बेंगलुरु से बिहार पहुंची सनातन धर्म संरक्षण पदयात्रा:गयाजी के विष्णुपद, मंगला गौरी मंदिर में साधु-संतों ने किए दर्शन; पाकिस्तान सीमा तक जाएगी

बेंगलुरु से बिहार पहुंची सनातन धर्म संरक्षण पदयात्रा:गयाजी के विष्णुपद, मंगला गौरी मंदिर में साधु-संतों ने किए दर्शन; पाकिस्तान सीमा तक जाएगी

सनातन धर्म के संरक्षण, लोक कल्याण और सांस्कृतिक जागरूकता के उद्देश्य से निकली एक पदयात्रा बिहार पहुंच गई है। संत अंजनी उल्लू यादव और माता बी.आर. गीता की ओर से की जा रही यह यात्रा लगभग 20,000 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से अब तक करीब 18,000 किलोमीटर की दूरी तय की जा चुकी है। बिहार इस यात्रा का 11वां राज्य है। बिहार पहुंचने पर साधु-संतों ने सोमवार को गया के ऐतिहासिक विष्णुपद मंदिर और शक्तिपीठ मंगला गौरी मंदिर में पूजा-अर्चना की। विष्णुपद मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक पवित्र स्थल है, जबकि मंगला गौरी मंदिर को 51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान प्राप्त है। समाज के कल्याण और सनातन धर्म की रक्षा के लिए समर्पित है यात्रा साधु संत अंजनी उल्लू यादव ने बताया कि यह यात्रा केवल उनकी व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि समाज के कल्याण और सनातन धर्म की रक्षा के लिए समर्पित है। उन्होंने भारत के सभी शक्तिपीठों के दर्शन का संकल्प लिया है। माता बी.आर. गीता भी इस कठिन पदयात्रा में उनके साथ हैं। यह पदयात्रा बेंगलुरु से शुरू हुई थी और देश के विभिन्न राज्यों से होकर गुजर रही है। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक स्थलों के दर्शन करना नहीं, बल्कि समाज को एकजुट करना और सनातन संस्कृति के प्रति जागरूकता फैलाना भी है। यह यात्रा पाकिस्तान सीमा तक जाएगी, जो इसके अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को दर्शाता है। 18,000 किमी की कठिन यात्रा और चुनौतियां करीब 18,000 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करना आसान नहीं है। रास्ते में मौसम की कठिनाइयों, शारीरिक थकान और संसाधनों की कमी जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद साधु संतों का उत्साह और संकल्प उन्हें लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है। उनका मानना है कि यह यात्रा ईश्वर की कृपा और जनता के सहयोग से ही संभव हो पा रही है। यात्रा के अगले चरण में साधु संत उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों की ओर बढ़ेंगे। इनमें काशी विश्वनाथ मंदिर, प्रयागराज और मथुरा शामिल हैं। यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जहां-जहां साधु संत पहुंचते हैं, वहां स्थानीय लोग उनका भव्य स्वागत करते हैं। लोग उनके लिए भोजन, पानी और विश्राम की व्यवस्था करते हैं। यह समर्थन इस बात का प्रतीक है कि समाज में अभी भी आस्था और सेवा भाव जीवित है। साधु संतों ने इस सहयोग के लिए सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया है। यह पदयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह समाज में एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का भी संदेश देती है। आज के आधुनिक समय में जब लोग अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे में इस प्रकार की यात्राएं समाज को अपनी परंपराओं की याद दिलाने का काम करती हैं। सनातन धर्म के संरक्षण, लोक कल्याण और सांस्कृतिक जागरूकता के उद्देश्य से निकली एक पदयात्रा बिहार पहुंच गई है। संत अंजनी उल्लू यादव और माता बी.आर. गीता की ओर से की जा रही यह यात्रा लगभग 20,000 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से अब तक करीब 18,000 किलोमीटर की दूरी तय की जा चुकी है। बिहार इस यात्रा का 11वां राज्य है। बिहार पहुंचने पर साधु-संतों ने सोमवार को गया के ऐतिहासिक विष्णुपद मंदिर और शक्तिपीठ मंगला गौरी मंदिर में पूजा-अर्चना की। विष्णुपद मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक पवित्र स्थल है, जबकि मंगला गौरी मंदिर को 51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान प्राप्त है। समाज के कल्याण और सनातन धर्म की रक्षा के लिए समर्पित है यात्रा साधु संत अंजनी उल्लू यादव ने बताया कि यह यात्रा केवल उनकी व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि समाज के कल्याण और सनातन धर्म की रक्षा के लिए समर्पित है। उन्होंने भारत के सभी शक्तिपीठों के दर्शन का संकल्प लिया है। माता बी.आर. गीता भी इस कठिन पदयात्रा में उनके साथ हैं। यह पदयात्रा बेंगलुरु से शुरू हुई थी और देश के विभिन्न राज्यों से होकर गुजर रही है। इसका उद्देश्य केवल धार्मिक स्थलों के दर्शन करना नहीं, बल्कि समाज को एकजुट करना और सनातन संस्कृति के प्रति जागरूकता फैलाना भी है। यह यात्रा पाकिस्तान सीमा तक जाएगी, जो इसके अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को दर्शाता है। 18,000 किमी की कठिन यात्रा और चुनौतियां करीब 18,000 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करना आसान नहीं है। रास्ते में मौसम की कठिनाइयों, शारीरिक थकान और संसाधनों की कमी जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद साधु संतों का उत्साह और संकल्प उन्हें लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहा है। उनका मानना है कि यह यात्रा ईश्वर की कृपा और जनता के सहयोग से ही संभव हो पा रही है। यात्रा के अगले चरण में साधु संत उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों की ओर बढ़ेंगे। इनमें काशी विश्वनाथ मंदिर, प्रयागराज और मथुरा शामिल हैं। यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जहां-जहां साधु संत पहुंचते हैं, वहां स्थानीय लोग उनका भव्य स्वागत करते हैं। लोग उनके लिए भोजन, पानी और विश्राम की व्यवस्था करते हैं। यह समर्थन इस बात का प्रतीक है कि समाज में अभी भी आस्था और सेवा भाव जीवित है। साधु संतों ने इस सहयोग के लिए सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया है। यह पदयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह समाज में एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का भी संदेश देती है। आज के आधुनिक समय में जब लोग अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे में इस प्रकार की यात्राएं समाज को अपनी परंपराओं की याद दिलाने का काम करती हैं।  

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