सिरोही जिला मुख्यालय पर गुरुवार को विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने एक बड़ा धरना-प्रदर्शन आयोजित किया। इस प्रदर्शन में क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग मोर्चा, बहुजन क्रांति मोर्चा, भारत मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय परिवर्तन मोर्चा और भारतीय विद्यार्थी मोर्चा सहित सैकड़ों कार्यकर्ता शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने ओबीसी समुदाय की जाति-आधारित जनगणना, चुनावों में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर के उपयोग और आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन अधिकारों की रक्षा की मांग की। यह प्रदर्शन लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों पर कथित हमलों के विरोध में आयोजित किया गया था। बहुजन क्रांति मोर्चा के जिला संयोजक और वरिष्ठ अधिवक्ता सुंदर लाल मोसलपुरिया ने इसका नेतृत्व किया। मोसलपुरिया ने कहा, “यह धरना सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा का आंदोलन है। सरकारें साजिश रचकर हमारे अधिकारों को कुचल रही हैं, लेकिन हम चुप नहीं बैठेंगे।” उन्होंने ओबीसी समुदाय की सही गिनती और आबादी के अनुपात में हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की मांग दोहराई। प्रदर्शन के दौरान ‘ओबीसी की गिनती करो, न्याय दो’, ‘ईवीएम हटाओ, लोकतंत्र बचाओ’ और ‘जल-जंगल-जमीन आदिवासियों का अधिकार’ जैसे नारे लगाए गए। प्रदर्शन स्थल पर इन मांगों को उजागर करने वाले बैनर और पोस्टर भी लगाए गए थे। प्रदर्शन का एक प्रमुख मुद्दा ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) की जाति-आधारित जनगणना था। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि वर्तमान व्यवस्था में ओबीसी समुदाय की सही संख्या का आकलन नहीं हो पा रहा है, जिससे उन्हें शिक्षा, नौकरी और राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा। एडवोकेट दशरथ सिंह आढ़ा ने कहा, “ओबीसी भारत की बड़ी आबादी है, लेकिन उनकी हिस्सेदारी नगण्य है। यह सामाजिक न्याय की हत्या है।”
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा है। भारत मुक्ति मोर्चा के जिलाध्यक्ष डॉ. आसुराम लूनिया ने ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) पर सवाल उठाते हुए बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की। उनका आरोप है कि ईवीएम में छेड़छाड़ की संभावना रहती है, जो लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। “ईवीएम से चुनाव में धांधली आसान है, जबकि बैलेट पेपर पारदर्शी है। हम चाहते हैं कि चुनाव आयोग इस पर तुरंत विचार करे,” एडवोकेट गोविंद राणा ने कहा यह मांग हाल के चुनावी विवादों के संदर्भ में और भी प्रासंगिक लग रही है, जहां कई राजनीतिक दलों ने ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।
राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद के मोहन लाल मीणा ने सरकार पर आरोप लगाया कि आदिवासियों को उनके पारंपरिक जल, जंगल और जमीन से जबरन बेदखल किया जा रहा है। विकास परियोजनाओं के नाम पर वनों की कटाई और भूमि अधिग्रहण को रोकने की मांग की गई। “आदिवासी हमारे देश की मूल निवासी हैं, लेकिन उन्हें उनके ही संसाधनों से वंचित किया जा रहा है। यह अन्याय बंद होना चाहिए। क्षत्रिय मूलनिवासी महासंघ के राष्ट्रीय महासचिव राजेंद्र सिंह परमार ने कहा क्षत्रिय समाज को फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और तथाकथित धार्मिक ग्रंथों के माध्यम से क्षत्रिय समुदाय की छवि को विकृत करने के खिलाफ भी यह धरना प्रदर्शन है। परमार ने कहा, “यह चरित्र हनन सुनियोजित षड्यंत्र है, जो हमारे इतिहास और संस्कृति को बदनाम कर रहा है। हम मांग करते हैं कि ऐसी सामग्री पर तत्काल रोक लगाई जाए।” इस धरना-प्रदर्शन का एक प्रमुख कारण हाल ही में ओडिशा के कटक में प्रस्तावित बामसेफ (बैकवर्ड एंड माइनॉरिटीज कम्युनिटीज एम्प्लॉयी फेडरेशन) और भारत मुक्ति मोर्चा का राष्ट्रीय अधिवेशन का रद्द होना भी है।
कार्यकर्ताओं ने शांतिपूर्वक अपनी मांगें रखीं और धरना समाप्त होने से पहले एक संयुक्त ज्ञापन तैयार कर राष्ट्रपति के नाम जिला कलेक्टर को सौंपा। इसमें सभी मांगों को विस्तार से उल्लेख किया गया है। विभिन्न मोर्चों के प्रतिनिधियों ने कहा कि यह सिर्फ शुरुआत है और अगर मांगें नहीं मानी गईं तो आगे और बड़े प्रदर्शन किए जाएंगे।


