दक्षिण बिहार की आर्द्रभूमियां एक बार फिर प्रवासी और स्थानीय जलपक्षियों से गुलजार है। एशियन वॉटरबर्ड सेंसस–2026 के तहत दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) की शोध टीम ने बिहार में 119 विभिन्न प्रजातियों के कुल 18,050 जलपक्षियों को चिह्नित किया है। यह सर्वेक्षण न सिर्फ पक्षी विविधता का दस्तावेज है, बल्कि यह भी बताता है कि तमाम मानवीय दबाव के बावजूद दक्षिण बिहार की आर्द्रभूमियां आज भी मध्य एशियाई फ्लाईवे में प्रवासी पक्षियों के लिए अहम ठिकाना बनी हुई हैं। यह राज्यस्तरीय पक्षी गणना 18 जनवरी से 8 फरवरी 2026 के बीच आयोजित की गई। सर्वेक्षण का शुभारंभ बिहार के मुख्य वन्यजीव संरक्षक की देखरेख में हुआ, जिसमें नोडल अधिकारी एस सुधाकर, आईएफएस, मुख्य वन संरक्षक, गया सर्किल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। दक्षिण बिहार के 6 जिलों की 12 प्रमुख आर्द्रभूमियों को अध्ययन में किया शामिल सीयूएसबी की टीम ने यह कार्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह के मार्गदर्शन में संपन्न किया गया। सीयूएसबी के जनसंपर्क पदाधिकारी मुदस्सीर आलम के अनुसार, इस सर्वेक्षण का नेतृत्व जीवन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. राम प्रताप सिंह ने दक्षिण बिहार के क्षेत्रीय समन्वयक के रूप में किया। प्रो. आरपी. सिंह और उनकी टीम ने न सिर्फ पक्षियों की गणना की, बल्कि आर्द्रभूमियों की आवासीय स्थिति, जल स्तर, प्रदूषण, मानवीय हस्तक्षेप और स्थानीय निर्भरता जैसे पहलुओं का भी आकलन किया। सीयूएसबी की शोध टीम ने दक्षिण बिहार के 6 जिलों की 12 प्रमुख आर्द्रभूमियों को इस अध्ययन में शामिल किया। इनमें औरंगाबाद की इंद्रपुरी बैराज आर्द्रभूमि, अरवल का लारी जैन मंदिर तालाब, नवादा के हरदिया डैम, जोग झीलाशय, ताराकोल डैम, सिपुर झीलाशय और भावरखोल आर्द्रभूमि, गया के बरांडीह और बरवाडीह आर्द्रभूमि, जहानाबाद का धरौत तालाब और पाताल गंगा और भोजपुर जिले में महुली घाट से मनेर घाट तक गंगा नदी का विस्तृत क्षेत्र शामिल है। इंद्रपुरी बैराज बना प्रवासी पक्षियों का बड़ा ठिकाना
औरंगाबाद जिले की इंद्रपुरी बैराज आर्द्रभूमि बिहार की सबसे समृद्ध आर्द्रभूमियों में उभरकर सामने आई। यहां 66 प्रजातियों के 7,829 पक्षी दर्ज किए गए। इनमें बड़ी संख्या लंबी दूरी तय कर आने वाले प्रवासी बतखों की रही। नॉब-बिल्ड डक की एक जोड़ी के साथ गैडवाल, रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, यूरेशियन विजन, कॉमन टील, कॉटन टील, नॉर्दर्न पिंटेल, रुडी शेल्डक, कॉमन शेल्डक और गार्गेनी के झुंड इस बात का संकेत हैं कि यह क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के लिए उत्कृष्ट शीतकालीन आवास बना हुआ है।
नवादा और जहानाबाद में भी दिखी जैव विविधता
नवादा जिले के हरदिया डैम और जोग झीलाशय को प्रवासी पक्षियों के संभावित सुरक्षित ठिकानों के रूप में चिह्नित किया गया। हरदिया डैम में 58 प्रजातियों के 2,061 और जोग झीलाशय में 50 प्रजातियों के 1,975 पक्षी दर्ज किए गए। जोग झीलाशय में 15 बार-हेडेड गीज का दिखना खास रहा, जो हिमालय पार से बिहार आने वाले पक्षियों की मौजूदगी को प्रमाणित करता है। जहानाबाद का धरौत तालाब इस वर्ष शोधकर्ताओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। यहां 2,301 जलपक्षियों का विशाल जमावड़ा देखा गया। नॉर्दर्न पिंटेल, नॉर्दर्न शोवलर, गैडवाल, रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, यूरेशियन विजन और ब्लैक-टेल्ड गॉडविट्स की बड़ी संख्या ने इस तालाब के महत्व को रेखांकित किया। गंगा घाटों पर पक्षी और डॉल्फिन साथ-साथ
भोजपुर जिले में महुली घाट से मनेर घाट तक गंगा नदी के पाट का भी सर्वेक्षण किया गया। यहां 45 प्रजातियों के 2,008 पक्षी दर्ज किए गए। स्मॉल प्रैटिनकोल, लिटिल स्टिंट, टेमिन्क्स स्टिंट और डनलिन के बड़े झुंडों की उड़ान शोधकर्ताओं के लिए यादगार रही। इसी दौरान कई स्थानों पर गंगीय डॉल्फिन का दिखना गंगा के जैविक स्वास्थ्य का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह सर्वेक्षण सिर्फ गिनती तक सीमित नहीं है। इससे प्राप्त आंकड़े आर्द्रभूमियों की संरक्षण रणनीति, अवैध शिकार पर नियंत्रण, प्रदूषण प्रबंधन और स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़ने में अहम भूमिका निभाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के वैज्ञानिक सर्वेक्षण बिहार में प्राकृतिक विरासत को बचाने की दिशा में मजबूत आधार तैयार करते हैं। दक्षिण बिहार की आर्द्रभूमियां एक बार फिर प्रवासी और स्थानीय जलपक्षियों से गुलजार है। एशियन वॉटरबर्ड सेंसस–2026 के तहत दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) की शोध टीम ने बिहार में 119 विभिन्न प्रजातियों के कुल 18,050 जलपक्षियों को चिह्नित किया है। यह सर्वेक्षण न सिर्फ पक्षी विविधता का दस्तावेज है, बल्कि यह भी बताता है कि तमाम मानवीय दबाव के बावजूद दक्षिण बिहार की आर्द्रभूमियां आज भी मध्य एशियाई फ्लाईवे में प्रवासी पक्षियों के लिए अहम ठिकाना बनी हुई हैं। यह राज्यस्तरीय पक्षी गणना 18 जनवरी से 8 फरवरी 2026 के बीच आयोजित की गई। सर्वेक्षण का शुभारंभ बिहार के मुख्य वन्यजीव संरक्षक की देखरेख में हुआ, जिसमें नोडल अधिकारी एस सुधाकर, आईएफएस, मुख्य वन संरक्षक, गया सर्किल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। दक्षिण बिहार के 6 जिलों की 12 प्रमुख आर्द्रभूमियों को अध्ययन में किया शामिल सीयूएसबी की टीम ने यह कार्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह के मार्गदर्शन में संपन्न किया गया। सीयूएसबी के जनसंपर्क पदाधिकारी मुदस्सीर आलम के अनुसार, इस सर्वेक्षण का नेतृत्व जीवन विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. राम प्रताप सिंह ने दक्षिण बिहार के क्षेत्रीय समन्वयक के रूप में किया। प्रो. आरपी. सिंह और उनकी टीम ने न सिर्फ पक्षियों की गणना की, बल्कि आर्द्रभूमियों की आवासीय स्थिति, जल स्तर, प्रदूषण, मानवीय