाने पर वह सरेंडर के लिए तैयार हुआ। अर्जुन पर 50 हजार रुपए इनाम था। सरेंडर के बाद वह पैसा मिला। बाकी 3 लाख रुपए 3 साल बाद मिलेंगे। अब जीवन में शांति है। 30 साल तक चोरमारा गांव में चली नक्सलियों की सरकार चोरमारा में नक्सलियों का कितना आतंक था। यह जानने के लिए हमने गांव के नागेश्वर कोड़ा से बात की। उन्होंने कहा, ‘यहां करीब 30 साल तक नक्सलियों का कब्जा था। उनकी अपनी सरकार चलती थी। अपने नियम थे। जो आदमी उनके नियम को नहीं मानता, उसे जन अदालत लगाकर सबके सामने मार डाला जाता था।’ नागेश्वर ने कहा, ‘इस इलाके के गुरमाहा, कारमेग, बेलाबाकम, जमुनियाटाड़, पेसरा सहित दर्जन भर गांव नक्सल प्रभावित थे। जब से गांव में CRPF कैंप बना है, हमलोग शांति से रह रहे हैं। नक्सलियों की गतिविधि कम हुई है। अगर CRPF कैंप हट जाए तो यहां फिर से नक्सलियों का तांडव शुरू हो जाएगा। नक्सलियों की सोच थी कि हमारी ही सरकार चलेगी। हमारा मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री होगा। हमारे नियम होंगे।’ रात में ठीक से सोते नहीं थे, डर लगता था कि पता नहीं कब नक्सली आ जाएं हमने ग्रामीण रघुनाथ कोड़ा से बात की। उन्होंने बताया, ‘मैं खेती करता हूं। पहले यह गांव पूरी तरह नक्सल प्रभावित था। हमलोग रात में ठीक से सो नहीं पाते थे। डर लगा रहता था कि पता नहीं कब नक्सली आ जाएं।’ गांव के पास था नक्सलियों का ट्रेनिंग सेंटर हमने रामविलास कोड़ा से बात की। उन्होंने कहा, ‘इस गांव के पास में नक्सलियों का ट्रेनिंग सेंटर था। गांव में नक्सलियों का इतना आतंक था कि जो बोल दिया वह करना ही है। पहाड़ पर खाना-पानी मंगवाते थे। नहीं दिया तो घर से खींचकर सबके सामने पीटते थे।’ उन्होंने कहा, ‘बात नहीं मानने पर सबके सामने शारदा देवी को मार दिया। नक्सली गांव के लड़कों को जबरदस्ती अपनी पार्टी में शामिल करते थे।’ क्या है चोरमारा गांव की वर्तमान स्थिति? नागेश्वर कोड़ा ने बताया, ‘2 फरवरी 2022 को गांव में CRPF कैंप बना तब से यहां शांति है। आज हमलोग नक्सलियों से तो परेशान नहीं हैं, लेकिन पूरी दुनिया से कटे हैं। चारों तरफ जंगल और पहाड़ है। गांव में न बिजली है, न मोबाइल नेटवर्क।’ उन्होंने कहा, ‘जब नक्सली एक्टिव थे तो हमें पढ़ने नहीं देते थे। सरकार गांव में स्कूल बनाती तो नक्सली बम लगाकर उसे उड़ा देते थे। आज हमारे गांव में स्कूल है। बच्चे पढ़ने जाते हैं, लेकिन 5वीं के बाद स्कूल नहीं है। इसके चलते आगे की पढ़ाई में दिक्कत होती है।’ गांव के लोगों के दिलों में खौफ, CRPF कैंप हटा तो क्या होगा चोरमारा गांव में हमने जितने लोगों से बात कि सभी इससे खुश दिखे कि गांव में CRPF कैंप है। इसके साथ ही उनके दिलों में खौफ भी है कि अगर कैंप हट गया तो क्या होगा। ग्रामीणों ने बताया कि कई नक्सली मारे गए हैं। कुछ ने सरेंडर किया है, लेकिन अभी भी सुरेश कोड़ा और उसके कई साथी अंडरग्राउंड हैं। CRPF कैंप से गांव के लोगों को कई सुविधाएं मिलती हैं। कोई बीमार पड़े तो यहां प्राथमिक इलाज होता है। इसके बाद उसे हॉस्पिटल पहुंचाया जाता है। ‘डर लगता था पुलिस कहीं एनकाउंटर न कर दे। वे घर आकर कहते- तुम्हारा पति जहां मिलेगा मार देंगे, तुम्हें घसीटकर पहाड़ पर ले जाएंगे। अपने पति का सरेंडर करा दो। पति नक्सली बना तो मुझे और मेरे बेटे को जेल जाना पड़ा। मैं जंगल गई, पति से मिलकर उसे सरेंडर के लिए मनाया।’ ‘आज वह जेल में है तो मुझे चैन है। खौफ भी है कि बाहर निकला तो नक्सलियों का कमांडर सुरेश मार डालेगा। वह किसी भी समय मुझे और मेरे बच्चों को मार सकता है। इसके चलते गांव से बाहर नहीं जाती। डर से सो नहीं पाती। बेटियां जवान हो गईं। लगता है पता नहीं कब वे आएंगे उठाकर ले जाएंगे।’ यह कहना है जमुई के चोरमारा गांव की मंगनी देवी का। पति बालेश्वर कोड़ा नक्सलियों का जोनल कमांडर था। SP केसी सुरेन्द्र बाबू और 5 अन्य लोगों को IED धमाका कर मार डालने में उसका हाथ था। 31 मार्च 2026 तक बिहार को पूरी तरह नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य है। ऐसे में हम बिहार के जमुई जिले के चोरमारा गांव से ग्राउंड रिपोर्ट लेकर आए हैं। यह कभी नक्सलियों का गढ़ था। यहां उनका ट्रेनिंग कैंप था। इस गांव में रह रहे पूर्व नक्सलियों के परिवारों की क्या हालत है? एसपी को मारने वाले नक्सलियों का क्या हुआ? गांव में नक्सलियों का कितना आतंक था? पढ़िए खास रिपोर्ट… सबसे पहले उस दिन की यादें, जब नक्सलियों ने SP केसी सुरेन्द्र की हत्या की दिन- 5 जनवरी, 2005। समय- शाम के करीब 6 बजे। मुंगेर और जमुई की पुलिस टीम नक्सलियों के खिलाफ संयुक्त ऑपरेशन कर लौट रही थी। सोनबरसा से पेसरा जाने वाले रास्ते पर नक्सलियों ने जमीन के नीचे IED लगाया था। मुंगेर के एसपी केसी सुरेंद्र बाबू की गाड़ी भीम बांध से जैसे ही आगे बढ़ी भीषण विस्फोट हो गया। धमाके की चपेट में आकर एसपी और इनके साथ मौजूद 5 अन्य लोग (ड्राइवर इस्लाम और पुलिसकर्मी ओमप्रकाश गुप्ता, अब्दुल कलाम, शिव कुमार और ध्रुव कुमार) मारे गए। शवों की हालत ऐसी थी कि किसी को पहचान पाना भी मुश्किल था। इसके बाद नक्सलियों ने पोस्टर चिपकाए कि हमारे इलाके में घुसने और हमें छेड़ने की कोशिश करने वाले का यही हाल होगा। घटना के 20 साल बाद इसमें शामिल 3 नक्सलियों ने सरेंडर किया है। ये थे जोनल कमांडर नारायण कोड़ा, सब जोनल कमांडर बहादुर कोड़ा और विनोद कोड़ा। तीनों पर 3-3 लाख रुपए इनाम था। इस घटना में शामिल अन्य नक्सली जोनल कमांडर बालेश्वर कोड़ा और एरिया कमांडर अर्जुन कोड़ा चोरमारा गांव के रहने वाले हैं। अर्जुन, बालेश्वर, नागेश्वर और सुरेंद्र कोड़ा ने सरेंडर कर दिया है। नक्सलियों के लिए सेफ जोन था भीम बांध से लगा इलाका भीमबांध के पास का जंगल वाला इलाका नक्सलियों के लिए सेफ जोन था। यहां चोरमारा गांव है, जहां नक्सली ट्रेनिंग कैंप चलाते थे। इसके आसपास के करीब दर्जन भर गांव पर नक्सलियों का कब्जा था। यहां उनकी सरकार चलती। उनके कोर्ट (जन अदालत) लगते। इस इलाके के नक्सलियों ने किऊल-जसीडीह रेलखंड के कुंदर हाल्ट के समीप इंटरसिटी एक्सप्रेस पर हमला, 2011 में कजरा के जंगल में सुरक्षाबलों पर हमला, किऊल-भागलपुर रेलखंड के जमालपुर के समीप ट्रेन पर हमला और जमुई के मलयपुर में सोना कारोबारी के घर लूटपाट जैसी घटनाओं को अंजाम दिया था। इन नक्सलियों ने नक्सली नेता प्रवेश को पुलिस से छुड़ाने सहित कई बड़े वारदात किए थे। नक्सलियों के गढ़ चोरमारा की हालत, बिजली के पोल, लेकिन तार नहीं नक्सलियों का गढ़ रहा चोरमारा गांव अब नक्सल मुक्त है। यहां की जमीनी स्थिति जानने के लिए हम पटना से करीब 150 km दूर जमुई पहुंचे। यहां से लक्ष्मीपुर गए। इसके आगे जंगल के बीच से गुजरे। भीमबांध के बाद कच्चा रास्ता है। जंगल इतना घना कि चंद मीटर के आगे कुछ नजर न आए। रास्ता एकदम सुनसान। कुछ किलोमीटर आगे बढ़े तो एक स्थानीय व्यक्ति नजर आए। हमने चोरमारा गांव का रास्ता पूछा तो उन्होंने इशारे से बताया। साथ में हिदायत दी, अंधेरा होने से पहले लौट आइएगा। हम भीमबांध से जैसे आगे बढ़े, मोबाइल नेटवर्क गायब हो गया। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों और घने जंगल के बीच रास्ता एकदम सुनसान। हम चोरमारा गांव पहुंचे तो देखा कि अधिकतर घर खपरैल और मिट्टी के हैं। चंद पक्के मकान हैं। गांव के सभी लोग आदिवासी हैं। बिजली के खंभे तो हैं, लेकिन इन पर बिजली के तार नहीं। लोगों के घरों के सामने सोलर प्लेट लगे दिखे। इस गांव के तीन हार्डकोर नक्सली थे। एरिया कमांडर अर्जुन कोड़ा, जोनल कमांडर बालेश्वर कोड़ा और सुरेंद्र कोड़ा। गांव के सरकारी स्कूल में बच्चे पढ़ने जाते थे तो इन तीनों ने उसे बम लगाकर उड़ा दिया था। जोनल कमांडर बालेश्वर कोड़ा की पत्नी को डर, कभी भी हो सकती है हत्या सबसे पहले हमने नक्सलियों के परिवार वालों से बात की। इसके लिए जोनल कमांडर रहे बालेश्वर कोड़ा के घर पहुंचे। उसका घर CRPF कैंप के ठीक सामने है। दरवाजे पर बालेश्वर की पत्नी मंगनी देवी और उसका बड़ा बेटा संजय कोड़ा मिले। हमने दोनों से बात की। मंगनी देवी से जाना कि बालेश्वर कैसे नक्सली बना? जब नक्सली था तब जीवन कैसा था? उसे सरेंडर के लिए कैसे तैयार किया? आगे पढ़ें जैसा मंगनी देवी ने बताया… बेटियां जवान हो गईं, कैसे शादी करूंगी, पता नहीं मेरे पति ने सरेंडर तो कर दिया, लेकिन हमें डर रहता है कि नक्सलियों का कमांडर सुरेश