Harish Rana Passive Euthanasia Case : सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हरीश राणा को शनिवार को एम्स दिल्ली में शिफ्ट किया गया है। यह भारत में पहली बार किसी व्यक्ति के लिए इच्छामृत्यु की प्रक्रिया शुरू हुई है। हरीश 13 साल से स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हरीश को उनके घर से एम्स दिल्ली के पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती किया गया। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी देखभाल कर रही है। मीडिया सूत्रों के अनुसार, लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पैलिएटिव केयर में उनका दर्द प्रबंधन (पेन मैनेजमेंट) किया जाएगा। कोई नया लाइफ सपोर्ट नहीं दिया जाएगा। धीरे-धीरे फीडिंग ट्यूब और अन्य सपोर्ट हटाए जाएंगे, ताकि प्राकृतिक मौत हो सके। एम्स ने एक एक्सपर्ट कमिटी बनाई है, जो इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगी।
पिता अशोक राणा का दर्द भरा बयान
हरीश के पिता अशोक राणा ने कहा कि एम्स में विशेषज्ञों की देखरेख में लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। हरीश को सांस, खाना और मल-त्याग के लिए नलियां लगी हैं। बेटा अब हमें छोड़कर जा रहा है। राहत सिर्फ इतनी है कि उसे सम्मानजनक मौत मिलेगी। पिता खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनकी आंखों में दर्द साफ दिखता है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और के.वी. विश्वनाथन) ने हरीश के माता-पिता की याचिका पर फैसला सुनाया। कोर्ट ने क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन (CANH) को मेडिकल ट्रीटमेंट माना और इसे हटाने की इजाजत दी। यह फैसला राइट टू डाई विद डिग्निटी (गरिमा के साथ मरने का अधिकार) पर आधारित था। कोर्ट ने कहा कि जब रिकवरी की कोई संभावना न हो तो मरीज को लंबे समय तक पीड़ा में रखना सही नहीं। यह भारत में पैसिव यूथेनेशिया का पहला व्यावहारिक मामला है।
एम्स में शिफ्ट और पैलिएटिव केयर
सोसाइटी और लोगों का गम
जब सोसाइटी के लोगों को यह खबर पता चली तो पूरा माहौल बदल गया। पिछले कई दिनों से दूर-दूर से लोग हरीश को देखने और परिवार को हिम्मत देने आ रहे थे। अब सब शांत और उदास हैं। यह खबर सुनकर हर कोई भावुक हो गया। परिवार ने 13 साल तक इंतजार किया और अब बेटे को अलविदा कहने की तैयारी में है।
हरीश राणा के साथ क्या हुआ था?
हरीश राणा गाजियाबाद के रहने वाले 32 साल के युवक हैं। साल 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में बी.टेक पढ़ते समय वे चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे में उन्हें गंभीर सिर की चोट लगी और वे क्वाड्रिप्लेजिया (पूर्ण लकवा) का शिकार हो गए। तब से वे कोमा में थे और जीवन रक्षक उपकरणों पर जीवित थे। उनके शरीर में सांस लेने, खाना पचाने और मल-त्याग के लिए नलियां लगी हुई थीं। डॉक्टरों ने कहा था कि ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है।


