संभल की शाही जामा मस्जिद एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गई है। इस बार मस्जिद की इंतजामिया कमेटी के सदर जफर अली ने मोहम्मद कासिफ पर मस्जिद के नाम पर अवैध चंदा वसूली करने का गंभीर आरोप लगाया है। इस आरोप के बाद मुस्लिम समुदाय के दो गुट आमने-सामने आ गए हैं, जो पहले से ही मस्जिद के प्रबंधन और अधिकार को लेकर विवाद में हैं। सोमवार को चंदौसी कोतवाली क्षेत्र में बयान देते हुए जफर अली ने थाना रायसत्ती क्षेत्र के मोहल्ला पंजू सराय निवासी मोहम्मद कासिफ के शाही जामा मस्जिद ट्रस्ट से जुड़े होने के दावे पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट कोई भी व्यक्ति पंजीकृत करा सकता है, लेकिन मस्जिद की इंतजामिया कमेटी का गठन मुस्लिम समाज द्वारा पगड़ी बांधकर किया जाता है और वही वैध प्रबंधन संस्था है। किसी प्रकार के लेन-देन से इनकार जफर अली के अनुसार, कासिफ के चाचा स्वर्गीय लड्डन खां, जो पूर्व में कमेटी के उपाध्यक्ष थे, ने भी एक समय ट्रस्ट बनाने की बात कही थी। तब मस्जिद में इस पर आपत्ति जताई गई थी, जिसके बाद उन्होंने ट्रस्ट को बंद करने और किसी प्रकार के लेन-देन से इनकार किया था। आरोप है कि वह ट्रस्ट आज तक बंद नहीं किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विश्वास में आकर उन्होंने और कासिफ के सगे चाचा ने कुछ दस्तावेज, पहचान पत्र और हस्ताक्षर दिए थे, जिनका कासिफ ने कथित रूप से दुरुपयोग किया। जफर अली ने साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और चंदौसी कोर्ट में चल रहे सभी मामलों में केवल इंतजामिया कमेटी ही पक्षकार है और मोहम्मद कासिफ का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। ट्रस्ट और कमेटी दो अलग-अलग संस्थाएं इंतजामिया कमेटी और ट्रस्ट के अंतर को स्पष्ट करते हुए जफर अली ने कहा कि ट्रस्ट और कमेटी दो अलग-अलग संस्थाएं हैं। ट्रस्ट पंजीकरण का अर्थ यह नहीं कि ट्रस्ट या कासिफ का मस्जिद के प्रबंधन से कोई अधिकारिक संबंध है। गौरतलब है कि 19 नवंबर 2024 को सिविल सीनियर डिवीजन कोर्ट, चंदौसी में हिंदू पक्ष ने शाही जामा मस्जिद को श्रीहरिहर मंदिर होने का दावा किया था। इसके बाद 19 और 24 नवंबर को हुए सर्वे के दौरान 24 नवंबर को हिंसा भड़क उठी थी। तभी से शाही जामा मस्जिद लगातार विवादों और सुर्खियों में बनी हुई है।


