बांका में सफा समुदाय ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा:मकर संक्रांति को लेकर बिहार, झारखंड, बंगाल से पहुंचे श्रद्धालु, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक अनुष्ठान

बांका में सफा समुदाय ने निभाई सदियों पुरानी परंपरा:मकर संक्रांति को लेकर बिहार, झारखंड, बंगाल से पहुंचे श्रद्धालु, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक अनुष्ठान

बांका के ऐतिहासिक मंदार पर्वत की तराई में सफा समुदाय के अनुयायी मकर संक्रांति मना रहे हैं। हर साल की तरह इस वर्ष भी समुदाय के श्रद्धालु यहां पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान कर रहे हैं। बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों से आए अनुयायियों ने इस आयोजन में उत्साहपूर्वक भाग लिया। लगातार पूजा अर्चना का दौड़ जारी है। श्रद्धालुओं के अनुसार, यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति, सामाजिक एकता और पारंपरिक मूल्यों को संरक्षित करने का माध्यम भी है। अनुष्ठान के दौरान पुरुष और महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सजे दिखे। ढोल, मांदर और नगाड़ा जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज से मंदार क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। अनुयायी सामूहिक नृत्य और संगीत के माध्यम से अपने इष्ट देव को प्रसन्न करते नजर आए। पूर्वजों की स्मृति से जुड़े गीतों के बोल पारंपरिक गीतों के बोल समुदाय की सदियों पुरानी परंपराओं, प्रकृति के प्रति सम्मान और पूर्वजों की स्मृति से जुड़े हैं। इन गीतों और नृत्यों ने धार्मिक भावनाओं को मजबूत करने के साथ-साथ युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़ा। समुदाय के बुजुर्गों ने बताया कि यह अनुष्ठान सामाजिक समरसता बनाए रखने, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से किया जाता है। अनुष्ठान के दौरान विशेष पूजा-अर्चना और सामूहिक प्रार्थना की गई, जिसमें सुख, शांति और समृद्धि की कामना की गई। आयोजन स्थल पर अनुशासन और पारंपरिक नियमों का विशेष पालन किया जा रहा है। आदिवासी गुरु की उपस्थिति में सभी अनुष्ठान विधिपूर्वक संपन्न हो रहे हैं।सफा समुदाय के अनुयायी पूरे समर्पण भाव से पर्वत की तराई में पूजा-अर्चना में लीन हैं, जिससे मंदार क्षेत्र सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बन गया है। बांका के ऐतिहासिक मंदार पर्वत की तराई में सफा समुदाय के अनुयायी मकर संक्रांति मना रहे हैं। हर साल की तरह इस वर्ष भी समुदाय के श्रद्धालु यहां पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान कर रहे हैं। बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों से आए अनुयायियों ने इस आयोजन में उत्साहपूर्वक भाग लिया। लगातार पूजा अर्चना का दौड़ जारी है। श्रद्धालुओं के अनुसार, यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति, सामाजिक एकता और पारंपरिक मूल्यों को संरक्षित करने का माध्यम भी है। अनुष्ठान के दौरान पुरुष और महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सजे दिखे। ढोल, मांदर और नगाड़ा जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज से मंदार क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। अनुयायी सामूहिक नृत्य और संगीत के माध्यम से अपने इष्ट देव को प्रसन्न करते नजर आए। पूर्वजों की स्मृति से जुड़े गीतों के बोल पारंपरिक गीतों के बोल समुदाय की सदियों पुरानी परंपराओं, प्रकृति के प्रति सम्मान और पूर्वजों की स्मृति से जुड़े हैं। इन गीतों और नृत्यों ने धार्मिक भावनाओं को मजबूत करने के साथ-साथ युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़ा। समुदाय के बुजुर्गों ने बताया कि यह अनुष्ठान सामाजिक समरसता बनाए रखने, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से किया जाता है। अनुष्ठान के दौरान विशेष पूजा-अर्चना और सामूहिक प्रार्थना की गई, जिसमें सुख, शांति और समृद्धि की कामना की गई। आयोजन स्थल पर अनुशासन और पारंपरिक नियमों का विशेष पालन किया जा रहा है। आदिवासी गुरु की उपस्थिति में सभी अनुष्ठान विधिपूर्वक संपन्न हो रहे हैं।सफा समुदाय के अनुयायी पूरे समर्पण भाव से पर्वत की तराई में पूजा-अर्चना में लीन हैं, जिससे मंदार क्षेत्र सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बन गया है।  

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