पाकिस्तान के इस्लामाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार, 23 फरवरी को एक बड़े फैसले में स्पष्ट किया है कि पूर्व न्यायाधीश जस्टिस तारिक महमूद जहांगीरी की नियुक्ति पूरी तरह गैरकानूनी थी, क्योंकि उनके पास वैध LLB की डिग्री नहीं थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हाईकोर्ट ने 116 पन्नों का विस्तृत फैसला जारी करते हुए कहा कि डिग्री मूल रूप से अमान्य थी, इसलिए वह न्यायालय के जज के रूप में नियुक्त ही नहीं हो सकते थे।
5 साल तक फर्जी डिग्री के आधार पर जज रहे जहांगीरी
बता दें की जहांगीरी को 30 दिसंबर 2020 को इस्लामाबाद हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया था। हालांकि सितंबर 2024 में उन्हें जज के रूप में कार्य करने से रोक दिया गया था, लेकिन अब कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाया है, जिसमें उनकी नियुक्ति को वैध नहीं माना गया।
फर्जी डिग्री, नकल‑नामे और धोखेबाज़ी का पर्दाफाश
हाईकोर्ट ने पाया कि जहांगीरी ने 1988 में LLB पार्ट‑1 की परीक्षा फर्जी एनरोलमेंट नंबर से दी थी। परीक्षा के दौरान उन्हें नकल करते पकड़ा गया और 1989 में यूनिवर्सिटी ने उन्हें तीन साल के लिए बैन कर दिया था। बैन होने के बावजूद उन्होंने 1990 में तारिक जहांगीरी नाम से फिर परीक्षा दी, लेकिन किसी दूसरे छात्र (इम्तियाज़ अहमद) का एनरोलमेंट नंबर इस्तेमाल किया। बाद में LLB पार्ट‑2 भी उन्होंने अलग‑अलग नामांकन नंबर से दी, जो अवैध थे।
दाखिला ही नहीं हुआ था: कॉलेज
सुनवाई में गवर्नमेंट इस्लामिया लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल ने अदालत को स्पष्ट बताया कि जहांगीरी को कभी भी कॉलेज में दाखिला नहीं मिला था। कोर्ट ने कहा, जो चीज शुरू से ही गलत है, उसे बाद में किसी प्रशासनिक निर्णय से सही नहीं बनाया जा सकता। इसलिए जहांगीरी की LLB डिग्री को पूरी तरह रद्द कर दिया गया है।
2024 में सामने आया मामला
जहांगीरी का मामला पहली बार 2024 में सामने आया था। कोर्ट के नोटिस में यह भी कहा गया कि उनका कानूनी पेशे में करियर 30 साल से अधिक का था, जिसका आधार जाली डिग्री थी।


