अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच 28 फरवरी से युद्ध जारी है। आज यानि 23 अप्रैल को युद्ध का 24वां दिन है। दोनों ओर से भीषण हमले जारी है। ईरान ने बीते दिनों इजरायल पर कलस्टर बम के जरिए हमला किया है। इजरायल में कई इलाकों में धमाके के आवाज सुनाई दिए गए हैं। दूसरी तरफ 24 दिनों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या कर दी गई। वहीं, 30 से अधिक टॉप ईरानी कमांडर मारे जा चुके हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने यह अल्टीमेटम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरानी ब्लॉकेड को लेकर दिया है। ट्रंप के अल्टीमेटम को 24 घंटे बीत चुके हैं। दूसरी तरफ, ट्रंप के बयान पर ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने कहा कि हम युद्ध के मैदान में जवाब देंगे। वह अमेरिकी धमकियों से नहीं डरते हैं।

युद्ध को तीन सप्ताह बीत चुके
अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए जा रहे हमलों को तीन सप्ताह हो चुके हैं। इस दौरान जिन लक्ष्यों को निशाना बनाया गया है, वे इस युद्ध के पीछे छिपे उद्देश्यों को समझने में महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। विश्लेषकों के अनुसार, इन हमलों से यह स्पष्ट होता है कि दोनों देशों की रणनीति बहु-स्तरीय है, लेकिन अभी तक कोई स्पष्ट अंतिम लक्ष्य सामने नहीं आया है।
क्या था शुरुआती हमलों का लक्ष्य
शुरुआती हमलों में मुख्य ध्यान ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने पर था। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के मिसाइल लॉन्चर, एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इसका उद्देश्य यह था कि ईरान की जवाबी कार्रवाई की क्षमता कम की जा सके और उसकी रक्षा प्रणाली को कमजोर कर दिया जाए। इस तरह के हमलों से ईरान की युद्ध क्षमता को धीरे-धीरे घटाने की कोशिश की जा रही है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम को लेकर पश्चिम की चिंता
इसके बाद हमलों का दायरा बढ़ाकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े ठिकानों तक पहुंचाया गया। लंबे समय से अमेरिका और इजरायल को यह चिंता रही है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित कर सकता है। इसलिए वे उसके परमाणु बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाकर इस संभावना को खत्म करना चाहते हैं। यह रणनीति भविष्य में संभावित खतरे को रोकने के लिए अपनाई गई मानी जाती है।
ईरान की क्षेत्रीय शक्ति को कम करना भी प्रमुख लक्ष्य
इसके अलावा, ईरान की क्षेत्रीय शक्ति को कम करना भी एक प्रमुख लक्ष्य है। ईरान विभिन्न देशों में अपने सहयोगी समूहों और मिलिशिया के जरिए प्रभाव बनाए रखता है। इन समूहों की क्षमता को कमजोर करने के लिए ईरान के सैन्य ढांचे और संबंधित संगठनों को निशाना बनाया जा रहा है। इससे पूरे मध्य पूर्व में उसके प्रभाव को सीमित करने की कोशिश की जा रही है।
इन हमलों का एक उद्देश्य ईरान के अंदर अस्थिरता पैदा करना हो सकता है। माना जा रहा है कि सैन्य और आर्थिक दबाव के जरिए आम जनता में असंतोष बढ़ाया जाए, जिससे सरकार के खिलाफ विरोध बढ़े और संभवतः शासन परिवर्तन की स्थिति पैदा हो सके। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, यह रणनीति आंतरिक विद्रोह को बढ़ावा देने पर भी केंद्रित हो सकती है।
इस्लामिक रीजिम की आर्थिक ढांचे को कमजोर करने की कोशिश
साथ ही, ऊर्जा और आर्थिक ढांचे को निशाना बनाना भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। तेल और गैस से जुड़े ठिकानों पर हमले करके ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था काफी हद तक ऊर्जा संसाधनों पर निर्भर है। इससे देश पर आर्थिक दबाव बढ़ता है और युद्ध में उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है।
हालांकि, इन सभी लक्ष्यों के बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल के बीच भी पूरी तरह से एक जैसी रणनीति नहीं है। कुछ संकेत यह भी बताते हैं कि दोनों देशों के उद्देश्यों में अंतर हो सकता है। जहां एक सीमित सैन्य लक्ष्य चाहता है, वहीं दूसरा व्यापक राजनीतिक बदलाव की दिशा में सोच सकता है।


