- आचार्य विद्यासागर का द्वितीय समाधि दिवस: शांतिधारा और विधान पूजा से दी भावभीनी श्रद्धांजलि
संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर के द्वितीय समाधि दिवस (विनयंजलि दिवस) पर बुधवार को शहर भक्ति के रंग में रंगा नजर आया। आरके. कॉलोनी स्थित आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में आचार्य को याद करते हुए समाजजनों की आंखें नम थीं, तो जुबां पर उनकी जय-जयकार थी। मंदिर में विशेष शांतिधारा और विधान पूजन के साथ उन्हें भावपूर्ण विनयंजलि अर्पित की गई। ट्रस्ट के अध्यक्ष नरेश गोधा ने बताया कि प्रातः बेला में मंत्रोच्चार के साथ अभिषेक और शांतिधारा का आयोजन हुआ। आचार्य की पावन स्मृति में मुख्य शांतिधारा अशोक गंगवाल ने तथा राजेन्द्र अजमेरा, शांतिलाल कोठारी, अभिषेक गोधा, सुशील लुहाड़िया, संजय झांझरी ने भी अन्य प्रतिमाओं पर शांतिधारा की। वातावरण ‘विद्यासागर की जय’ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।
आचार्य छतीसी विधान: हर अर्घ्य के साथ बढ़ा भक्ति का ज्वार
सुरेन्द्र गोधा, पूनम कोठारी और वीणा मंगल के कुशल निर्देशन में आयोजित ‘आचार्य छतीसी विधान’ में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लिया। विधान के दौरान भक्ति संगीत की लहरियों के बीच श्रद्धालुओं ने पूर्ण भक्ति भाव से श्रीफल चढ़ाते हुए पूजा-अर्चना की और विश्व शांति की कामना की। कार्यक्रम में समाज के प्रमुख लोगों ने विभिन्न धार्मिक क्रियाओं में सहभागिता निभाई। इसमें दिलिप अजमेरा, राजकुमार सेठी व जयप्रकाश अग्रवाल का योगदान रहा।
महेन्द्र सेठी ने बताया कि मंडप पर मुख्य कलश पिंकी शाह ने स्थापित किया। अन्य कलश अंजना गोधा, गुणमाला गदिया, सुलोचना सोनी, सुमन सेठी, पदमा काला, सावित्री सेठी, आशा टोंग्या, पिंकी रारा और प्रतिभा गंगवाल ने विराजमान किए। पूजा का शुभारम्भ निशा शाह ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया और विधान के समापन पर महाआरती की।
डोंगरगढ़ में लिया था महाप्रयाण
आचार्य ने 18 फरवरी 2024 को छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी तीर्थ पर संलेखना पूर्वक समाधि ली थी। आचार्य का राजस्थान से आत्मिक जुड़ाव रहा। उनका जन्म भले ही कर्नाटक में हुआ, लेकिन उनकी आध्यात्मिक यात्रा का प्रमुख पड़ाव राजस्थान रहा। उन्होंने 30 जून, 1968 को अजमेर में आचार्य ज्ञानसागर से मुनि दीक्षा ग्रहण की थी। उनकी रचित ‘मूकमाटी’ महाकाव्य आज भी साहित्य और अध्यात्म जगत में शोध का विषय है।