हस्तक्षेप और स्थानीय निर्भरता जैसे पहलुओं का भी आकलन किया। सीयूएसबी की शोध टीम ने दक्षिण बिहार के 6 जिलों की 12 प्रमुख आर्द्रभूमियों को इस अध्ययन में शामिल किया। इनमें औरंगाबाद की इंद्रपुरी बैराज आर्द्रभूमि, अरवल का लारी जैन मंदिर तालाब, नवादा के हरदिया डैम, जोग झीलाशय, ताराकोल डैम, सिपुर झीलाशय और भावरखोल आर्द्रभूमि, गया के बरांडीह और बरवाडीह आर्द्रभूमि, जहानाबाद का धरौत तालाब और पाताल गंगा और भोजपुर जिले में महुली घाट से मनेर घाट तक गंगा नदी का विस्तृत क्षेत्र शामिल है। इंद्रपुरी बैराज बना प्रवासी पक्षियों का बड़ा ठिकाना
औरंगाबाद जिले की इंद्रपुरी बैराज आर्द्रभूमि बिहार की सबसे समृद्ध आर्द्रभूमियों में उभरकर सामने आई। यहां 66 प्रजातियों के 7,829 पक्षी दर्ज किए गए। इनमें बड़ी संख्या लंबी दूरी तय कर आने वाले प्रवासी बतखों की रही। नॉब-बिल्ड डक की एक जोड़ी के साथ गैडवाल, रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, यूरेशियन विजन, कॉमन टील, कॉटन टील, नॉर्दर्न पिंटेल, रुडी शेल्डक, कॉमन शेल्डक और गार्गेनी के झुंड इस बात का संकेत हैं कि यह क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के लिए उत्कृष्ट शीतकालीन आवास बना हुआ है।
नवादा और जहानाबाद में भी दिखी जैव विविधता
नवादा जिले के हरदिया डैम और जोग झीलाशय को प्रवासी पक्षियों के संभावित सुरक्षित ठिकानों के रूप में चिह्नित किया गया। हरदिया डैम में 58 प्रजातियों के 2,061 और जोग झीलाशय में 50 प्रजातियों के 1,975 पक्षी दर्ज किए गए। जोग झीलाशय में 15 बार-हेडेड गीज का दिखना खास रहा, जो हिमालय पार से बिहार आने वाले पक्षियों की मौजूदगी को प्रमाणित करता है। जहानाबाद का धरौत तालाब इस वर्ष शोधकर्ताओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। यहां 2,301 जलपक्षियों का विशाल जमावड़ा देखा गया। नॉर्दर्न पिंटेल, नॉर्दर्न शोवलर, गैडवाल, रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, यूरेशियन विजन और ब्लैक-टेल्ड गॉडविट्स की बड़ी संख्या ने इस तालाब के महत्व को रेखांकित किया। गंगा घाटों पर पक्षी और डॉल्फिन साथ-साथ
भोजपुर जिले में महुली घाट से मनेर घाट तक गंगा नदी के पाट का भी सर्वेक्षण किया गया। यहां 45 प्रजातियों के 2,008 पक्षी दर्ज किए गए। स्मॉल प्रैटिनकोल, लिटिल स्टिंट, टेमिन्क्स स्टिंट और डनलिन के बड़े झुंडों की उड़ान शोधकर्ताओं के लिए यादगार रही। इसी दौरान कई स्थानों पर गंगीय डॉल्फिन का दिखना गंगा के जैविक स्वास्थ्य का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह सर्वेक्षण सिर्फ गिनती तक सीमित नहीं है। इससे प्राप्त आंकड़े आर्द्रभूमियों की संरक्षण रणनीति, अवैध शिकार पर नियंत्रण, प्रदूषण प्रबंधन और स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़ने में अहम भूमिका निभाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के वैज्ञानिक सर्वेक्षण बिहार में प्राकृतिक विरासत को बचाने की दिशा में मजबूत आधार तैयार करते हैं।


