इशिता पाण्डेय – ‘ड्रीम बिग’ सहित अनेक पुस्तकों की लेखिका,
भारत को गर्व के साथ युवा राष्ट्र कहा जाता है, लेकिन इस पहचान के पीछे एक गहरी और बदलती हुई सच्चाई आकार ले रही है। देश की जनसंख्या संरचना तेजी से बदल रही है। भारत अब केवल युवाओं का देश नहीं रह गया, बल्कि वह उतनी ही तेजी से बुजुर्गों का देश भी बनता जा रहा है। आज लगभग 14.9 करोड़ वरिष्ठ नागरिक हमारे बीच हैं, जो कुल आबादी का लगभग 10.5 प्रतिशत हैं। अनुमान है कि वर्ष 2036 तक यह संख्या 23 करोड़ से अधिक हो जाएगी और 2050 तक हर पांचवां भारतीय साठ वर्ष से ऊपर होगा। यह केवल आंकड़ों का बदलाव नहीं, बल्कि हमारे परिवार, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सोच की एक गंभीर परीक्षा है।
इस परिवर्तन के बीच एक ऐसी पीढ़ी खड़ी है, जो दो मोर्चों पर एक साथ संघर्ष कर रही है। समाजशास्त्र में इसे ‘सैंडविच जेनरेशन’ कहा जाता है। तीस से पचास वर्ष की आयु के लोग एक ओर अपने बच्चों की शिक्षा, भविष्य और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, तो दूसरी ओर अपने वृद्ध और अस्वस्थ माता-पिता की देखभाल का दायित्व भी उठा रहे हैं। यही वह समय होता है जब कॅरियर अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में होता है, आर्थिक दबाव चरम पर होते हैं और सामाजिक अपेक्षाएं भी कम नहीं होतीं। ऐसे में यह पीढ़ी मानसिक तनाव, समय की कमी और भावनात्मक अपराधबोध से गुजरती है। उनकी यह थकान अक्सर दिखाई नहीं देती, लेकिन भीतर ही भीतर उन्हें कमजोर करती रहती है।
हाल में राज्यसभा में उठी एक मांग ने इस मौन संघर्ष को राष्ट्रीय विमर्श में स्थान दिया। सांसद सुमित्रा वाल्मीकि ने सुझाव दिया कि नौकरीपेशा लोगों को अपने बुजुर्ग माता-पिता की सेवा के लिए कम से कम 45 दिन का सवैतनिक अवकाश मिलना चाहिए। उन्होंने इसे सामाजिक ऋण कहा। वास्तव में माता-पिता अपने जीवन के दो से ढाई दशक बच्चों के पालन पोषण में समर्पित कर देते हैं। वे अपनी इच्छाओं को पीछे रखकर संतान के सपनों को आगे बढ़ाते हैं। जब वही माता-पिता जीवन के अंतिम चरण में सहारे के मोहताज होते हैं, तब संतान को उनके साथ रहने का अवसर मिलना चाहिए। यह केवल संवेदना नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है।
कई विकसित देशों में पेरेंटल केयर लीव को अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है। वहां कर्मचारियों को वेतन सहित माता-पिता की देखभाल के लिए समय दिया जाता है। अध्ययनों से यह स्पष्ट है कि जब परिवार को संस्थागत सहयोग मिलता है तो बुजुर्गों की अस्पताल में भर्ती दर घटती है और दीर्घकालिक स्वास्थ्य व्यय कम होता है। समाधान केवल अवकाश तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके साथ लचीले कार्य घंटे, वर्क फ्रॉम होम, केयरगिवर भत्ता और सामुदायिक डे केयर केंद्रों को बढ़ावा देना होगा।


