इंदौर-इच्छापुर हाईवे की अधूरी टनल से गुजर रहे लोग:सुरंग के भीतर पहाड़ से रिसता पानी- कच्ची रोड और घना अंधेरा, सुरक्षा के इंतजाम जीरो

इंदौर-इच्छापुर हाईवे की अधूरी टनल से गुजर रहे लोग:सुरंग के भीतर पहाड़ से रिसता पानी- कच्ची रोड और घना अंधेरा, सुरक्षा के इंतजाम जीरो

न कोई गार्ड, न मजबूत बैरिकेडिंग, न चेतावनी का कोई बोर्ड… बस है तो मौत को खुला न्योता देती एक अधूरी, कच्ची सुरंग और उसमें से अपनी जान जोखिम में डालकर फर्राटे से गुजरते बाइक सवार। यह भयावह मंजर इंदौर से महज 36 किलोमीटर दूर खंडवा हाईवे पर बन रही चोरल टनल का है। यह वही सुरंग है, जिसका काम छह महीने पहले दो मजदूरों की मलबे में दबकर हुई दर्दनाक मौत के बाद से बंद पड़ा है। लेकिन सिस्टम की लापरवाही इतनी ज्यादा है कि आज भी यह सुरंग आम लोगों के लिए एक ‘शॉर्टकट’ बनी हुई है, जो कभी भी किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। इस जानलेवा लापरवाही की हकीकत को देखने जब दैनिक भास्कर की टीम मौके पर पहुंची, तो टीम के सामने ही कम से कम एक दर्जन बाइक सवार इस बंद टनल से निकले। भास्कर रिपोर्टर ने भी 15 मिनट तक इस अधूरी सुरंग में बाइक दौड़ाई, लेकिन कोई रोक टोक करने वाला नहीं था। जब इस मामले में एनएचएआई के अफसरों से बात की तो उनकी जानकारी में ये मामला ही नहीं है। सीन1: नाममात्र की रोक, बाइक सवारों की बेखौफ आवाजाही
चोरल गांव के पास, एक विशाल पहाड़ी को काटकर इस सुरंग का निर्माण किया जा रहा है। यह इंदौर-इच्छापुर फोरलेन प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसके पूरा होने पर यह प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी सड़क सुरंग कहलाएगी। इंदौर से जाने पर, निर्माण एजेंसी ‘मेगा इन्फ्रास्ट्रक्चर’ ने चोरल के बाहर एक डायवर्शन तो दिया है, लेकिन इसका इस्तेमाल हो ये देखने वाला कोई नहीं है। कारों को रोकने के लिए रास्ते में मिट्टी का एक ढेर लगा दिया गया है, जो किसी मजाक से कम नहीं लगता। बाइक सवारों के लिए यह ढेर कोई बाधा नहीं है। वे आसानी से इसके बगल से या ऊपर से अपनी बाइक निकालकर सुरंग की ओर बढ़ जाते हैं। हमारे देखते-देखते ही तीन से चार बाइकें यहां से गुजरीं। सीन 2: जहां मजदूरों की मौत, वहीं से गुजर रही जिंदगी
हम सुरंग के दूसरे छोर (खंडवा की ओर से आने वाले रास्ते) पर पहुंचे। यहां का नजारा और भी खौफनाक था। सामने मलबे का वही ढेर पड़ा था, जहां छह महीने पहले हुए हादसे ने दो मजदूरों की जान ले ली थी। उस त्रासदी के निशान आज भी ताजा थे। यहां भी वाहनों को रोकने के लिए मिट्टी का वैसा ही एक अस्थायी ढेर बना दिया गया था, लेकिन कोई सुरक्षाकर्मी तैनात नहीं था। तभी सुरंग के अंदर से दो बाइकें निकलीं, जिन पर चार युवक सवार थे। मिट्टी का ढेर देखकर वे चौंके और एक-दूसरे से बोले, सुबह तो यहां कुछ नहीं था, अभी किसने डाल दिया? थोड़ी मशक्कत के बाद उन्होंने अपनी बाइकें उस ढेर के ऊपर से निकाल लीं। जब हमने उनसे पूछा कि इस खतरनाक सुरंग से आना-जाना क्यों कर रहे हो, तो बोले- यह रास्ता छोटा पड़ता है। हम चोरल में ही रहते हैं और मंडी में काम करते हैं। सुबह भी यहीं से निकले थे। गांव के अंदर से घूमकर जाने में 7 किलोमीटर ज्यादा चलना पड़ता है और 10-15 मिनट फालतू लगते हैं। पेट्रोल भी बचता है। यहां से तो सभी निकलते हैं। सीन 3: 15 मिनट तक टनल में भास्कर टीम, कोई रोकने वाला नहीं
इन युवकों से बाइक लेकर हमने खुद इस लापरवाही की गहराई नापने का फैसला किया। हम सुरंग के अंदर दाखिल हुए। अंदर का माहौल डरावना था। सड़क पूरी तरह कच्ची और ऊबड़-खाबड़ थी। दीवारों से लगातार पानी रिस रहा था, जिससे कीचड़ और फिसलन हो गई थी। ऊपर देखने पर कच्ची चट्टानें किसी भी पल गिर जाने का एहसास करा रही थीं। हम एक सुरंग से दूसरी सुरंग तक करीब 15 मिनट तक घूमते रहे, लेकिन हमें एक भी सुरक्षाकर्मी या कंपनी का कोई जिम्मेदार व्यक्ति नहीं मिला, जिसने हमें रोका हो। अंदर हमें निर्माण कार्य में लगा एक कर्मचारी मिला। जब हमने उससे पूछा कि यहां लोग कैसे आ-जा रहे हैं, तो उसने बड़ी सहजता से कहा, “काम बंद है। यहां से सभी लोग आते-जाते हैं, कोई दिक्कत नहीं है। जब हमने उसे याद दिलाया कि यह सुरंग कच्ची है और कभी भी गिर सकती है, तो उसका जवाब सुनकर हम सन्न रह गए। उसने कहा, “यह तो रिस्क है ही। लोगों को खुद ध्यान रखना चाहिए कि वे इस रास्ते से न निकलें। क्यों जान जोखिम में डाल रहे लोग? 10 मिनट बचाने के लिए जिंदगी दांव पर: सुरंग के मुहाने पर करीब 20 मिनट रुकने के दौरान हमने छह से सात बाइक वालों को यहां से गुजरते देखा। उनका तर्क सीधा था – समय और पैसा बचाना। गांव के अंदर से जाने पर 7 किलोमीटर का लंबा चक्कर और 15 मिनट का अतिरिक्त समय लगता है। रोजाना मंडी आने-जाने वालों के लिए यह ‘शॉर्टकट’ एक आदत बन चुका है, भले ही इसकी कीमत जान हो। कमाई का धंधा बनाने का आरोप: ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि जब मुख्य सड़क पर ट्रैफिक जाम होता है, तो निर्माण एजेंसी के लोग कथित तौर पर बड़े वाहनों से पैसे लेकर उन्हें इसी अधूरी सुरंग से निकाल देते हैं। पीली मिट्टी का पहाड़, जो कभी भी धंस सकता है: चोरल के ही रहने वाले सचिन गुप्ता बताते हैं कि छह महीने पहले हुआ हादसा भी पानी के रिसाव के कारण ही हुआ था। उन्होंने कहा, यह पूरा पहाड़ पीली मिट्टी का है। बारिश में या पानी रिसने पर इसके धंसने का खतरा हमेशा बना रहता है। निर्माण कंपनी ने झाड़ा पल्ला, NHAI का रटा रटाया जवाब
इस टनल के निर्माण का ठेका ‘मेगा इन्फ्रास्ट्रक्चर’ के पास है। जब हमने कंपनी के अधिकारी चंदन पटेल से इस गंभीर लापरवाही पर सवाल किया, तो पहले तो वे इनकार करते रहे। जब उन्हें बताया गया कि हमारी टीम खुद मौके पर थी, तो उन्होंने बेतुका तर्क देते हुए कहा, ग्रामीणों को हम कैसे रोक सकते हैं? हमारे वाहन भी वहीं से निकलते हैं। लोग आ जाएं तो हम क्या करें? इस प्रोजेक्ट की निगरानी कर रही NHAI (भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर, प्रवीण यादव से जब बात की गई, तो उन्होंने भी एक सरकारी टाइप का जवाब दिया। उन्होंने कहा, टनल का काम चल रहा है। कुछ कारणों या अप्रूवल के कारण रुका हो सकता है। मैं दिखवा लेता हूं। अगर सुरक्षा के प्रबंध में कोई कमी है, तो उसे भी सुधारा जाएगा।

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