जोधपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) और नगर निगम जोधपुर को बड़ी राहत देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने एक विवादित गार्डन पर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की एकल पीठ ने जेडीए की अपील पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि जब संपत्ति पर कब्जा ही साबित नहीं है, तो अस्थाई रोक नहीं दी जा सकती। विवाद की पृष्ठभूमि: मजलिस का दावा यह विवाद जोधपुर के एक बगीचे से जुड़ा है। जोधपुर के शांतिप्रिय नगर निवासी सलीम चौहान, जो मजलिस हमदर्दने कौम मेड़ती सिलावटान (जोधपुर) के सदर हैं, ने राजस्थान वक्फ बोर्ड, जयपुर के समक्ष एक अस्थाई रोक की अर्जी दायर की थी। इस मामले में राजस्थान मुस्लिम वक्फ बोर्ड भी एक पक्षकार है। वादी का दावा था कि 22 अक्टूबर 1966 के विनिमय पत्र और वक्फ रजिस्टर की प्रविष्टि के आधार पर यह बगीचा वक्फ संपत्ति का हिस्सा है। ट्रिब्यूनल की भूमिका निभा रहे बोर्ड ने 20 नवंबर 2025 को अर्जी मंजूर कर जेडीए व निगम को संपत्ति पर यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। जेडीए और नगर निगम के वकीलों के तर्क जेडीए की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य और उनके सहयोगी रजत दवे ने पैरवी की। डॉ. आचार्य ने तर्क दिया कि 1966 के विनिमय पत्र की अनुसूची-I में बगीचा संपत्ति के रूप में शामिल ही नहीं है, इसे केवल दिशात्मक विवरण में पड़ोसी सीमा के रूप में दर्शाया गया है। दूसरी ओर, नगर निगम की ओर से पेश वकील ने अलग से अपना पक्ष रखा। नगर निगम के वकील ने तर्क दिया कि राजस्व रिकॉर्ड में यह संपत्ति नगर निगम के नाम दर्ज है। निगम के वकील ने तर्क दिया कि वादी ने बगीचे का कब्जा सौंपे जाने का कोई भी दस्तावेज पेश नहीं किया है और अस्थाई रोक के आदेश से निगम के वैधानिक अधिकारों तथा नगर प्रशासन के कार्यों में अनुचित बाधा उत्पन्न होती है। वादी मजलिस के तर्क और पेश किए गए केस लॉ मजलिस की ओर से अधिवक्ता जितेंद्र चोपड़ा और सुनील पुरोहित ने पैरवी की। इन्होंने तर्क दिया कि संपत्ति उनके लंबे उपयोग में है और वहां मूर्ति स्थापना या निर्माण से संपत्ति की प्रकृति बदल जाएगी, जिससे उन्हें अपूरणीय क्षति होगी। वादी के वकील ने अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के छह फैसलों का हवाला दिया, जिनमें राम गौड़ा, रामजी राय, हरिराम बनाम मोरू देवी, चेना राम बनाम बस्ता राम, शेख दादा मियां और अनीश बनाम अनीना के मामले शामिल थे। कोर्ट का कानूनी विश्लेषण और स्थापित नज़ीरें सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने पाया कि विनिमय पत्र में बगीचा शामिल नहीं होने के कारण वक्फ रजिस्टर में इसका इंद्राज ‘ प्रथम दृष्टया’ संदेहास्पद है। कोर्ट ने वादी द्वारा पेश किए गए सभी छह फैसलों को वर्तमान मामले के तथ्यों से अलग मानते हुए खारिज कर दिया, क्योंकि उन मामलों में वादी का कब्जा या प्रथम दृष्टया अधिकार साबित हुआ था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘अनाथुला सुधाकर बनाम पी. बुची रेड्डी’ (2008) मामले का विस्तार से हवाला देते हुए कहा कि जहां मालिकाना हक विवादित हो और कब्जा साबित न हो, वहां बिना मालिकाना हक की घोषणा मांगे केवल रोक का मुकदमा सुनवाई योग्य नहीं है। इसके साथ ही, कोर्ट ने अपनी ही जयपुर पीठ के ‘भेरू लाल बनाम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश’ (2013) मामले का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि जब अंतिम राहत ही कानूनी रूप से नहीं मिल सकती, तो उसी प्रकृति की अस्थाई रोक भी नहीं दी जा सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुविधा का संतुलन दर्ज स्वामी नगर निगम के पक्ष में है। अस्थाई रोक की अर्जी खारिज, एक साल में हो निपटारा कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के 20 नवंबर 2025 के आदेश को स्पष्ट अवैधता और विवेकहीनता से ग्रस्त मानते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने जेडीए की अपील स्वीकार करते हुए वादी की अस्थाई रोक की अर्जी और अन्य सभी लंबित स्टे याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने ट्रिब्यूनल को मुख्य मुकदमे का निपटारा आदेश की प्रति मिलने के एक वर्ष के भीतर करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा, कोर्ट ने यह बेहद महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया कि इस अपील में की गई सभी टिप्पणियां केवल अंतरिम राहत के संदर्भ में हैं और अंतिम सुनवाई के स्तर पर यह किसी भी पक्ष के खिलाफ पूर्वाग्रह के रूप में नहीं मानी जाएंगी।


