सीनेट बिना यूनिवर्सिटी:हर छह महीने में एक बैठक अनिवार्य, पर 5 साल से आरयू-डीएसपीएमयू में हुई ही नहीं

एनईपी के सिलेबस और वार्षिक बजट पर सीनेट की नहीं ली सहमति, निर्णय अवैध
रांची विश्वविद्यालय (आरयू) और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू) रांची में सीनेट की बैठक का वर्षों से नहीं होना अब केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं रह गई है, बल्कि यह उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए संवैधानिक और नीतिगत संकट का रूप ले चुका है। सीनेट, जो विश्वविद्यालय की सर्वोच्च शैक्षणिक एवं नीति निर्धारित करने वाली संस्था होती है, उसी को दरकिनार कर दोनों विश्वविद्यालयों में न सिर्फ पढ़ाई कराई जा रही है, बल्कि तमाम एकेडमिक और प्रशासनिक फैसले लिए जा रहे हैं। यहाँ तक कि एनईपी-2020 के सिलेबस से पढ़ाई शुरू हो गई और वार्षिक बजट तय हो रहा, इन पर भी स्वीकृति नहीं ली गई। इस तरह दोनों विश्वविद्यालयों का संचालन एक ऐसी व्यवस्था में हो रहा है, जहाँ नीति पहले लागू होती है और स्वीकृति बाद में ली जाती है या कभी नहीं ली जाती। यूनिवर्सिटी एक्ट के अनुसार, प्रत्येक छह महीने में एक बार सीनेट की बैठक अनिवार्य है, लेकिन दोनों विश्वविद्यालयों में पिछले पाँच साल से एक भी बैठक नहीं हुई है। 3 बड़े नीतिगत फैसले, जिनकी मंजूरी सीनेट से नहीं ली सीनेट क्या, क्यों अनिवार्य? क्यों की जा रही अनदेखी सीनेट की आखिरी बैठक 5 साल पहले हुई थी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय का गठन हुए 7 साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान सीनेट की बैठक सिर्फ एक बार वीसी डॉ. सत्यनारायण मुंडा के कार्यकाल में हुई है। वहीं, आरयू में पिछले 5 वर्षों से सीनेट की कोई बैठक नहीं हुई है, लेकिन इस अवधि में कई बड़े फैसले लिए गए हैं, जिन पर आज तक सीनेट के अनुमोदन का इंतजार है। भास्कर एक्सपर्ट – प्रो. के. के. नाग, आरयू के पूर्व कुलपति शैक्षणिक व वित्तीय अनुशासन के लिए सीनेट की बैठक जरूरी किसी भी विश्वविद्यालय की सर्वोच्च शैक्षणिक और निर्णयात्मक संस्था सीनेट होती है। इसकी नियमित बैठक होना अनिवार्य है, क्योंकि इससे विश्वविद्यालय में शैक्षणिक और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित रहता है। समय पर बैठक न होने से नीतिगत निर्णय में विलंब होता है, जिससे छात्रों, शिक्षकों और प्रशासन तीनों पर असर पड़ता है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय में वीसी-प्रोवीसी समेत जो भी रिक्त पद हैं, उन पर अस्थाई नियुक्ति तुरंत की जानी चाहिए, जिससे कार्यप्रणाली बाधित न हो और प्रशासन व पठन-पाठन सुचारू रूप से चल सके। सभी विश्वविद्यालय प्रशासन को सीनेट की बैठकें नियमित रूप से आयोजित करना चाहिए। एनईपी के सिलेबस और वार्षिक बजट पर सीनेट की नहीं ली सहमति, निर्णय अवैध
रांची विश्वविद्यालय (आरयू) और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू) रांची में सीनेट की बैठक का वर्षों से नहीं होना अब केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं रह गई है, बल्कि यह उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए संवैधानिक और नीतिगत संकट का रूप ले चुका है। सीनेट, जो विश्वविद्यालय की सर्वोच्च शैक्षणिक एवं नीति निर्धारित करने वाली संस्था होती है, उसी को दरकिनार कर दोनों विश्वविद्यालयों में न सिर्फ पढ़ाई कराई जा रही है, बल्कि तमाम एकेडमिक और प्रशासनिक फैसले लिए जा रहे हैं। यहाँ तक कि एनईपी-2020 के सिलेबस से पढ़ाई शुरू हो गई और वार्षिक बजट तय हो रहा, इन पर भी स्वीकृति नहीं ली गई। इस तरह दोनों विश्वविद्यालयों का संचालन एक ऐसी व्यवस्था में हो रहा है, जहाँ नीति पहले लागू होती है और स्वीकृति बाद में ली जाती है या कभी नहीं ली जाती। यूनिवर्सिटी एक्ट के अनुसार, प्रत्येक छह महीने में एक बार सीनेट की बैठक अनिवार्य है, लेकिन दोनों विश्वविद्यालयों में पिछले पाँच साल से एक भी बैठक नहीं हुई है। 3 बड़े नीतिगत फैसले, जिनकी मंजूरी सीनेट से नहीं ली सीनेट क्या, क्यों अनिवार्य? क्यों की जा रही अनदेखी सीनेट की आखिरी बैठक 5 साल पहले हुई थी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय का गठन हुए 7 साल पूरे हो चुके हैं। इस दौरान सीनेट की बैठक सिर्फ एक बार वीसी डॉ. सत्यनारायण मुंडा के कार्यकाल में हुई है। वहीं, आरयू में पिछले 5 वर्षों से सीनेट की कोई बैठक नहीं हुई है, लेकिन इस अवधि में कई बड़े फैसले लिए गए हैं, जिन पर आज तक सीनेट के अनुमोदन का इंतजार है। भास्कर एक्सपर्ट – प्रो. के. के. नाग, आरयू के पूर्व कुलपति शैक्षणिक व वित्तीय अनुशासन के लिए सीनेट की बैठक जरूरी किसी भी विश्वविद्यालय की सर्वोच्च शैक्षणिक और निर्णयात्मक संस्था सीनेट होती है। इसकी नियमित बैठक होना अनिवार्य है, क्योंकि इससे विश्वविद्यालय में शैक्षणिक और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित रहता है। समय पर बैठक न होने से नीतिगत निर्णय में विलंब होता है, जिससे छात्रों, शिक्षकों और प्रशासन तीनों पर असर पड़ता है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय में वीसी-प्रोवीसी समेत जो भी रिक्त पद हैं, उन पर अस्थाई नियुक्ति तुरंत की जानी चाहिए, जिससे कार्यप्रणाली बाधित न हो और प्रशासन व पठन-पाठन सुचारू रूप से चल सके। सभी विश्वविद्यालय प्रशासन को सीनेट की बैठकें नियमित रूप से आयोजित करना चाहिए।  

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