J&K Terrorism Report: कश्मीर में आतंकवाद क्या सच में खत्म हो गया है, या सिर्फ कम हुआ है? यही सवाल आज भी लोगों के मन में बना हुआ है। कभी पुलवामा और पहलगाम जैसे हमलों से दहला कश्मीर अब पहले से कहीं ज्यादा शांत है या नहीं… आइए जानते हैं।
एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 12 सालों में जम्मू-कश्मीर में मिलिटेंसी और देश के दूसरे हिस्सों में नक्सलवाद दोनों में बड़ी गिरावट आई है। सुरक्षा बलों के लगातार टारगेटेड ऑपरेशन, बेहतर खुफिया तालमेल और विकास कार्यों ने इसमें अहम भूमिका निभाई है। जो नक्सली प्रभाव कभी ‘रेड कॉरिडोर’ के बड़े हिस्से में फैला था, वह अब सिमटकर रह गया है। बड़े माओवादी नेताओं के खत्म होने और सप्लाई नेटवर्क टूटने से उनकी ताकत भी कमजोर पड़ी है।
आतंकवाद को रोकने के लिए चौमुखी कार्य
रोड नेटवर्क, मोबाइल कनेक्टिविटी, बैंकिंग एक्सेस और वेलफेयर स्कीमों के विस्तार से दूर-दराज के आदिवासी इलाकों को मेनस्ट्रीम में जोड़ने में मदद मिली है, जिससे माओवादी ग्रुप्स का आइडियोलॉजिकल और लॉजिस्टिक सपोर्ट बेस कमजोर हुआ है। सरेंडर और रिहैबिलिटेशन पॉलिसी ने भी माओवादी कैडरों को हथियार डालने के लिए बढ़ावा दिया है, जिससे उनकी संख्या में और कमी आई है।
रिपोर्ट जम्मू और कश्मीर में, खासकर पिछले एक दशक में लागू की गई कई पॉलिसी और सिक्योरिटी उपायों के बाद मिलिटेंसी के लगातार कमजोर होने की ओर इशारा करती है। आर्मी, पैरामिलिट्री फोर्स और लोकल पुलिस के बीच बेहतर तालमेल से सिक्योरिटी ग्रिड मजबूत हुआ है, जिससे ज्यादा बार और सटीक काउंटर-टेरर ऑपरेशन हो रहे हैं।
इस बदलाव की एक खास बात यह रही है कि टेरर इकोसिस्टम को खत्म करने पर ध्यान दिया गया है, जिसमें ओवरग्राउंड वर्कर (OGW) नेटवर्क, फाइनेंसिंग चैनल और रिक्रूटमेंट पाइपलाइन शामिल हैं। एजेंसियों ने सर्विलांस और एनफोर्समेंट के उपाय तेज कर दिए हैं, जिससे मिलिटेंट संगठनों के लिए ऑपरेशन जारी रखना या नए रिक्रूट को अट्रैक्ट करना मुश्किल होता जा रहा है।
‘द संडे गार्डियन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, बेहतर बॉर्डर मैनेजमेंट, फेंसिंग और एडवांस्ड सर्विलांस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की वजह से क्रॉस-बॉर्डर घुसपैठ काफी हद तक कम हो गई है। इससे पाकिस्तान-समर्थित ग्रुप्स की कैडर और रिसोर्स फिर से भरने की काबिलियत पर काफी असर पड़ा है। हालांकि पहले के सालों में लोकल रिक्रूटमेंट एक चिंता का विषय था, लेकिन मिलिटेंट लीडरशिप पर लगातार दबाव और आउटरीच की कोशिशों की वजह से नए इंडक्शन में कमी आई है। साथ ही, टारगेटेड ऑपरेशन ने एक्टिव मिलिटेंट की उम्र कम कर दी है, जिससे उनका ऑपरेशनल असर कम हो गया है। इन उपायों का कुल असर बड़े पैमाने पर हमलों में कमी और इलाके में स्टेबिलिटी इंडिकेटर में सुधार के रूप में देखा गया है।
रिपोर्ट में चेतावनी
आम लोगों की ज़िंदगी, टूरिज्म और स्थानीय प्रशासन में सुधार के संकेत देखने को मिले हैं। हालांकि रिपोर्ट यह भी कहती है कि कभी-कभी होने वाली घटनाएं और कुछ खतरे अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। ऐसे में सतर्क रहने की जरुरत है।
अभिनंदन मिश्रा की रिपोर्ट, जो ‘द संडे गार्डियन’ में प्रकाशित हुई है, यह बताती है कि नक्सलवाद और कश्मीर में मिलिटेंसी दोनों में कमी आई है। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि सरकार ने सख्त सुरक्षा कदमों के साथ-साथ विकास और बेहतर प्रशासन पर भी ध्यान दिया। इस संतुलित रणनीति से पहले प्रभावित इलाकों में धीरे-धीरे सरकार का नियंत्रण फिर से मजबूत होता दिख रहा है।


