राजस्थान पंचायत चुनाव अपडेट: दो से अधिक संतान नियम में ढील, गांव-गांव में नई हलचल, बदलेगा समीकरण

राजस्थान पंचायत चुनाव अपडेट: दो से अधिक संतान नियम में ढील, गांव-गांव में नई हलचल, बदलेगा समीकरण

Rajasthan Panchayat Elections Update : बस्सी। प्रदेश की पंचायत और निकाय राजनीति में बड़ा बदलाव करते हुए मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की कैबिनेट ने दो से अधिक संतान वाले उम्मीदवारों पर लगी रोक हटाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। करीब तीस साल से चुनावी मैदान से बाहर रहे हजारों ग्रामीण व शहरी नेता अब फिर सक्रिय राजनीति में उतर सकेंगे।

यह नियम तीन दशक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से लागू किया था। इसके तहत पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य और नगर निकाय पार्षद पद के लिए दो से अधिक संतान वालों को अयोग्य घोषित किया गया था। ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े परिवार आम होने के कारण इसका व्यापक असर पड़ा और कई प्रभावशाली जमीनी नेता राजनीति से बाहर हो गए।

जयपुर ग्रामीण में बदलेगा समीकरण

जयपुर ग्रामीण की 22 पंचायत समितियों में ऐसे अनेक पूर्व जनप्रतिनिधि हैं, जो केवल संतान संख्या के कारण चुनाव नहीं लड़ पा रहे थे। बस्सी, जमवारामगढ़, चाकसू, विराटनगर, शाहपुरा और आमेर क्षेत्रों में पुराने सरपंच और पंचायत समिति सदस्य अब फिर से सक्रिय होने लगे हैं। जानकारों का मानना है कि आगामी चुनावों में मुकाबला पहले से अधिक रोचक होगा और अनुभवी चेहरों की वापसी से समीकरण बदलेंगे।

परोक्ष राजनीति का अंत?

इस नियम के चलते कई नेताओं ने अपने स्थान पर परिजनों को चुनाव लड़वाया। कागजों में प्रतिनिधि कोई और होता था, जबकि निर्णय पुराने नेता ही लेते थे। इससे पंचायतों में परोक्ष शासन की स्थिति बनी रही। अब रोक हटने से वे स्वयं मैदान में उतर सकेंगे। इससे पारदर्शिता बढ़ने और मतदाता को सीधे निर्णय लेने वाले व्यक्ति को चुनने का अवसर मिलने की उम्मीद है।

झूठे शपथ पत्रों का विवाद भी थमेगा

दो से अधिक संतान के नियम से बचने के लिए कुछ मामलों में शपथ पत्रों में गलत जानकारी देने के आरोप भी लगे। विरोधियों द्वारा शिकायतें और मुकदमे दर्ज होने से कई जनप्रतिनिधि कानूनी उलझनों में फंसे रहे। नियम हटने से ऐसे विवादों और प्रशासनिक अस्थिरता पर विराम लगने की संभावना है।

जनसंख्या नियंत्रण से सामाजिक जागरूकता की ओर

विशेषज्ञों का मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण जैसे विषय कानून से अधिक सामाजिक जागरूकता से प्रभावी होते हैं। शिक्षा और बदलती सामाजिक परिस्थितियों के बीच सरकार ने इसे अप्रासंगिक मानते हुए समाप्त किया है।

गांव-गांव में नई हलचल

फैसले के बाद बस्सी और आसपास के क्षेत्रों में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कई पूर्व सरपंच और पंचायत प्रतिनिधि समर्थकों के साथ बैठकों में जुट गए हैं। माना जा रहा है कि अनुभवी जनप्रतिनिधियों की वापसी से प्रशासनिक समझ और योजनाओं के क्रियान्वयन में गति आ सकती है। तीन दशक बाद हटे इस प्रावधान ने पंचायत और निकाय चुनावों को नया मोड़ दे दिया है। अब संतान संख्या नहीं, बल्कि अनुभव, कार्यक्षमता और जनसमर्थन ही चुनावी कसौटी बनेंगे।

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