Rajasthan Patrika: प्रतिवर्ष, आज का दिन पत्रिका की यात्रा के पड़ाव का दिन होता है। यह जीवंत स्मृति का दिवस है। यात्रा पर दृष्टिपात करने का भी कि क्या नया घटित हुआ और होने को है। माटी का ऋण चुकाने के लिए क्या किया, संवाद और विश्वास के स्तर को नई ऊंचाइयां दे पाए अथवा नहीं। सामाजिक सरोकारों में जनसहयोग का स्तर कैसा रहा, लोक अभिव्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए क्या संघर्ष किया। जनहित के मुद्दों पर चलाए गए अभियानों और उनके परिणामों पर गंभीर चिंतन करने का दिन है। आज का स्थापना दिवस और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी माह की बीस तारीख को पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय बाबूसा. कर्पूर चन्द्र कुलिश के ‘जन्मशती पर्व’ का समापन होगा।
विश्वसनीयता का रस वही
समय के साथ अखबार बड़ा तो हुआ, किन्तु विश्वसनीयता का रस वही है जो हमें जन्मघूंटी में पिलाया गया था। पाठक आज भी हमारा ईश्वर है। उसका सम्मान लेखन सामग्री से नित्य किया जाता है। पत्रिका, पाठक के परिवार का ऐसा अंग है, जो उसे देश की माटी और संस्कृति से जोड़े रखता है। आज हमारा लोकतंत्र और शिक्षा प्रणाली धर्मनिरपेक्ष है। अत: मोक्ष भी बाहर हो गया। रह गया काम और अर्थ। श्रुति कहती है कि अव्यक्त आत्मा के विकसित होने के कारण ही मानव को मानव कहा है। शरीर-मन-बुद्धि में तो कई प्राणी मनुष्य से आगे होते हैं। शिक्षा में इस अव्यक्त तत्व की चर्चा ही नहीं है। तब मानव का निर्माण कैसे होगा? अर्थ और काम की लिप्सा के कारण लक्ष्यविहीन मानव अपनी मानवता से दूर जा रहा है। दूसरी ओर शिक्षा व्यक्ति के एकल जीवन की आवश्यकता को बढ़ा रही है। नौकरी, ट्रांसफर जैसे वे कारण है, जिनसे समाज-परिवार विखण्डित हो रहे हैं। तकनीक तो उसे स्वयं से भी दूर धकेल रही है। सरकारें भी लाभ को ही नीतियों में प्राथमिकता देती है। नशाखोरी-माफिया- भ्रष्टाचार ही रह गया है। ऐसे में हर क्षेत्र में विकास एवं समस्या निस्तारण के लिए मीडिया ही एक सहारा दिखाई पड़ता है। पत्रिका वह सहारा बना हुआ है।
कई शहरों में चल रहे कार्यक्रम
पिछले एक साल से तो श्रद्धेय बाबूसा. की ‘शताब्दी पर्व’ के रूप में हमारे आयोजन राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के साथ देश के अन्य शहरों में भी चल रहे हैं। पत्रिका आज भी जनता और सरकार के बीच विश्वासनीय इकाई है। सत्ता के गलियारों से लेकर गांव की चौपालों तक हमने हर आवाज को महत्व दिया है। पत्रिका का हर अंक लोकतंत्र की शक्ति के साथ, भारतीय संस्कृति की मशाल को थामे दिखाई पड़ता है। नई पीढ़ी को पुरातन ज्ञान से भी परिचित करा रहा है। स्वयं बाबूसा. ने वेद विज्ञान की अलख जगा रखी थी।
आज पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने जैसी हो गई। राष्ट्रीय चेतना का स्थान निजी व्यावसायिकता ने ले लिया। सब अर्थ और काम के शिकंजे में आते जा रहे हैं। मीडिया, सरकार और जनता के मध्य का सेतु है। अर्थलाभ ने मीडिया को चौथा पाया कहकर सरकार का अंग बना दिया है। श्रद्धेय बाबूसा. कहते थे कि अखबार कागज की नाव है। इसमें एक छोटा छेद भी नाव को ले डूबता है। पत्रिका ने नए परिवेश एवं पुरुष प्रधान शिक्षा के प्रभाव से समाज में बढ़ते असंतुलन, पश्चिमी भोगवाद-उपभोगवाद और शरीर-प्रधान जीवनशैली में बदलाव को भी लक्षित किया है। परिवर्तन के साथ बने रहते हुए भी श्रेष्ठ भारतीय स्त्री-पुरुष की परिपक्वता का बोध बनाए रखना भी जरूरी है। अपनी स्थापना से ही पत्रिका लगातार पाठकों की आवाज बनता रहा है। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट व राज्यों के हाईकोर्ट तक हमारी खबरों पर प्रसंज्ञान लेते रहे हैं। राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेेश व छत्तीसगढ़ और हमारे प्रकाशन वाले सभी राज्यों में पत्रिका आज पाठकों की पहली पसंद यों ही नहीं बन गया। राजस्थान में जयपुर समेत दूसरे शहरों के मास्टर प्लान की अनदेखी का मामला हो या फिर जयपुर के रामगढ़ बांध की पीड़ा उजागर करने का-पत्रिका सदैव जनता के साथ रहा। आपने देखा इस बार तो राजस्थान सरकार ने भी हमारे जलसंरक्षण अभियान अमृतं जलम् को एक तरह से अपना कार्यक्रम बनाकर इसकी शुरुआत रामगढ़ बांध के पुनरुद्धार से की।


