नई दिल्ली में द्वितीय वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन:नालंदा विश्वविद्यालय ने निभाई सक्रिय भूमिका, कुलपति बोले- पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित कर रहे

नई दिल्ली में द्वितीय वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन:नालंदा विश्वविद्यालय ने निभाई सक्रिय भूमिका, कुलपति बोले- पुरानी परंपरा को पुनर्जीवित कर रहे

भारत मंडपम, नई दिल्ली में 24-25 जनवरी को द्वितीय वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन आयोजित हुई। इसमें नालंदा विश्वविद्यालय की सहभागिता ने पुराने भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन वैश्विक चुनौतियों के बीच सेतु स्थापित करने का महत्वपूर्ण काम किया है। नालंदा के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी के नेतृत्व में विश्वविद्यालय की इस भागीदारी ने एक बार फिर बौद्ध शिक्षा के इस ऐतिहासिक केंद्र की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त देखरेख में आयोजित इस शिखर सम्मेलन का केंद्रीय विषय था—’सामूहिक प्रज्ञा, संयुक्त स्वर और पारस्परिक सह-अस्तित्व’। यह विषय वर्तमान समय में जब दुनिया विभाजन और संघर्ष की चुनौतियों से जूझ रही है, विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होता है। वैश्विक प्रतिनिधित्व और उच्चस्तरीय उपस्थिति सम्मेलन में केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत और केंद्रीय अल्पसंख्यक काम मंत्री किरेन रिजिजू की उपस्थिति ने इस आयोजन को सरकारी स्तर पर भी महत्व प्रदान किया। विश्व के 200 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों, वरिष्ठ भिक्षुओं, विद्वानों और प्रमुख बौद्ध संस्थानों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इसे सही मायने में एक वैश्विक मंच का रूप दिया। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सम्मेलन में अनुसंधान, चिकित्सा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विज्ञान जैसे समकालीन विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। यह दर्शाता है कि बौद्ध दर्शन और मूल्य केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आधुनिक तकनीकी और वैज्ञानिक चुनौतियों के समाधान में भी प्रासंगिक हैं। महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताएं प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने सम्मेलन के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों से संवाद किया। इनमें रूस के गणराज्य काल्मिकिया के उप प्रमुख श्री ड्जगम्बिनोव ओचिर व्लादिमीरोविच, कंबोडिया सरकार के राज्य सचिव डॉ. ख्य सोवनरतना, वियतनाम बौद्ध विश्वविद्यालय के स्टैंडिंग वाइस चांसलर डॉ. थिच न्हात तू और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के महानिदेशक अभिजीत हालदार प्रमुख हैं। इन वार्ताओं के दौरान कई समझौता ज्ञापनों (MoU) पर विचार-विमर्श हुआ, जो भविष्य में नालंदा विश्वविद्यालय और विश्व के अन्य बौद्ध शिक्षा केंद्रों के बीच सहयोग को मजबूत करेंगे। यह शैक्षणिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है। नालंदा की ऐतिहासिक विरासत और समकालीन प्रासंगिकता कुलपति प्रोफेसर चतुर्वेदी ने कहा कि नालंदा विश्व के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध शिक्षा केंद्रों में से एक रहा है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ऐसे वैश्विक संवाद इस शाश्वत परंपरा को समकालीन चुनौतियों से जोड़ने का अवसर प्रदान करते हैं और शांति, सह-अस्तित्व और साझा मानवीय मूल्यों के लिए सहयोग को मजबूत करते हैं। वास्तव में, पुराने नालंदा जहां सदियों पहले एशिया के कोने-कोने से विद्यार्थी और विद्वान ज्ञान की खोज में आते थे। आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय उसी परंपरा को 21वीं सदी के संदर्भ में पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है। भारत मंडपम, नई दिल्ली में 24-25 जनवरी को द्वितीय वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन आयोजित हुई। इसमें नालंदा विश्वविद्यालय की सहभागिता ने पुराने भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन वैश्विक चुनौतियों के बीच सेतु स्थापित करने का महत्वपूर्ण काम किया है। नालंदा के कुलपति प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी के नेतृत्व में विश्वविद्यालय की इस भागीदारी ने एक बार फिर बौद्ध शिक्षा के इस ऐतिहासिक केंद्र की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ और भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त देखरेख में आयोजित इस शिखर सम्मेलन का केंद्रीय विषय था—’सामूहिक प्रज्ञा, संयुक्त स्वर और पारस्परिक सह-अस्तित्व’। यह विषय वर्तमान समय में जब दुनिया विभाजन और संघर्ष की चुनौतियों से जूझ रही है, विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होता है। वैश्विक प्रतिनिधित्व और उच्चस्तरीय उपस्थिति सम्मेलन में केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत और केंद्रीय अल्पसंख्यक काम मंत्री किरेन रिजिजू की उपस्थिति ने इस आयोजन को सरकारी स्तर पर भी महत्व प्रदान किया। विश्व के 200 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों, वरिष्ठ भिक्षुओं, विद्वानों और प्रमुख बौद्ध संस्थानों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इसे सही मायने में एक वैश्विक मंच का रूप दिया। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि सम्मेलन में अनुसंधान, चिकित्सा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और विज्ञान जैसे समकालीन विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। यह दर्शाता है कि बौद्ध दर्शन और मूल्य केवल आध्यात्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आधुनिक तकनीकी और वैज्ञानिक चुनौतियों के समाधान में भी प्रासंगिक हैं। महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ताएं प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी ने सम्मेलन के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों से संवाद किया। इनमें रूस के गणराज्य काल्मिकिया के उप प्रमुख श्री ड्जगम्बिनोव ओचिर व्लादिमीरोविच, कंबोडिया सरकार के राज्य सचिव डॉ. ख्य सोवनरतना, वियतनाम बौद्ध विश्वविद्यालय के स्टैंडिंग वाइस चांसलर डॉ. थिच न्हात तू और अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ के महानिदेशक अभिजीत हालदार प्रमुख हैं। इन वार्ताओं के दौरान कई समझौता ज्ञापनों (MoU) पर विचार-विमर्श हुआ, जो भविष्य में नालंदा विश्वविद्यालय और विश्व के अन्य बौद्ध शिक्षा केंद्रों के बीच सहयोग को मजबूत करेंगे। यह शैक्षणिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है। नालंदा की ऐतिहासिक विरासत और समकालीन प्रासंगिकता कुलपति प्रोफेसर चतुर्वेदी ने कहा कि नालंदा विश्व के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध शिक्षा केंद्रों में से एक रहा है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ऐसे वैश्विक संवाद इस शाश्वत परंपरा को समकालीन चुनौतियों से जोड़ने का अवसर प्रदान करते हैं और शांति, सह-अस्तित्व और साझा मानवीय मूल्यों के लिए सहयोग को मजबूत करते हैं। वास्तव में, पुराने नालंदा जहां सदियों पहले एशिया के कोने-कोने से विद्यार्थी और विद्वान ज्ञान की खोज में आते थे। आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय उसी परंपरा को 21वीं सदी के संदर्भ में पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है।  

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