Rinku Singh Father Emotional Words: मन लगाकर मैच खेलना बेटा” रिंकू सिंह के पिता के आखिरी शब्द सुन रो पड़े सभी

Rinku Singh Father Emotional Words: मन लगाकर मैच खेलना बेटा” रिंकू सिंह के पिता के आखिरी शब्द सुन रो पड़े सभी

Rinku Singh Father Death Last Emotional Words: भारतीय क्रिकेट के उभरते सितारे रिंकू सिंह इन दिनों सिर्फ मैदान पर अपनी बल्लेबाजी के कारण ही नहीं, बल्कि निजी जीवन के एक बेहद भावुक दौर के कारण भी चर्चा में हैं। उनके पिता खानचंद के अंतिम शब्द आज हर उस व्यक्ति की आंखें नम कर रहे हैं जो पिता-पुत्र के रिश्ते की गहराई को समझता है। बीमारी से जूझते हुए भी एक पिता का विश्वास, आशीर्वाद और बेटे के भविष्य के लिए किया गया त्याग पूरे देश को भावुक कर गया। परिवार से मिली जानकारी के अनुसार, 60 वर्षीय खानचंद पिछले कई महीनों से फोर्थ स्टेज लिवर कैंसर से जूझ रहे थे। बीमारी लगातार बढ़ती जा रही थी, लेकिन उन्होंने कभी अपने दर्द को बेटे के सपनों के बीच आने नहीं दिया।

Rinku Singh Father Emotional Words

अस्पताल में आखिरी मुलाकात

23 फरवरी को तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ने के बाद खानचंद को नोएडा स्थित यथार्थ हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों की टीम लगातार इलाज कर रही थी, लेकिन बीमारी अंतिम अवस्था में पहुंच चुकी थी। इसी बीच बेटे को देखने की उनकी इच्छा बार-बार परिवार से साझा होती रही।

जब रिंकू को पिता की हालत गंभीर होने की सूचना मिली तो वह तुरंत चेन्नई से फ्लाइट लेकर 24 फरवरी को नोएडा पहुंचे। उस समय वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से जुड़े अभ्यास सत्र में व्यस्त थे, लेकिन पिता की तबीयत की खबर सुनते ही उन्होंने सब कुछ छोड़ दिया। अस्पताल पहुंचने के बाद लगभग छह घंटे तक वह पिता के पास बैठे रहे। दोनों के बीच हुई बातचीत अब परिवार के लिए जीवनभर की याद बन चुकी है।

पिता के आखिरी शब्द

परिवार के अनुसार, जब रिंकू अस्पताल से वापस मैदान लौटने की तैयारी कर रहे थे, तब खानचंद ने भावुक होकर बेटे से कहा -“बेटा, मन लगाकर मैच खेलना, मैं हॉस्पिटल से तेरे लिए दुआ करूंगा।” गंभीर दर्द में होने के बावजूद उनके चेहरे पर संतोष था। उन्हें अपने बेटे पर गर्व था। उन्होंने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए आशीर्वाद दिया और कहा – “तू बुलंदियों को छूना, खुद को कभी अकेला मत समझना। तेरे जैसा बेटा हर बाप को मिले।” ये शब्द केवल एक पिता की भावनाएं नहीं थे, बल्कि संघर्ष, विश्वास और त्याग की जीवित मिसाल थे।

Rinku Singh Father Emotional Words

देश के लिए खेलने की जिम्मेदारी

रिंकू ने पिता को बताया था कि 26 फरवरी को जिम्बाब्वे के खिलाफ मैच है और उन्हें देश के लिए मैदान पर उतरना होगा। यह सुनकर खानचंद ने उन्हें रोका नहीं, बल्कि खेलने के लिए प्रेरित किया। परिवार के लोगों का कहना है कि उस पल अस्पताल का माहौल बेहद भावुक हो गया था। पिता जानते थे कि शायद यह उनकी अंतिम मुलाकात हो, फिर भी उन्होंने बेटे के करियर और देश के सम्मान को प्राथमिकता दी। यह वही संस्कार थे जिन्होंने रिंकू को संघर्ष से सफलता तक पहुंचाया।

