पंडरा में भाई-बहन हत्याकांड : आरोपी के बरी होने पर जांच अधिकारी की भूमिका पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल

पंडरा में भाई-बहन हत्याकांड : आरोपी के बरी होने पर जांच अधिकारी की भूमिका पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल

पंडरा ओपी क्षेत्र के जनकनगर में भाई-बहन की हत्या करने के आरोपी अर्पित अर्णव के बरी होने के बाद पुलिस की जांच पर सवाल खड़े हो गए हैं। खासकर तत्कालीन जांच अधिकारी मृत्युंजय पांडेय की भूमिका पर, जिससे कोर्ट में यह केस कमजोर हो गया। वर्तमान में मृत्युंजय पांडेय साहेबगंज में पदस्थापित हैं। चौंकाने वाला तथ्य है कि इस घटना में गंभीर रूप से घायल दोनों बच्चों की मां चंदा देवी को जांच अधिकारी ने न तो चार्जशीट में गवाह बनाया और न ही कोर्ट में पेश किया। जबकि इस मामले की सबसे अहम चश्मदीद और पीड़िता थीं। मालूम हो कि सिविल कोर्ट रांची स्थित अपर न्यायायुक्त बीके श्रीवास्तव की अदालत में 12 जनवरी 2026 को उक्त भाई-बहन हत्याकांड के आरोपी अर्पित अर्णव को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया था। इतनी बड़ी वारदात में मात्र चार चार्जशीटेड गवाह बनाए गए। जब्ती सूची पर हस्ताक्षर करने वाले दो लोगों को भी गवाह नहीं बनाया गया। इसके अलावा हत्या के साथ-साथ जानलेवा हमले का मामला भी दर्ज था। लेकिन जिस पीड़िता पर जानलेवा हमला हुआ, उसे सिर्फ बयान तक सीमित कर दिया गया । घटना के बाद 18 जून 2022 को रिम्स में इलाज के दौरान मजिस्ट्रेट ने अस्पताल में चंदा देवी का बयान लिया था। अपने बयान में चंदा देवी ने तीन नामजद आरोपियों में से एक लाल बादशाह उर्फ रोशन की पहचान की बता कही थी। इसके बावजूद न तो उसे आरोपी बनाया गया और न ही चंदा देवी को अभियोजन गवाहों की सूची में शामिल किया गया। जबकि हत्या के साथ जानलेवा हमला का भी केस चल रहा था। जांच अधिकारी ने चार्जशीट में दावा किया कि मृतका और आरोपी के बीच मोबाइल पर बातचीत होती थी और इसके लिए तीन मोबाइल नंबरों का उल्लेख किया गया। लेकिन ये नंबर किसके नाम से जारी थे, इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया गया। इतना ही नहीं, जिस हथौड़े से हत्या किए जाने का आरोप था, उसकी फॉरेंसिक जांच तक नहीं कराई गई। अदालत में पेश साक्ष्यों और सामने आई खामियों के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या इतनी बड़ी लापरवाही एक जांच अधिकारी से अनजाने में हो सकती है? या फिर यह मामला जांच की गंभीर चूक का उदाहरण बन गया है, जिससे पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल सका। पंडरा ओपी क्षेत्र के जनकनगर में भाई-बहन की हत्या करने के आरोपी अर्पित अर्णव के बरी होने के बाद पुलिस की जांच पर सवाल खड़े हो गए हैं। खासकर तत्कालीन जांच अधिकारी मृत्युंजय पांडेय की भूमिका पर, जिससे कोर्ट में यह केस कमजोर हो गया। वर्तमान में मृत्युंजय पांडेय साहेबगंज में पदस्थापित हैं। चौंकाने वाला तथ्य है कि इस घटना में गंभीर रूप से घायल दोनों बच्चों की मां चंदा देवी को जांच अधिकारी ने न तो चार्जशीट में गवाह बनाया और न ही कोर्ट में पेश किया। जबकि इस मामले की सबसे अहम चश्मदीद और पीड़िता थीं। मालूम हो कि सिविल कोर्ट रांची स्थित अपर न्यायायुक्त बीके श्रीवास्तव की अदालत में 12 जनवरी 2026 को उक्त भाई-बहन हत्याकांड के आरोपी अर्पित अर्णव को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया था। इतनी बड़ी वारदात में मात्र चार चार्जशीटेड गवाह बनाए गए। जब्ती सूची पर हस्ताक्षर करने वाले दो लोगों को भी गवाह नहीं बनाया गया। इसके अलावा हत्या के साथ-साथ जानलेवा हमले का मामला भी दर्ज था। लेकिन जिस पीड़िता पर जानलेवा हमला हुआ, उसे सिर्फ बयान तक सीमित कर दिया गया । घटना के बाद 18 जून 2022 को रिम्स में इलाज के दौरान मजिस्ट्रेट ने अस्पताल में चंदा देवी का बयान लिया था। अपने बयान में चंदा देवी ने तीन नामजद आरोपियों में से एक लाल बादशाह उर्फ रोशन की पहचान की बता कही थी। इसके बावजूद न तो उसे आरोपी बनाया गया और न ही चंदा देवी को अभियोजन गवाहों की सूची में शामिल किया गया। जबकि हत्या के साथ जानलेवा हमला का भी केस चल रहा था। जांच अधिकारी ने चार्जशीट में दावा किया कि मृतका और आरोपी के बीच मोबाइल पर बातचीत होती थी और इसके लिए तीन मोबाइल नंबरों का उल्लेख किया गया। लेकिन ये नंबर किसके नाम से जारी थे, इसका कोई दस्तावेजी प्रमाण कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया गया। इतना ही नहीं, जिस हथौड़े से हत्या किए जाने का आरोप था, उसकी फॉरेंसिक जांच तक नहीं कराई गई। अदालत में पेश साक्ष्यों और सामने आई खामियों के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या इतनी बड़ी लापरवाही एक जांच अधिकारी से अनजाने में हो सकती है? या फिर यह मामला जांच की गंभीर चूक का उदाहरण बन गया है, जिससे पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिल सका।  

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