मार देगा। पति के सरेंडर करने से सुरेश नाराज है। मेरे परिवार का कोई भी आदमी गांव से बाहर नहीं जाता। बेटियां जवान हो गईं हैं। खौफ में रहते है कि पता नहीं कब वे आएंगे और उठाकर ले जाएंगे। उनकी शादी करनी है। पता नहीं कैसे होगी? उनके लिए लड़का खोजने नहीं निकल पा रही हूं। मेरी शादी बहुत छोटी उम्र में हो गई थी। पति खेती करता था। बच्चे छोटे-छोटे थे तभी वह नक्सलियों के साथ चला गया। बीरबल नाम का नक्सली मेरे पति को अपने साथ ले गया था। बीरबल गांव आता था। पति से मिलता था। जब वह गया तो मुझे पता नहीं था कि नक्सलियों की पार्टी में शामिल होने जा रहा है। वह 30 साल नक्सलियों के साथ रहा। कभी गांव आता भी तो घर नहीं आता था। पति के नक्सली बनने के बाद घर की हालत खराब हो गई। मुझे बच्चों को मायके भेजना पड़ा। दूसरे के खेतों में मजदूरी कर घर चलाती थी। छोटे-छोटे बच्चे थे। पूछते थे कि पापा कहां हैं। पुलिस परेशान करती थी। पुलिस ने मुझे और मेरे बेटे को केस में फंसा दिया। हम दोनों नक्सलियों की मदद के आरोप में 1 साल जेल में रहे। घर की कुर्की जब्ती की गई। दरवाजा तक तोड़ दिया गया। पुलिस कहती थी तुम्हारा पति जहां दिखेगा मार देंगे मुझे डर था कि कहीं पुलिस एनकाउंटर न कर दे। पुलिस के लोग कहते कि तुम्हारा पति जहां मिलेगा, वहीं मार देंगे। तुम्हें घसीटकर पहाड़ पर ले जाएंगे। अन्यथा, पति का सरेंडर करवा दो। गांव के ही अर्जुन कोड़ा की पत्नी उससे मिलती थी। जब पुलिस तंग करने लगी तो मैं उसकी मदद लेकर अपने पति से मिली। मेरा पति इसी जंगल में रहता था, लेकिन मुझसे नहीं मिलता था। मैं अपनी पति से मिली और कहा कि तुम्हारे चलते पूरा परिवार परेशान है। घर से सारा सामान पुलिस ले गई। मुझे और बेटे को पुलिस बार-बार पकड़कर जेल में बंद कर रही है। उसे काफी समझाया। वह जब भी पास के जंगल में आता तो जाकर मिलती। काफी समझा-बुझाकर उसे सरेंडर के लिए मनाया। वह पहले तैयार नहीं था। बोल रहा था कि सरेंडर किया तो पुलिस मार देगी। पति के सरेंडर करने के बाद बाकी नक्सली परेशान करने लगे। हम कहीं बाहर नहीं जाते। मैं और हमारे बच्चे गांव में ही रहते हैं। नक्सली अभी भी धमकी देते हैं। कहते हैं कि तुम्हें और तुम्हारे बच्चों को मार देंगे। डर के मारे सो नहीं पाती हूं। खेती-बाड़ी कर घर चलाती हूं। सरेंडर के बाद सरकार की तरफ से मिलने वाले इनाम को लेकर मंगनी देवी ने बताया कि मेरे पति पर 50 हजार रुपए इनाम था। उतना पैसा ही मिला है। सरेंडर करने पर 3 लाख रुपए देने की बात हुई थी। वह पैसा अभी नहीं मिला है। पति ने सरेंडर किया तब एक चेक की फोटो कॉपी हमें दी गई। पुलिस ने ओरिजिनल चेक रख लिया। कहा था कि सरेंडर के 3 साल पूरा होने के बाद पैसे मिल जाएंगे। मेरे पति नक्सली थे तब से आज जीवन थोड़ा बेहतर