अंतिम सांस और टूटता परिवार

27 फरवरी की सुबह 4:36 बजे खानचंद ने अंतिम सांस ली। परिवार के सदस्य अस्पताल में मौजूद थे। लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे पिता आखिरकार जिंदगी की जंग हार गए, लेकिन बेटे के लिए उनका विश्वास और आशीर्वाद हमेशा के लिए अमर हो गया। उनके निधन की खबर फैलते ही अलीगढ़ और आसपास के क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। स्थानीय लोग, रिश्तेदार और खेल प्रेमी बड़ी संख्या में परिवार के घर पहुंचे।

संघर्षों से भरा रहा जीवन

खानचंद का जीवन संघर्षों से भरा रहा। साधारण परिवार से आने वाले उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए हमेशा मेहनत की। आर्थिक परिस्थितियां आसान नहीं थीं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

रिंकू के क्रिकेट करियर की शुरुआत भी आसान नहीं रही। शुरुआती दिनों में खेल का खर्च उठाना परिवार के लिए बड़ी चुनौती था। कई बार आर्थिक दबाव इतना बढ़ जाता था कि क्रिकेट छोड़ने की नौबत आ जाती, लेकिन पिता का विश्वास हमेशा बेटे के साथ खड़ा रहा। परिवार के करीबी बताते हैं कि खानचंद अक्सर कहा करते थे – “मेरा बेटा एक दिन देश के लिए खेलेगा।” आज वही सपना सच हो चुका था।

पिता का सपना, बेटे की पहचान

रिंकू सिंह की सफलता के पीछे उनकी मेहनत जितनी अहम रही, उतना ही महत्वपूर्ण उनके पिता का समर्थन और भरोसा भी रहा। बचपन में अभ्यास के लिए जाने से लेकर मुश्किल समय में हौसला बढ़ाने तक, खानचंद हर कदम पर बेटे के साथ खड़े रहे। जब रिंकू ने क्रिकेट की दुनिया में पहचान बनानी शुरू की, तब सबसे ज्यादा खुशी उनके पिता को ही होती थी। मोहल्ले में लोग बताते हैं कि बेटे की हर उपलब्धि पर उनकी आंखों में गर्व साफ दिखाई देता था।

Rinku Singh Father Emotional Words

सोशल मीडिया पर उमड़ा भावनाओं का सैलाब

खानचंद के अंतिम शब्द सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर हजारों लोगों ने भावनात्मक प्रतिक्रियाएं दीं। खेल प्रेमियों, प्रशंसकों और आम लोगों ने इसे पिता-पुत्र के रिश्ते का सबसे प्रेरणादायक उदाहरण बताया। कई लोगों ने लिखा कि एक पिता का सबसे बड़ा सपना अपने बच्चे को सफल देखना होता है, और खानचंद ने अपने अंतिम समय तक यही किया।

मैदान और भावनाओं के बीच संघर्ष

एक खिलाड़ी के लिए निजी जीवन और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना बेहद कठिन होता है। रिंकू के सामने भी वही चुनौती थी, एक ओर गंभीर रूप से बीमार पिता, दूसरी ओर देश के लिए खेलने की जिम्मेदारी। लेकिन पिता ने ही उन्हें मजबूत बनाया। उन्होंने बेटे को भावनाओं में टूटने नहीं दिया और कहा कि मैदान पर पूरी लगन से खेलना ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।

प्रेरणा बन गई पिता की सीख

आज खानचंद इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द रिंकू के जीवन का मार्गदर्शन बन चुके हैं। “खुद को कभी अकेला मत समझना” – यह संदेश अब केवल बेटे के लिए नहीं, बल्कि हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो अपने सपनों के लिए संघर्ष कर रहा है। खिलाड़ियों की सफलता के पीछे परिवार का त्याग अक्सर दिखाई नहीं देता, लेकिन वही असली ताकत होता है। खानचंद की कहानी इस सत्य को फिर से साबित करती है।

यादों में जीवित रहेंगे पिता

अलीगढ़ में अंतिम संस्कार के दौरान लोगों की भारी भीड़ उमड़ी। हर व्यक्ति की आंखों में सम्मान और संवेदना थी। लोगों ने कहा कि उन्होंने केवल एक पिता नहीं, बल्कि संघर्ष और समर्पण की मिसाल को विदा किया है। रिंकू के लिए यह व्यक्तिगत क्षति जरूर है, लेकिन उनके पिता की सीख और आशीर्वाद हमेशा उनके साथ रहेंगे। मैदान पर हर रन, हर जीत और हर उपलब्धि अब पिता की याद को समर्पित होगी।

​ 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *