पुतिन के सबसे वफादार दोस्त ने बदला पाला! एशिया में भारत की तरह ‘प्लान-B’ पर वियतनाम कर रहा काम

पुतिन के सबसे वफादार दोस्त ने बदला पाला! एशिया में भारत की तरह ‘प्लान-B’ पर वियतनाम कर रहा काम

Vietnam on Russian weapons dependency: एशिया में भारत जिस तरह रूसी हथियारों पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, उसी दिशा में अब उसके सबसे वफादार मित्र वियतनाम भी कदम बढ़ा रहा है। वियतनाम की सेना लंबे समय से रूसी लड़ाकू विमानों और हथियारों पर निर्भर रही है। लेकिन हाल के वर्षों में हनोई ने हथियार खरीद में विविधता लाने और पश्चिमी देशों से तकनीक हासिल करने की योजना बनाई है।

रूसी हथियारों से पश्चिमी विकल्पों की ओर

वियतनाम की वायुसेना में वर्तमान में 16 Su-22M4, 9 Su-22UM3K ट्रेनर, 5 Su-27SK, 5 Su-27UBK ट्रेनर, 35 Su-30MK2 मल्टीरोल फाइटर और 12 Yak-130 ट्रेनर विमान हैं। सेना की अन्य शाखाओं में भी सोवियत और रूसी मूल के हथियार प्रमुख रूप से इस्तेमाल होते रहे हैं। हालांकि 2022 के बाद वियतनाम ने रूस पर निर्भरता कम करने का निर्णय लिया।

रिपोर्ट के अनुसार, वियतनाम अब फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की कोशिश में जुटा है। इसके अलावा, रूस से अतिरिक्त T-90S टैंकों के बजाय उसने इजराइल की मदद से अपने पुराने T-54 और T-55 टैंकों को आधुनिक बनाने का विकल्प चुना है।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 2016 में वियतनाम पर लगे हथियार प्रतिबंध को हटा दिया। इसके बाद वियतनाम ने लगभग 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के अमेरिकी सैन्य उपकरण खरीदे हैं, जिनमें तटरक्षक जहाज और प्रशिक्षण विमान शामिल हैं। वियतनाम अब C-130J परिवहन विमानों को खरीदने पर भी विचार कर रहा है।

पश्चिमी प्लेटफॉर्म अपनाने की चुनौतियां

वियतनाम के लिए पश्चिमी हथियार अपनाना आसान नहीं होगा। इसके लिए एयरबेस इन्फ्रास्ट्रक्चर में व्यापक बदलाव और नए गोला-बारूद का निर्माण करना होगा। मौजूदा रूसी भंडार फ्रांसीसी विमानों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इसके अलावा, राफेल विमानों का उत्पादन और डिलीवरी भी मांग के चलते लंबी प्रक्रिया है। पहले विमान के वियतनामी वायुसेना में शामिल होने की संभावना इस दशक के अंत से पहले कम ही है।

इसके बावजूद, वियतनाम का दक्षिण कोरियाई K9 155-mm सेल्फ-प्रोपेल्ड होवित्जर खरीदने का फैसला भी यह दर्शाता है कि हनोई अपने सशस्त्र बलों को धीरे-धीरे ‘नाटो-संगत’ प्रणालियों की ओर मोड़ने का इरादा रखता है। इस कदम के साथ रूस अपने पारंपरिक हथियार बाजार और क्षेत्रीय साझेदार दोनों खो सकता है।

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