है। मन में शांति रहती है कि कम से कम वह सुरक्षित तो हैं। साथ ही डर लगा रहता है कि नक्सली मेरी या मेरे बेटे की हत्या कर देंगे। पहले पुलिस धमकी देती कि पति को मार देंगे। अब नक्सली धमकी देते हैं। मुंगेर और जमुई जाने में डर लगता है। अब उतने नक्सली तो नहीं, लेकिन पूरी तरह खत्म भी नहीं हुए हैं। हमने बालेश्वर कोड़ा के बड़े बेटे संजय कोड़ा से बात की। वह वन विभाग में गार्ड हैं। संजय ने कहा, हमने अपने पिता को मिस किया है। मुझे संजय कोड़ा से डर लगता है। वह धमकी देता है। कहता है कि कहीं अकेले मिल गया तो मार दूंगा।’ AK-47 लिए नक्सली घर में घुसे, पति से कहा- साथ चलो नहीं तो परिवार खत्म कर देंगे हमने गांव के दूसरे पूर्व नक्सली अर्जुन कोड़ा की पत्नी सरस्वती देवी से बात की। सरस्वती ने बताया… मेरा पति नक्सली नहीं बनना चाहता था। करीब 20 साल पहले की बात है। गांव में नक्सली आते थे। वे किसी के भी घर पहुंच जाते और खाना बनाने के लिए बोलते थे। ऐसे ही मेरे घर भी आकर खाना के लिए ऑर्डर करते थे। घर पर एक साथ 50-60 नक्सली आते और खाना खाते थे। अर्जुन ने सरकार की मदद से आटा चक्की शुरू की। इसके बाद नक्सलियों ने कहना शुरू किया कि अर्जुन पुलिस के लिए मुखबिरी कर रहा है। पहले तो नक्सलियों ने अर्जुन की पिटाई की। कहा कि सरकार से कुछ नहीं लेना है। इसके बाद भी उसने चक्की चलाना बंद नहीं किया तो एक रात 40 से अधिक नक्सली घर में घुस आए। सभी के हाथ में AK-47 और ड्रेस के पैकेट में गोलियां थी। उनलोगों ने अर्जुन को नींद से जगाया। कहा कि पार्टी के साथ चलो। नहीं चलोगे तो पूरे परिवार को मार देंगे। डर के मारे मेरा पति नक्सलियों के साथ चला गया। इसके बाद वह घर नहीं आता था। कई घटनाओं में उसका नाम जुड़ा तो पुलिस उसे खोजने लगी। पुलिस कहती थी कि सरेंडर करा दो, नहीं तो जहां मिलेगा वहीं मार देंगे। मैं डर गई थी। पुलिस घर के सारे सामान, यहां तक कि खिड़की-दरवाजा तक उखाड़ ले गई। पुलिस आती तो मैं बच्चों को लेकर जंगल में भाग जाती थी। एक दिन मुझे जानकारी मिली कि अर्जुन पास के गांव में खाना खाने आया है। मैं जाकर उससे मिली। अर्जुन को सरेंडर करने के लिए मनाने लगी। वह पहले तैयार नहीं था। मुझपर विश्वास नहीं कर रहा था। बोल रहा था कि मुझे मरवा दोगी। मैंने उसे पूरा विश्वास दिलाया। कहा कि मैं भी साथ चलूंगी। वह मुझसे प्रेम करता था। कहीं भी रहता था तो मिलने आ ही जाता था। काफी समझाने पर वह सरेंडर के लिए तैयार हुआ। अर्जुन पर 50 हजार रुपए इनाम था। सरेंडर के बाद वह पैसा मिला। बाकी 3 लाख रुपए 3 साल बाद मिलेंगे। अब जीवन में शांति है। 