प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच चल रही तनातनी अब और गहराती नजर आ रही है। इस पूरे विवाद में अब अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रवींद्र पुरी भी खुलकर मैदान में आ गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर शंकराचार्य द्वारा दिए गए विवादित बयान पर रवींद्र पुरी ने कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे “संतों की मर्यादा के खिलाफ” बताया है। माघ मेला क्षेत्र में आयोजित विहित के संत सम्मेलन में मौजूद साधु-संतों को संबोधित करते हुए अखाड़ा परिषद अध्यक्ष ने शंकराचार्य के ताजा वक्तव्यों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी संत को मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए इस तरह की भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह संतों की भाषा नहीं हो सकती रवींद्र पुरी ने कहा, “जो भाषा प्रयोग की जा रही है, वह संतों की भाषा नहीं हो सकती। जो इस तरह की बातें करता है, उससे हमें दूरी बनानी होगी।” उन्होंने माघ मेला क्षेत्र में चल रहे विरोध और राजनीतिक गतिविधियों पर भी सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि यह पुण्य भूमि, ऋषियों और संतों की भूमि है, लेकिन यहां इसे राजनीतिक अड्डे में तब्दील कर दिया गया है। “मेला क्षेत्र राजनीति का केंद्र बना दिया गया” अखाड़ा परिषद अध्यक्ष ने कहा कि जब वे मेला क्षेत्र में आए तो उन्होंने देखा कि लगातार विरोध हो रहा है, गालियां दी जा रही हैं और राजनीतिक दलों के फोन आ रहे हैं। उन्होंने कहा, “यहां सत्ता की बातें हो रही हैं, राजनीति की बातें हो रही हैं। अगर प्रशासन से गलती हुई है तो आप एफआईआर कराइए, शिकायत करिए, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के समर्थन की जरूरत क्या है?” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अखाड़ा परिषद को भी कई बार विरोध और विवादों का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे कभी किसी राजनीतिक पार्टी के पास समर्थन मांगने नहीं गए। शाही स्नान का उदाहरण देकर दी नसीहत रवींद्र पुरी ने महाकुंभ और मौनी अमावस्या के शाही स्नान का उदाहरण देते हुए कहा कि जब करोड़ों श्रद्धालु स्नान के लिए पहुंचे थे, तब सभी 13 अखाड़ों ने एकमत से फैसला लिया कि पहले जनता स्नान करेगी, उसके बाद अखाड़े स्नान करेंगे। उन्होंने बताया, “हमारा शाही स्नान सुबह 4 बजे था, लेकिन हमने दोपहर 3 बजे स्नान किया। न सिंहासन था, न पालकी। पैदल गए, पैदल लौटे। हमने कभी जनता से टकराव नहीं किया, क्योंकि जनता ही हमारी है।” “ईगो के लिए उठाया जा रहा है मुद्दा” अखाड़ा परिषद अध्यक्ष ने शंकराचार्य पर निशाना साधते हुए कहा कि बार-बार प्रशासन से गंगा स्नान के लिए ले जाने की मांग करना दुख की नहीं बल्कि अहंकार की बात प्रतीत होती है। उन्होंने कहा, “अगर उन्हें वास्तव में पीड़ा होती, तो वे यह मांग करते कि जिन लोगों ने उनके शिष्यों की पिटाई की है, उन पर कार्रवाई हो। लेकिन उन्हें इससे मतलब नहीं है।” संत समाज में बढ़ती दरार के संकेत इस बयान के बाद यह साफ हो गया है कि शंकराचार्य और मेला प्रशासन के बीच चल रहा विवाद अब केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसमें संत समाज के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। अखाड़ा परिषद अध्यक्ष के इस कड़े रुख से पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है।


