मानवता के इतिहास में हम पहली बार ऐसी ढलान पर खड़े हैं, जहाँ महिला और पुरुष प्रकृति से मिली ‘सृजन शक्ति’ खो रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ और बदलती जीवन शैली हमें ऐसी ‘मौन महामारी’ की तरफ धकेल रही है, जिसे इनफर्टिलिटी (बांझपन) कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की हालिया रिपोर्ट ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है, जिसमें कहा गया है कि दुनिया का हर छठा व्यक्ति इनफर्टिलिटी का शिकार हो रहा है। यह एक मेडिकल कंडीशन नहीं है, बल्कि एक ग्लोबल हैल्थ क्राइसिस है। ह्यूमन रिप्रोडक्शन अपडेट के नवीनतम मेटा एनालिसिस के अनुसार पिछले 50 वर्ष में पुरुषों के स्पर्म काउंट में 50% से भी ज्यादा की गिरावट आई है। महिलाओं के लिए भी स्थिति उतनी ही भयावह है। चिकित्सा विज्ञान में मेनोपॉज़ यानी रजोनिवृत्ति की सामान्य उम्र 45-50 वर्ष मानी जाती है, लेकिन पिछले एक दशक में अर्ली मेनोपॉज़ के मामलों में तेज़ी आई है।
सभ्यतागत संकट
आज 30 से 35 वर्ष की युवतियाँ ‘ओवेरियन रिज़र्व’ (अंडों की कमी) की समस्या लेकर क्लीनिक पहुंच रही हैं। यह केवल डॉक्टरों या मरीजों की समस्या नहीं है, बल्कि एक सभ्यतागत संकट है। प्रदूषण, मिलावटी खान-पान, डिजिटल लत और अनियंत्रित तनाव ने हमारे शरीर के बुनियादी तंत्र को ‘हैक’ कर लिया है। फर्टिलिटी के बढ़ते संकट के बीच आईवीएफ का बाजार भी तेजी से फैल रहा है। अगर हमने अपनी जीवनशैली और पर्यावरणीय नीतियों में आमूलचूल बदलाव नहीं किया, तो भविष्य की पीढियाँ हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद करेंगी, जिसने अपनी सुख-सुविधाओं के बदले अपनी ‘सृजन शक्ति’ को दांव पर लगा दिया।
जीवनशैली में बदलाव से अर्ली मेनोपॉज़
यह सही है कि महिलाओं में मेनोपॉज़ की उम्र पहले की तुलना में कम हो रही है। इस बदलाव के बड़े कारण जीवन शैली में बदलाव, नशे की प्रवृत्ति, लगातार मानसिक तनाव, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधियों में कमी हैं। इसके अलावा पीसीओएस, अनियमित पीरियड्स जैसी समस्याओं के कारण ओवरी के रिज़र्व पर असर पड़ता है, जिससे मेनोपॉज़ जल्दी हो सकता है। पोषक तत्त्वों की कमी, शरीर में किसी न किसी रूप में प्रदूषण और प्लास्टिक, केमिकल, कीटनाशक का प्रवेश भी शरीर में एंडोक्राइन डिसरप्शन पैदा करता है, जिससे हार्मोनल संतुलन बिगड़ता है और अर्ली मेनोपॉज़ की आशंका बढ़ती है।
आदतों में सुधार से सामान्य हो सकते हैं स्पर्म काउंट
पुरुषों में स्पर्म काउंट में कमी चिंता का विषय है। इसके लिए नॉन मेडिकल फैक्टर काफी ज़िम्मेदार हैं। माइक्रो प्लास्टिक, पेस्टिसाइड्स, प्रदूषित जल और जीवन शैली में बदलाव से पैदा होने वाला एंडोक्राइम डिसरप्टिंग केमिकल हार्मोन्स को प्रभावित करता है। इसके अलावा आदतों में बदलाव के कारण अंडकोष के तापमान में वृद्धि भी स्पर्म काउंट में कमी की प्रमुख वजह है, जो लैपटॉप, मोबाइल या कसे हुए अंडरवियर पहनने से होता है। इसके अलावा तनाव और अनिद्रा के कारण कार्टिसोल का स्तर बढ़ता है, जिससे शुक्राणुओं में कमी आती है। आदतों में सुधार से स्पर्म काउंट सामान्य हो सकते हैं। धूम्रपान, एल्कोहल और अन्य सभी नशे छोड़ने ज़रूरी हैं। बॉडी बिल्डिंग के लिए कुछ युवक स्टेरॉइड्स लेते हैं, जो हार्मोनल गड़बड़ी की वजह बनता है और स्पर्म काउंट में कमी आती है। इसे भी छोड़ना ज़रूरी है। स्मार्टफोन को जेब में और लैपटॉप को गोद में नहीं रखना चाहिए। कीटनाशक भोजन से बचना चाहिए। बढ़ती चर्बी को कम करना चाहिए। रात में देर तक नहीं जागना चाहिए और पर्याप्त नींद लेनी चाहिए। पारंपरिक और पौष्टिक भोजन करना चाहिए। स्क्रीन टाइम कम रखना चाहिए और गैजेट्स को ज़्यादा समय तक शरीर के पास रखने से परहेज करना चाहिए।