30 साल तक चोरमारा गांव में चली नक्सलियों की सरकार चोरमारा में नक्सलियों का कितना आतंक था। यह जानने के लिए हमने गांव के नागेश्वर कोड़ा से बात की। उन्होंने कहा, ‘यहां करीब 30 साल तक नक्सलियों का कब्जा था। उनकी अपनी सरकार चलती थी। अपने नियम थे। जो आदमी उनके नियम को नहीं मानता, उसे जन अदालत लगाकर सबके सामने मार डाला जाता था।’ नागेश्वर ने कहा, ‘इस इलाके के गुरमाहा, कारमेग, बेलाबाकम, जमुनियाटाड़, पेसरा सहित दर्जन भर गांव नक्सल प्रभावित थे। जब से गांव में CRPF कैंप बना है, हमलोग शांति से रह रहे हैं। नक्सलियों की गतिविधि कम हुई है। अगर CRPF कैंप हट जाए तो यहां फिर से नक्सलियों का तांडव शुरू हो जाएगा। नक्सलियों की सोच थी कि हमारी ही सरकार चलेगी। हमारा मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री होगा। हमारे नियम होंगे।’ रात में ठीक से सोते नहीं थे, डर लगता था कि पता नहीं कब नक्सली आ जाएं हमने ग्रामीण रघुनाथ कोड़ा से बात की। उन्होंने बताया, ‘मैं खेती करता हूं। पहले यह गांव पूरी तरह नक्सल प्रभावित था। हमलोग रात में ठीक से सो नहीं पाते थे। डर लगा रहता था कि पता नहीं कब नक्सली आ जाएं।’ गांव के पास था नक्सलियों का ट्रेनिंग सेंटर हमने रामविलास कोड़ा से बात की। उन्होंने कहा, ‘इस गांव के पास में नक्सलियों का ट्रेनिंग सेंटर था। गांव में नक्सलियों का इतना आतंक था कि जो बोल दिया वह करना ही है। पहाड़ पर खाना-पानी मंगवाते थे। नहीं दिया तो घर से खींचकर सबके सामने पीटते थे।’ उन्होंने कहा, ‘बात नहीं मानने पर सबके सामने शारदा देवी को मार दिया। नक्सली गांव के लड़कों को जबरदस्ती अपनी पार्टी में शामिल करते थे।’ क्या है चोरमारा गांव की वर्तमान स्थिति? नागेश्वर कोड़ा ने बताया, ‘2 फरवरी 2022 को गांव में CRPF कैंप बना तब से यहां शांति है। आज हमलोग नक्सलियों से तो परेशान नहीं हैं, लेकिन पूरी दुनिया से कटे हैं। चारों तरफ जंगल और पहाड़ है। गांव में न बिजली है, न मोबाइल नेटवर्क।’ उन्होंने कहा, ‘जब नक्सली एक्टिव थे तो हमें पढ़ने नहीं देते थे। सरकार गांव में स्कूल बनाती तो नक्सली बम लगाकर उसे उड़ा देते थे। आज हमारे गांव में स्कूल है। बच्चे पढ़ने जाते हैं, लेकिन 5वीं के बाद स्कूल नहीं है। इसके चलते आगे की पढ़ाई में दिक्कत होती है।’ गांव के लोगों के दिलों में खौफ, CRPF कैंप हटा तो क्या होगा चोरमारा गांव में हमने जितने लोगों से बात कि सभी इससे खुश दिखे कि गांव में CRPF कैंप है। इसके साथ ही उनके दिलों में खौफ भी है कि अगर कैंप हट गया तो क्या होगा। ग्रामीणों ने बताया कि कई नक्सली मारे गए हैं। कुछ ने सरेंडर किया है, लेकिन अभी भी सुरेश कोड़ा और उसके कई साथी अंडरग्राउंड हैं। CRPF कैंप से गांव के लोगों को कई सुविधाएं मिलती हैं। कोई बीमार पड़े तो यहां प्राथमिक इलाज होता है। इसके बाद उसे हॉस्पिटल पहुंचाया जाता है।  

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