रमजान के चौथे रोजे के अवसर पर जोकीहाट प्रखंड क्षेत्र के पथराबाड़ी गांव में एक मरहूम हाफिज के योमे वफात पर कुरआनखानी का आयोजन किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, उलेमा और अकीदतमंद मौजूद रहे। सभी ने मरहूम की मगफिरत के लिए कुरआनखानी कर दुआएं मांगीं। जानकारी के अनुसार, मरहूम का इंतकाल 21 फरवरी 2025 को हुआ था, जिसके बाद 22 फरवरी 2025 को उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया था। उनके निधन से पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई थी। मरहूम ने 12 वर्षों से अधिक समय तक दिल्ली के मोती मस्जिद, कनॉट प्लेस में इमामत की। उन्होंने अपनी इमामत और अखलाक से लोगों के दिलों में एक खास जगह बनाई थी। बताया जाता है कि 90 के दशक में वे अपने इलाके के लोगों के लिए एक सहारा और छांव की तरह थे। जोकीहाट प्रखंड और आसपास के कई गांवों के लोग जब दिल्ली जाते थे, तो उनके यहां ठहरते थे। वे लोगों के रहने, खाने और अन्य सुविधाओं का इंतजाम सेवा भाव से करते थे। उनकी मेहमाननवाजी और नेकदिली को लोग आज भी याद करते हैं। उनके पिता भी अपने पंचायत के लंबे समय तक मुखिया रहे थे और क्षेत्र में एक सम्मानित व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते थे। कुरआनखानी के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने मरहूम के लिए मगफिरत और जन्नतुल फिरदौस में आला मुकाम की दुआ की। रमजान के चौथे रोजे के अवसर पर जोकीहाट प्रखंड क्षेत्र के पथराबाड़ी गांव में एक मरहूम हाफिज के योमे वफात पर कुरआनखानी का आयोजन किया गया। इस मौके पर बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, उलेमा और अकीदतमंद मौजूद रहे। सभी ने मरहूम की मगफिरत के लिए कुरआनखानी कर दुआएं मांगीं। जानकारी के अनुसार, मरहूम का इंतकाल 21 फरवरी 2025 को हुआ था, जिसके बाद 22 फरवरी 2025 को उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया था। उनके निधन से पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई थी। मरहूम ने 12 वर्षों से अधिक समय तक दिल्ली के मोती मस्जिद, कनॉट प्लेस में इमामत की। उन्होंने अपनी इमामत और अखलाक से लोगों के दिलों में एक खास जगह बनाई थी। बताया जाता है कि 90 के दशक में वे अपने इलाके के लोगों के लिए एक सहारा और छांव की तरह थे। जोकीहाट प्रखंड और आसपास के कई गांवों के लोग जब दिल्ली जाते थे, तो उनके यहां ठहरते थे। वे लोगों के रहने, खाने और अन्य सुविधाओं का इंतजाम सेवा भाव से करते थे। उनकी मेहमाननवाजी और नेकदिली को लोग आज भी याद करते हैं। उनके पिता भी अपने पंचायत के लंबे समय तक मुखिया रहे थे और क्षेत्र में एक सम्मानित व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते थे। कुरआनखानी के अंत में सभी उपस्थित लोगों ने मरहूम के लिए मगफिरत और जन्नतुल फिरदौस में आला मुकाम की दुआ की।


