आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक प्रतिबद्धता के बीच जैन महासभा बीकानेर के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों का शपथ ग्रहण समारोह जिला उद्योग संघ के विशाल हॉल में गरिमामयी वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दात्राश्री रामेश्वरानंद ने अध्यक्ष कन्हैयालाल बोथरा को शपथ दिलाते हुए कहा, जैन एक जाति नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासित करने वाली व्यवस्था का नाम है। उन्होंने समाज से सादगी, संयम और संस्कारों की ओर लौटने का आह्वान किया। दात्राश्री ने बोथरा के 40 वर्षों के सेवाभावी जीवन की सराहना की और बताया कि उनके गुरुकुल में 13,500 बच्चों की शिक्षा के दौरान आज तक जमीकंद का उपयोग नहीं हुआ। उन्होंने सम्मेद शिखर की पवित्रता बनाए रखने तथा विवाह आयोजनों में व्यंजन सीमा 21 से घटाकर 11 करने का सुझाव दिया। विशिष्ट अतिथि विधायक जेठानंद व्यास ने कहा कि जैन समाज सदैव दानशीलता का प्रतीक रहा है। उन्होंने मातृ शक्ति से बच्चों में संस्कार निर्माण पर बल दिया। भाजपा जिला अध्यक्ष सुमन छाजेड़ ने कन्हैयालाल बोथरा के निष्कलंक सामाजिक जीवन को प्रेरणादायक बताया। संस्थापक अध्यक्ष विजय कोचर ने महासभा की स्थापना (2001) से अब तक की गतिविधियों महावीर जयंती, सामूहिक क्षमापना, प्रतिभा सम्मान, छात्रवृत्ति का उल्लेख किया। पूर्व अध्यक्ष विनोद बाफना ने नई टीम को शुभकामनाएं दीं। महिला विंग संयोजिका प्रेम नौलखा ने परस्परोपग्रहो जीवानाम् के सिद्धांत को समाज कार्य का आधार बताया। नई कार्यकारिणी में अध्यक्ष, कन्हैयालाल बोथरा, उपाध्यक्ष संजय सांड, महामंत्री, जतनलाल संचेती, कोषाध्यक्ष, जसकरण छाजेड़, सहमंत्री मनीष नाहटा को जिम्मेदारी सौंपी गई है। विशेष आमंत्रित व पदाधिकारी विजय कोचर, चंपकमल सुराणा, इंद्रमल सुराणा, जय चंदलाल डागा, लूणकरण छाजेड़, विनोद बाफना, सुरेन्द्र बद्धानी, मेघराज बोथरा सहित लगभग 90 सदस्यों ने शपथ ली। स्वागत सम्मान में प्रीति डागा व अन्य समाजजन शामिल रहे। कार्यक्रम की शुरुआत नमस्कार महामंत्र से हुई, संचालन लूणकरण छाजेड़ ने किया और आभार जतनलाल संचेती ने व्यक्त किया। वेडिंग शूट जैसी परंपराएं रुकनी चाहिए समारोह में सामाजिक कुरीतियों पर हुई चर्चा के दौरान मोहन सुराणा ने प्री-वेडिंग शूट जैसी प्रवृत्तियों पर अंकुश की बात कही। डी.पी. पच्चीसिया ने 21 व्यंजन सीमा पूरे वैश्य समाज में लागू करने का सुझाव दिया। जयचंद लाल डागा ने शादियों में पटाखों व फिजूलखर्ची रोकने की अपील की। जैन महासभा का यह शपथ समारोह केवल संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार के संकल्प का मंच भी बना। विवाह आयोजनों में सीमित व्यंजन, फिजूलखर्ची पर नियंत्रण, बच्चों में संस्कार शिक्षा और तीर्थों की पवित्रता जैसे मुद्दे दर्शाते हैं कि समाज आत्ममंथन की दिशा में आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब धार्मिक-सामाजिक संस्थाएं व्यवहारिक सुधारों की बात करती हैं, तो उसका प्रभाव व्यापक होता है।


