Shubnandu Breakup: सोशल मीडिया फेमस कपल नंदिनी गुलेरिया और शुभम सिंह, जिन्हें उनके फॉलोअर्स Shubnandu के नाम से जानते हैं, ने अपने सात साल लंबे रिश्ते का अंत कर दिया है। यह खबर उनके फैंस के लिए किसी झटके से कम नहीं रही। लॉन्ग-डिस्टेंस रिलेशनशिप और प्यार से जुड़े मजेदार और इमोशनल कंटेंट के लिए मशहूर यह जोड़ी अलग-अलग इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए ब्रेकअप की जानकारी दी। जैसे ही यह खबर आई, फैंस हैरानी और दुख जताने लगे और सोशल मीडिया पर इसे तेजी से शेयर किया जाने लगा। इसके साथ ही, कई लोगों के मन में यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर कोई कपल साथ में सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएट करता है और बाद में उनका ब्रेकअप हो जाता है, तो उस कंटेंट का असली मालिक कौन होगा। आइए, इस स्टोरी में इन सभी सवालों के जवाब एडवोकेट बुशरा अमन खान से जानते हैं, जो इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही हैं।
ब्रेकअप के बाद कानूनी अधिकार
अगर किसी कपल ने साथ में चैनल बनाया है और बाद में उनका ब्रेकअप हो जाता है, तो कानूनी अधिकार इस बात पर निर्भर करते हैं कि चैनल किसका है, क्या कोई लिखित एग्रीमेंट था, और प्लेटफॉर्म की पॉलिसी क्या कहती है। सिर्फ रिश्ते का खत्म होना इस मामले में तय नहीं करता कि किसके पास क्या हक है।
लिखित एग्रीमेंट नहीं
अगर चैनल लंबे समय तक मिलकर बनाया गया हो और दोनों ने कंटेंट क्रिएट किया, वीडियो एडिट किए, ब्रांडिंग की और चैनल से आमदनी कमाई, तो इसे कानूनी तौर पर जॉइंट इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी या जॉइंट बिजनेस माना जा सकता है। ऐसे मामलों में दोनों के पास चैनल की मालिकाना हक, एड रिवेन्यू, ब्रांड नेम और पुराने वीडियो पर बराबर का हक होता है।
भारतीय कानून के तहत यह मामला Copyright Act, 1957 और Indian Partnership Act, 1932 के अंतर्गत आ सकता है। यदि किसी ने वीडियो बनाने, स्क्रिप्ट लिखने, एडिटिंग करने, ब्रांडिंग में योगदान दिया या वीडियो में दिखाई दिया, तो वह कानूनी तौर पर चैनल की सह-मालिक हो सकता है। इस स्थिति में किसी एक पार्टनर द्वारा दूसरे को चैनल से बाहर रखना कानूनी रूप से सही नहीं माना जाएगा।
चैनल केवल किसी एक के नाम पर हो
अगर चैनल का ईमेल और AdSense अकाउंट किसी एक के नाम पर हैं, कोई लिखित एग्रीमेंट नहीं है और पैसे सीधे उसी के बैंक अकाउंट में जाते हैं, तो दूसरे पार्टनर के लिए मालिकाना हक साबित करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, लेकिन नामुमकिन नहीं।
यदि यह साबित किया जा सके कि दूसरे ने कंटेंट बनाने में सक्रिय योगदान दिया, फाइनेंशियल मदद की, आमदनी साझा करने की समझ थी और चैनल को कपल के नाम से प्रमोट किया गया था, तो वह सिविल केस कर सकता है। इसमें चैनल की मालिकाना हक, रिवेन्यू शेयर और कंटेंट के दुरुपयोग को रोकने के लिए इन्जंक्शन शामिल हो सकता है।
सिर्फ वीडियो में दिखाई देने वाला पार्टनर
अगर कोई केवल वीडियो में दिखाई दिया और चैनल के ईमेल या AdSense में उसका कोई हिस्सा नहीं था, कोई लिखित एग्रीमेंट नहीं था और फाइनेंशियल योगदान नहीं किया, तो इसके अधिकार सीमित रहेंगे। ऐसे मामले में सिर्फ पर्सनैलिटी राइट्स का दावा किया जा सकता है और अगर वीडियो किसी के खिलाफ इस्तेमाल हो, तो उसे हटाने की मांग की जा सकती है। भारत में कोर्ट पर्सनैलिटी और इमेज राइट्स को मान्यता देता है।
पासवर्ड बदलने का मामला
अगर किसी ने जानबूझकर पासवर्ड बदल दिए और दूसरे को चैनल तक पहुंच से रोका, तो इसे ट्रस्ट का उल्लंघन या साइबर मिसयूज माना जा सकता है। Information Technology Act, 2000 के तहत यदि चैनल दोनों का था और किसी ने दूसरे को बाहर रखा, तो कानूनी आधार हो सकता है।
कोर्ट आमतौर पर क्या देखती है
कोर्ट यह देखती है कि Gmail किसने बनाया था, AdSense किसके नाम पर है, पैसे किसके अकाउंट में गए, कोई लिखित एग्रीमेंट था या नहीं और चैनल सार्वजनिक रूप से “कपल चैनल” के रूप में प्रमोट हुआ था या नहीं। साक्ष्य के तौर पर पुराने चैट्स, रिवेन्यू शेयरिंग प्रूफ, बैंक ट्रांजेक्शन, बैक-एंड वर्क प्रूफ और सोशल मीडिया पोस्ट्स बहुत मायने रखते हैं।
कोर्ट से पहले प्रैक्टिकल सॉल्यूशंस
कोर्ट जाने से पहले दोनों पक्ष लिखित समझौता कर सकते हैं, रिवेन्यू स्प्लिट तय कर सकते हैं, जॉइंट ओनरशिप ट्रांसफर कर सकते हैं या मेडिएशन के जरिए विवाद सुलझा सकते हैं। इससे मामला जल्दी और आसान तरीके से हल हो सकता है। ध्यान रहे कि कोर्ट केस लंबा चल सकता है।
संक्षेप में अधिकार
अगर चैनल दोनों ने मिलकर बनाया और मेहनत की है, तो किसी भी पार्टनर को को-ओनरशिप का हक है और दूसरे को उसे एक्सेस से बाहर रखना कानूनी रूप से सही नहीं है। अगर चैनल केवल किसी एक के नाम है, तो दूसरे को अपना योगदान साबित करना पड़ेगा। अगर कोई केवल वीडियो में दिखाई दिया है, तो उसके अधिकार सीमित रहेंगे और मालिकाना हक़ उसी के पास रहेगा जिसने चैनल के नाम, अकाउंट और फाइनेंशियल कंट्रोल को अपने पास रखा।


