कपूरथला जिले के रहने वाले और राज्यसभा सांसद संत बलबीर सिंह सीचेवाल ने राज्यसभा में निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों को स्कूल से ही किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री खरीदने के लिए मजबूर करने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि यह प्रथा आम परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डाल रही है और शिक्षा के व्यवसायीकरण को बढ़ावा दे रही है। प्रश्न संख्या 2920 के माध्यम से संत सीचेवाल ने केंद्र सरकार से पूछा कि क्या उसे इस बात की जानकारी है कि निजी स्कूल अभिभावकों को महंगी किताबें और वर्दी स्कूल से ही खरीदने के लिए क्यों बाध्य करते हैं। उन्होंने पिछले पांच वर्षों में इस संबंध में प्राप्त शिकायतों की संख्या और शिक्षा में बढ़ते व्यावसायिक रुझान को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में भी जानकारी मांगी। मंत्री ने दिया सांसद के प्रश्न का जवाब इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने जवाब देते हुए कहा कि शिक्षा एक समवर्ती विषय है। इसलिए इस पर कार्रवाई करना राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है। केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी ने ‘बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009’ की धारा 12(1)(सी) का उल्लेख किया। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के हो रहे प्रयास इसके तहत निजी स्कूलों में कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए कम से कम 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना अनिवार्य है। सरकार ने यह भी बताया कि अधिनियम 2009 और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत देश में सभी के लिए समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। किसी भी दुकान से सामान खरीदने का नहीं बना सकते दबाव केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि सीबीएसई ने वर्ष 2018 में एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें निजी स्कूलों को किताबों, स्टेशनरी और यूनिफॉर्म की बिक्री को लेकर दिशा-निर्देश दिए गए थे। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, स्कूल अभिभावकों पर किसी विशेष दुकान से सामान खरीदने का दबाव नहीं बना सकते।


