कर्मचारी चयन मंडल की भर्ती सवालों के घेरे में:बिना डिग्री वाले मेरिट लिस्ट में,योग्य को नहीं मिली जगह; हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस

कर्मचारी चयन मंडल की भर्ती सवालों के घेरे में:बिना डिग्री वाले मेरिट लिस्ट में,योग्य को नहीं मिली जगह; हाईकोर्ट ने जारी किया नोटिस

कर्मचारी चयन भर्ती परीक्षा पर सवाल खड़े हो गए है, जिसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। आरोप है कि जहां मास्टर्स डिग्री अनिवार्य थी, वहां पर बिना योग्यता वाले अभ्यार्थियों के नाम मेरिट लिस्ट में दिए गए। मामले पर अब 7 अप्रैल को सुनवाई होगी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ईसीबी और विभाग से पूछा है कि मेरिट लिस्ट में कितने अभ्यार्थी है, जिनके पास मास्टर्स की डिग्री नहीं है। विभाग ने जवाब के लिए समय मांगा है। कोर्ट ने राज्य सरकार ,संचालनालय नगरीय प्रशासन और विकास और एमपीएसईबी को नोटिस जारी किया है। दरअसल 2022-23 मे एमपीईएसबी ने गुप्र 2 सब गुप्र 4 के तहत 9 हजार से ज्यादा पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन निकाला था। जिसमें कि सहायक नगर निवेशक और सहायक अतिक्रमण निरोधक अधिकारी के पद शामिल थे। भोपाल, इंदौर,ग्वालियर,जबलपुर,रीवा, सतना, छिंदवाड़ा जिलों में 86 पद खाली थे। पोस्ट के लिए विज्ञापन निकले तो परीक्षा हुई और रिजल्ट जारी हुए, लेकिन पदों पर नियुक्तियां नहीं हुई। परीक्षा फार्म भरते समय विभाग ने ना ही दस्तावेज अपलोड किए और ना ही प्रारंभिक जांच की। नतीजन ऐसे अभ्यार्थीयों ने परीक्षा दे दी, जिनके पास जरूरी डिग्री तक नहीं थी। चार हजार से अधिक अभ्यार्थियों के नाम सिलेक्टर और वेटिंग लिस्ट में आ गए। विभाग ने जब मेरिट के आधार पर दस्तावेजों की जांच की 86 पदों के लिए सिर्फ 10 अभ्यार्थियों के पास ही मास्टर्स की डिग्री थी। 90 प्रतिशत अभ्यार्थी अपात्र मिले, जिसके चलते पद नहीं भरे जा सके। याचिकाकर्ता सुधीर सिंह और अन्य ने मामले पर हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने 90 दिनों काउंसलिंग और दस्तावेज सत्यापन के बाद ही नियुक्ति के आदेश दिए। मेरिट लिस्ट में अपात्र अभ्यार्थियों के शामिल होने की समस्या जस की तस बनी रही। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सुधार से इंकार किया अभ्यार्थियों ने रिट याचिका दायर की। चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि यादि भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी है तो उसे सही नहीं ठहराया जा सकता है। ईसीबी ने बताया कि भारतीय नियम 2013 के अनुसार ही यह विज्ञापन जारी किया गया है, जिसमे कि दस्तावेजों का वेरिफिकेशन विभाग के जरिए होना है। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि 2013 में ऐसी बाध्याता नहीं थी। कोर्ट को यह भी बताया गया कि जिस पद के लिए मास्टर्स की डिग्री होना अनिवार्थ थी, उसमे 2002 में जन्में युवा भी मेरिट लिस्ट में शामिल थे। सवाह यह है कि इतनी कम उम्र में मास्टर्स डिग्री संभव ही नहीं है, तो फिर अभ्यार्थियों को परीक्षा देने का मौका कैसे मिल गया।

​ 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *