तस्वीरें डरावनी हैं। पहली नजर मेंलगेगा कि आसमान से बादलजमीन पर उतर आए हैं, लेकिन हकीकत में यह मौत का झाग है।भगवान वामन की कर्मभूमि औरतर्पण के लिए विख्यात पुनपुन-गंगा संगम अब प्रदूषण की भेंट चढ़चुका है। फतुहा में पुनपुन नदी काहाल दिल्ली की यमुना जैसा हो गया है—काला पानी, सफेद जहरीलाझाग और सड़ांध मारती हवा।सरकार दावा करती है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों को बचानेके लिए अरबों रुपए पानी की तरहबहाए जा रहे हैं। लेकिन, फतुहा का संगम स्थल चीख-चीख कर कहरहा है कि ‘नमामि गंगे’ परियोजना जमीन पर फेल हो चुकी है। यहकेवल नदियों का प्रदूषण नहीं,बल्कि जनमानस की आस्था केसाथ सीधा खिलवाड़ है। अब आंदोलन ही रास्ता?विधान परिषद की रिपोर्ट कूड़ेदान मेंहै और प्रशासन कुंभकर्णी नींद सोरहा है। स्थानीय लोगों ने अबआर-पार की लड़ाई का मन बनालिया है। अगर सरकार ने जल्द हीट्रीटमेंट प्लांट को चालू नहीं कियाऔर प्रदूषण नहीं रोका, तो फतुहा कीसड़कों पर बड़ा जन आंदोलनदेखने को मिलेगा। तस्वीरें डरावनी हैं। पहली नजर मेंलगेगा कि आसमान से बादलजमीन पर उतर आए हैं, लेकिन हकीकत में यह मौत का झाग है।भगवान वामन की कर्मभूमि औरतर्पण के लिए विख्यात पुनपुन-गंगा संगम अब प्रदूषण की भेंट चढ़चुका है। फतुहा में पुनपुन नदी काहाल दिल्ली की यमुना जैसा हो गया है—काला पानी, सफेद जहरीलाझाग और सड़ांध मारती हवा।सरकार दावा करती है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों को बचानेके लिए अरबों रुपए पानी की तरहबहाए जा रहे हैं। लेकिन, फतुहा का संगम स्थल चीख-चीख कर कहरहा है कि ‘नमामि गंगे’ परियोजना जमीन पर फेल हो चुकी है। यहकेवल नदियों का प्रदूषण नहीं,बल्कि जनमानस की आस्था केसाथ सीधा खिलवाड़ है। अब आंदोलन ही रास्ता?विधान परिषद की रिपोर्ट कूड़ेदान मेंहै और प्रशासन कुंभकर्णी नींद सोरहा है। स्थानीय लोगों ने अबआर-पार की लड़ाई का मन बनालिया है। अगर सरकार ने जल्द हीट्रीटमेंट प्लांट को चालू नहीं कियाऔर प्रदूषण नहीं रोका, तो फतुहा कीसड़कों पर बड़ा जन आंदोलनदेखने को मिलेगा।


