सहरसा के डीबी रोड निवासी 35 वर्षीय राहुल गौरब ने पारंपरिक नौकरी छोड़कर मशरूम की खेती में बड़ी सफलता हासिल की है। कॉलेज में लेक्चरर की सुरक्षित नौकरी छोड़कर उन्होंने न सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि सालाना लाखों रुपये की कमाई भी कर रहे हैं। उनकी यह पहल कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। राहुल गौरब ने अंग्रेजी विषय में पीएचडी की है। वर्ष 2016 तक वे पटना जिले के बाढ़ स्थित एएनएस कॉलेज में लेक्चरर के पद पर कार्यरत थे। इसी दौरान उनके मन में कुछ नया करने का विचार आया। उन्होंने सहरसा स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र, अगवानपुर से मशरूम की खेती का प्रशिक्षण लिया और अपनी नौकरी छोड़कर पूरी तरह मशरूम उत्पादन में जुट गए। 4 क्विंटल से अधिक का उत्पादन
राहुल बताते हैं कि शुरुआत में उनके पास एक रेस्टोरेंट था, जहां वे बाहर से मंगाए गए क्रेन मशरूम का उपयोग करते थे। पटना से आने वाले मशरूम में सफाई के लिए अधिक केमिकल का उपयोग होता था, जिससे स्वाद प्रभावित होता था। इसी वजह से उन्होंने स्थानीय स्तर पर शुद्ध मशरूम उत्पादन का फैसला किया। आज वे नियमित रूप से 400 किलो से अधिक मशरूम का उत्पादन कर रहे है गुलाब जामुन जैसे अनोखे प्रयोग भी किए
मात्र सब्जी तक सीमित न रहकर राहुल ने मशरूम से वैल्यू एडेड प्रोडक्ट तैयार करने पर ध्यान दिया। उन्होंने पंजाब की एक कंपनी से परामर्श लेकर मशरूम से बच्चों के लिए कैविटी-फ्री टॉफी, कम मीठी चॉकलेट और अन्य हेल्दी उत्पाद बनाना सीखा। इसके बाद उन्होंने मशरूम से गुलाब जामुन जैसे अनोखे प्रयोग भी किए, जिन्हें लोगों ने खूब पसंद किया। सोशल मीडिया से देशभर में सप्लाई कर रहे
आज राहुल अपने मशरूम और उससे बने उत्पादों को इंडियामार्ट और सोशल मीडिया के जरिए देशभर में सप्लाई कर रहे हैं। उन्हें बर्थडे पार्टी और अन्य आयोजनों के लिए 10 हजार रुपये तक के ऑर्डर नियमित रूप से मिल रहे हैं। विभागीय सहयोग से वे सालाना करीब एक हजार किलो मशरूम का उत्पादन कर रहे हैं। राहुल गौरब की यह सफलता न सिर्फ किसानों, बल्कि पढ़े-लिखे युवाओं के लिए भी एक प्रेरणा है कि नवाचार और कड़ी मेहनत से खेती भी मुनाफे का एक बड़ा जरिया बन सकती है। सहरसा के डीबी रोड निवासी 35 वर्षीय राहुल गौरब ने पारंपरिक नौकरी छोड़कर मशरूम की खेती में बड़ी सफलता हासिल की है। कॉलेज में लेक्चरर की सुरक्षित नौकरी छोड़कर उन्होंने न सिर्फ खुद को आत्मनिर्भर बनाया, बल्कि सालाना लाखों रुपये की कमाई भी कर रहे हैं। उनकी यह पहल कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। राहुल गौरब ने अंग्रेजी विषय में पीएचडी की है। वर्ष 2016 तक वे पटना जिले के बाढ़ स्थित एएनएस कॉलेज में लेक्चरर के पद पर कार्यरत थे। इसी दौरान उनके मन में कुछ नया करने का विचार आया। उन्होंने सहरसा स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र, अगवानपुर से मशरूम की खेती का प्रशिक्षण लिया और अपनी नौकरी छोड़कर पूरी तरह मशरूम उत्पादन में जुट गए। 4 क्विंटल से अधिक का उत्पादन
राहुल बताते हैं कि शुरुआत में उनके पास एक रेस्टोरेंट था, जहां वे बाहर से मंगाए गए क्रेन मशरूम का उपयोग करते थे। पटना से आने वाले मशरूम में सफाई के लिए अधिक केमिकल का उपयोग होता था, जिससे स्वाद प्रभावित होता था। इसी वजह से उन्होंने स्थानीय स्तर पर शुद्ध मशरूम उत्पादन का फैसला किया। आज वे नियमित रूप से 400 किलो से अधिक मशरूम का उत्पादन कर रहे है गुलाब जामुन जैसे अनोखे प्रयोग भी किए
मात्र सब्जी तक सीमित न रहकर राहुल ने मशरूम से वैल्यू एडेड प्रोडक्ट तैयार करने पर ध्यान दिया। उन्होंने पंजाब की एक कंपनी से परामर्श लेकर मशरूम से बच्चों के लिए कैविटी-फ्री टॉफी, कम मीठी चॉकलेट और अन्य हेल्दी उत्पाद बनाना सीखा। इसके बाद उन्होंने मशरूम से गुलाब जामुन जैसे अनोखे प्रयोग भी किए, जिन्हें लोगों ने खूब पसंद किया। सोशल मीडिया से देशभर में सप्लाई कर रहे
आज राहुल अपने मशरूम और उससे बने उत्पादों को इंडियामार्ट और सोशल मीडिया के जरिए देशभर में सप्लाई कर रहे हैं। उन्हें बर्थडे पार्टी और अन्य आयोजनों के लिए 10 हजार रुपये तक के ऑर्डर नियमित रूप से मिल रहे हैं। विभागीय सहयोग से वे सालाना करीब एक हजार किलो मशरूम का उत्पादन कर रहे हैं। राहुल गौरब की यह सफलता न सिर्फ किसानों, बल्कि पढ़े-लिखे युवाओं के लिए भी एक प्रेरणा है कि नवाचार और कड़ी मेहनत से खेती भी मुनाफे का एक बड़ा जरिया बन सकती है।


