जयपुर। राजस्थान की राजनीति के ‘भीष्म पितामह’ और प्रशासनिक कुशलता के पर्याय रहे पूर्व मुख्यमंत्री शिवचरण माथुर का महाशिवरात्रि से एक अद्भुत और गहरा संयोग था। भले ही अंग्रेजी कैलेंडर के पन्नों पर उनका जन्मदिन 14 फरवरी दर्ज था, लेकिन माथुर साहब के लिए उनका असली जन्मदिन वही था, जब शिवालयों में ‘हर-हर महादेव’ की गूँज होती थी।
उनकी दोहती और वरिष्ठ कांग्रेस नेता विभा माथुर इस रोचक और आध्यात्मिक पहलू को साझा करते हुए बताती हैं कि माथुर साहब का जन्म मध्य प्रदेश के गुना शहर में महाशिवरात्रि के ही दिन हुआ था। यही कारण है कि उनके नाम में ‘शिव’ रचा-बसा था और वे उम्र भर अपना जन्मदिन हिंदी पंचांग की इसी पवित्र तिथि के अनुसार मनाते रहे।
महाशिवरात्रि: भक्ति और जन्मदिन का संगम
माथुर साहब के लिए महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं था। यह उनके अस्तित्व का उत्सव था। वे इस दिन विशेष रूप से शिव आराधना करते थे और करौली व उदयपुर के मंदिरों से उनका विशेष जुड़ाव रहता था। आज उनकी स्वर्ण जयंती पर हिंदी तिथि के अनुसार, उनके परिवार और समर्थकों के लिए यह एक भावुक क्षण है।
‘शिव’ सा कल्याणकारी दृष्टिकोण
शिवचरण माथुर दो बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने (1981-1985 और 1988-1989)। उनके कार्यकाल को आज भी राजस्थान के ‘प्रशासनिक सुधारों का स्वर्ण काल’ माना जाता है।
वे अपनी सख्त कार्यशैली और फाइलों के त्वरित निस्तारण के लिए जाने जाते थे। उन्होंने ग्रामीण विकास और शिक्षा के क्षेत्र में जो योजनाएं शुरू कीं, वे आज भी राजस्थान के विकास का आधार स्तंभ हैं।
गुना में जन्म, करौली में संस्कार
शिवचरण माथुर का जन्म भले ही एमपी में हुआ, लेकिन उनकी कर्मभूमि और संस्कारों की नींव राजस्थान के करौली में पड़ी। बचपन में ही वे अपनी माताजी के साथ ननिहाल करौली आ गए थे। करौली की रियासतकालीन आबोहवा और वहां के सामाजिक परिवेश ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा।
- जमींदार परिवार: माथुर एक समृद्ध जमींदार परिवार से थे, लेकिन उनके भीतर जनसेवा और नेतृत्व के बीज बचपन से ही अंकुरित होने लगे थे।
- सादा जीवन: पारिवारिक वैभव के बावजूद उन्होंने हमेशा सादगी और अनुशासन को प्राथमिकता दी।

माणिक्य लाल वर्मा से ‘रिश्ता’
शिवचरण माथुर का राजनीति में प्रवेश किसी संयोग से कम नहीं था। उनका परिवार स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ा था।
- पारिवारिक जुड़ाव: माथुर साहब की बहन सरला जी का विवाह राजस्थान के दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी माणिक्य लाल वर्मा के परिवार में हुआ था।
- राष्ट्रीय चेतना: इस रिश्ते ने माथुर साहब को सीधे तौर पर आजादी के आंदोलन के केंद्र में ला खड़ा किया। अपनी धर्मपत्नी के साथ मिलकर वे राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत होकर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
विरासत जो आज भी प्रेरित करती है
आज जब राजस्थान की राजनीति नए दौर से गुजर रही है, शिवचरण माथुर जैसे नेता की कमी महसूस होती है जो संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाना जानते थे। हिंदी पंचांग के अनुसार आज उनकी जयंती पर प्रदेश उन्हें नमन कर रहा है।
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- महाशिवरात्रि से जन्म का अद्भुत संयोग: शिवचरण माथुर का जन्म 1926 में महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर हुआ था। यही कारण है कि वे जीवनभर अंग्रेजी कैलेंडर के बजाय हिंदी तिथि के अनुसार ही अपना जन्मदिन मनाते रहे।
2. गुना में जन्म, करौली में परवरिश: उनका जन्म मध्य प्रदेश के गुना जिले के एक छोटे से गांव ‘मढी कानूनगो’ में हुआ था। लेकिन मात्र 4 वर्ष की उम्र में ही वे अपनी माताजी के साथ राजस्थान के करौली आ गए और यहीं उनका पालन-पोषण उनके नाना भंवर लाल की देखरेख में हुआ।
3. दो बार संभाली राजस्थान की कमान: माथुर साहब को राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में दो बार सेवा करने का अवसर मिला। पहली बार 1981 से 1985 तक और दूसरी बार 1988 से 1989 तक वे प्रदेश के मुखिया रहे।
4. स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता: वे छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे। 1945 से 1947 के दौरान उन्होंने राजस्थान छात्र कांग्रेस के महासचिव के रूप में अपनी सेवाएं दीं और देश की आजादी की चेतना जगाने में भूमिका निभाई।
5. भीलवाड़ा से गहरा नाता: उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत भीलवाड़ा से हुई। वे 1956-57 में भीलवाड़ा नगरपालिका के अध्यक्ष रहे और बाद में वहां के जिला प्रमुख और मांडलगढ़ से कई बार विधायक भी चुने गए।
6. लोकसभा और विधानसभा दोनों के सदस्य: माथुर साहब ने न केवल राजस्थान की राजनीति में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई। वे तीसरी और दसवीं लोकसभा के सदस्य (सांसद) रहे और राजस्थान विधानसभा के लिए 7 बार निर्वाचित हुए।
7. प्रशासनिक सुधारों के जनक: उन्हें एक कुशल ‘एडमिनिस्ट्रेटर’ माना जाता था। वे राजस्थान के प्रशासनिक सुधार आयोग (1999-2003) के अध्यक्ष रहे, जहाँ उन्होंने शासन व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
8. असम के राज्यपाल के रूप में अंतिम सफर: अपने जीवन के अंतिम दौर में उन्होंने असम के राज्यपाल (2008-2009) के रूप में संवैधानिक पद की गरिमा बढ़ाई। वे अपनी मृत्यु तक इसी पद पर आसीन रहे।
9. पदों की लंबी फेहरिस्त: माथुर साहब ने शिक्षा, बिजली, पीडब्ल्यूडी, कृषि और खाद्य आपूर्ति जैसे लगभग सभी महत्वपूर्ण मंत्रालयों में मंत्री के रूप में कार्य किया। उनके पास राजस्थान सरकार के कामकाज का सबसे व्यापक अनुभव था।
10. विशिष्ट योग्यता से उच्च पद: माथुर साहब के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने किसी ‘मास अपील’ या नारों के बजाय अपनी कार्यकुशलता और विशिष्ट योग्यता के दम पर राजनीति के शीर्ष पदों को प्राप्त किया था। कांग्रेस आलाकमान के बीच उनका गहरा विश्वास और सम्मान था।


