Rajasthan Panchayat Elections : राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनाव पर बड़ी उलझन, सरकार उठा सकती है यह कदम, कब होंगे जानिए

Rajasthan Panchayat Elections : राजस्थान में पंचायत-निकाय चुनाव पर बड़ी उलझन, सरकार उठा सकती है यह कदम, कब होंगे जानिए

Rajasthan Panchayat Nikay Elections : राजस्थान हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की ओर से 15 अप्रैल तक पंचायत और निकाय चुनाव कराने की तय समय-सीमा समाप्त होने में अब मात्र 33 दिन शेष हैं, लेकिन राज्य सरकार अभी तक चुनाव कराने को लेकर स्पष्ट निर्णय नहीं ले सकी है। इस बीच राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायत चुनाव में संभावित देरी के लिए राज्य सरकार को ही न्यायालय की अवमानना का जिम्मेदार ठहरा दिया है।

इसी कानूनी स्थिति को देखते हुए शुक्रवार को मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने पंचायत राज, नगरीय विकास विभाग, राज्य निर्वाचन आयोग के सचिव, ओबीसी आयोग और महाधिवक्ता की बैठक बुलाई थी। सभी अधिकारी मुख्य सचिव कार्यालय पहुंच गए, लेकिन अंतिम समय पर बैठक निरस्त कर दी गई।

सूत्रों के अनुसार वार्ड आरक्षण को लेकर ओबीसी आयोग की रिपोर्ट अभी लंबित है। बताया जा रहा है कि जनाधार डेटा के अनुसार करीब 400 ग्राम पंचायतों में ओबीसी आबादी शून्य पाई गई है, जिसके कारण आयोग को दोबारा सर्वे कराना पड़ सकता है। सर्वे, रिपोर्ट और अन्य औपचारिकताओं में लगभग एक माह का समय लगने की संभावना है। ऐसे में 15 अप्रैल तक चुनाव कराना मुश्किल माना जा रहा है। इसी कारण राज्य सरकार समय-सीमा बढ़ाने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर विचार कर रही है।

आयोग पर भी अवमानना का खतरा

पंचायत चुनाव को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग ने पत्र लिखकर देरी की स्थिति में राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया दिया है, लेकिन निकाय चुनाव की तैयारी में देरी को लेकर आयोग खुद भी कानूनी मुश्किल में फंस सकता है।

पूर्व विधायक संयम लोढ़ा आयोग को पहले ही नोटिस भेजकर चेतावनी दे चुके हैं कि अदालत ने चुनाव कराने के लिए 15 अप्रैल तक का समय दिया था, जबकि आयोग ने मतदाता सूचियों के अंतिम प्रकाशन की तिथि ही 22 अप्रैल निर्धारित कर रखी है।

इसके अलावा आयोग अभी तक करीब 113 निकायों में मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू नहीं कर सका है। ऐसे में आयोग को भी न्यायालय की अवमानना का सामना करना पड़ सकता है।

जन प्रतिनिधि दूर, प्रशासकों की मौज

पंचायत चुनाव समय पर नहीं होने से कई स्थानों पर प्रशासनिक व्यवस्थाएं प्रभावित हो रही हैं। वहीं नगरीय निकायों में चुनाव नहीं होने के कारण पहले ही अधिकारियों को प्रशासक के रूप में जिम्मेदारी सौंप जा चुकी है।

जनप्रतिनिधियों के अभाव में निकायों का संचालन फिलहाल प्रशासनिक अधिकारियों के हाथों में है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों और वित्तीय निगम में जनप्रतिनिधियों की भागीदारी नहीं हो पा रही है।

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