Heart Attack Risk India: हाल ही में आई एक नई स्टडी ने दिल की बीमारी को लेकर बड़ा खुलासा किया है। आमतौर पर डॉक्टर जिन रिस्क कैलकुलेटर का इस्तेमाल करते हैं, वे भारतीयों के लिए पूरी तरह सही साबित नहीं हो रहे हैं। स्टडी के मुताबिक, करीब 80% लोग जिन्हें बाद में हार्ट अटैक हुआ, उन्हें पहले हाई रिस्क में रखा ही नहीं गया था।
करीब 5,000 मरीजों पर हुई स्टडी
इस रिसर्च में लगभग 5,000 ऐसे मरीजों का डेटा लिया गया जिन्हें पहली बार हार्ट अटैक आया था। वैज्ञानिकों ने इनके पुराने हेल्थ रिकॉर्ड जैसे ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज और स्मोकिंग के आधार पर पांच अलग-अलग इंटरनेशनल मॉडल्स से उनका जोखिम आंका। इन मॉडल्स में Framingham Risk Score, ASCVD 2013, WHO चार्ट, JBS-3 और PREVENT स्कोर शामिल थे।
ज्यादातर मॉडल्स ने जोखिम को कम आंका
स्टडी के नतीजे चौंकाने वाले थे। कुछ मॉडल्स ने केवल 20% मरीजों को हाई रिस्क बताया, जबकि ASCVD 2013 मॉडल ने तो सिर्फ 12.3% लोगों को ही इस कैटेगरी में रखा। यानी बड़ी संख्या में मरीजों को लो या मॉडरेट रिस्क में डाल दिया गया, जबकि उन्हें ज्यादा खतरा था।
भारतीयों में दिल की बीमारी का पैटर्न अलग
डॉक्टरों का कहना है कि भारतीयों में हार्ट डिजीज का पैटर्न पश्चिमी देशों से अलग होता है। यहां लोगों को कम उम्र में ही दिल की समस्या हो जाती है। इसके पीछे कई कारण हैं जैसे ज्यादा डायबिटीज, पेट के आसपास चर्बी, खराब मेटाबॉलिज्म, तनाव, प्रदूषण और अनहेल्दी लाइफस्टाइल। इसी वजह से विदेशी मॉडल्स भारतीय शरीर और लाइफस्टाइल को सही तरीके से समझ नहीं पाते।
गलत कैटेगरी से इलाज में हो सकती है देरी
जब किसी मरीज का खतरा कम आंका जाता है, तो डॉक्टर भी उतनी गंभीरता से इलाज या बचाव के उपाय नहीं करते। इससे समय पर जरूरी दवाएं या लाइफस्टाइल बदलाव नहीं हो पाते और बाद में हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
मॉडरेट रिस्क में फंस जाते हैं ज्यादातर लोग
स्टडी में यह भी सामने आया कि ज्यादातर मॉडल्स बहुत सारे लोगों को “मॉडरेट रिस्क” में डाल देते हैं। इससे डॉक्टरों के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि किसे ज्यादा आक्रामक इलाज की जरूरत है।
PREVENT स्कोर थोड़ा बेहतर, लेकिन पूरी तरह सटीक नहीं
PREVENT स्कोर ने बाकी मॉडल्स के मुकाबले बेहतर तरीके से लोगों को अलग-अलग कैटेगरी में बांटा, लेकिन यह भी कई मरीजों को पहचानने में फेल रहा। यानी अभी तक कोई भी मॉडल पूरी तरह भरोसेमंद नहीं है।
भारत के लिए अलग रिस्क कैलकुलेटर की जरूरत
रिसर्चर्स का साफ कहना है कि भारत और साउथ एशिया के लोगों के लिए अलग से खास रिस्क कैलकुलेटर बनाना जरूरी है। अगर हम सिर्फ विदेशी मॉडल्स पर निर्भर रहेंगे, तो कई लोगों का असली खतरा समय पर पकड़ में नहीं आएगा और इससे बचाई जा सकने वाली जानें भी खतरे में पड़ सकती हैं।


