कंगाल होने की कगार पर पाकिस्तान? 2026 में आने वाली है आर्थिक सुनामी!

कंगाल होने की कगार पर पाकिस्तान? 2026 में आने वाली है आर्थिक सुनामी!

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए आने वाला समय और भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। हालिया मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2026 में देश की आर्थिक स्थिति और बिगड़ सकती है। इसके पीछे बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और मित्र देशों के साथ रिश्तों में आई खटास को मुख्य कारण बताया जा रहा है।

नहीं मिल रही अपेक्षित मदद

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के रिश्तों में तनाव साफ दिख रहा है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जहां पाकिस्तान को उम्मीद थी कि यूएई के डिपॉजिट्स का दो साल के लिए कम ब्याज दर पर विस्तार (Rollover) हो जाएगा, वहीं अब यह हर महीने 6.5% की उच्च दर पर हो रहा है। इतना ही नहीं, फौजी फाउंडेशन कंपनियों में यूएई का निवेश भी फिलहाल अधर में लटका हुआ है।

इसके अतिरिक्त, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) का दूसरा चरण ठंडे बस्ते में है। चीन की ओर से अतिरिक्त आर्थिक की कोई खबर नहीं है। चीनी बिजली कंपनी इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स (IPPs) ने लेट पेमेंट सरचार्ज माफ करने से मना कर दिया है, जिससे बिजली क्षेत्र का कर्ज संकट सुलझ नहीं पा रहा।

सुरक्षा और व्यापारिक मोर्चे पर विफलता

पाकिस्तान को घरेलू स्तर पर सुरक्षा और अमेरिका के साथ व्यापारिक स्तर पर विफलता हाथ लगी है। दरअसल, बलूचिस्तान में बढ़ती असुरक्षा के कारण इस ‘गेम-चेंजर’ माने जाने वाले रेको डिक (Reko Diq) प्रोजेक्ट का वित्तीय समापन (Financial Close) अनिश्चित काल के लिए टल गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान केवल ट्रंप प्रशासन यानी अमेरिका के साथ अपनी करीबी के भरोसे बैठा रहा, जबकि भारत और बांग्लादेश ने अमेरिका के साथ बेहतर व्यापारिक सौदे कर लिए हैं। बांग्लादेश ने अमेरिकी कपास के आयात पर अपने टेक्सटाइल उत्पादों के लिए ‘जीरो ड्यूटी’ हासिल कर ली है।

विदेशी मुद्रा भंडार का बिगड़ता गणित

स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (SBP) की स्थिति भी चिंताजनक है। 2025 में पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार मात्र $4.3 बिलियन रहा, जबकि विदेशी सार्वजनिक कर्ज बढ़कर $7.2 बिलियन पहुंच गया। कर्ज बढ़ने की रफ्तार भंडार बढ़ने की तुलना में $3 बिलियन अधिक रही। विदेशी निवेश (FDI) अब तक के सबसे निचले स्तर पर है। पिछले तीन वर्षों से मित्र देशों से कर्ज और निवेश पर बातचीत हो रही है, जो बेहद कम हैं या तो कागजों तक ही सीमित रह गए हैं।

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