राइट टू हेल्थ की मांग को लेकर सडक़ पर उतरे संगठन

राइट टू हेल्थ की मांग को लेकर सडक़ पर उतरे संगठन

ड्रग एक्शन फोरम-कर्नाटक (डीएएफ-के) और सर्वत्रिक आरोग्य आंदोलन कर्नाटक (एसएए-के) के बैनर तले सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज संगठनों ने सोमवार को स्वास्थ्य के अधिकार (राइट टू हेल्थ) को कानूनी रूप देने की मांग को लेकर राज्यव्यापी जत्था की शुरुआत की। यह जत्था विजयपुरा से आरंभ होकर राज्य के सभी 31 जिलों से गुजरते हुए 17 फरवरी को बेंगलूरु में संपन्न होगी।आयोजकों के अनुसार इस अभियान में ट्रेड यूनियनों, महिला संगठनों और मानवाधिकार समूहों की भी भागीदारी है। मुख्य उद्देश्य सरकार पर दबाव बनाकर स्वास्थ्य को एक मौलिक कानूनी अधिकार के रूप में मान्यता दिलाना है।

राजस्थान में पहले से है कानून

जत्था की प्रमुख मांग राज्य में राइट टू हेल्थ कानून लागू करना है, ताकि सरकार सभी नागरिकों के लिए सुलभ, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए कानूनी रूप से जवाबदेह हो। राजस्थान में ऐसा कानून पहले से मौजूद है और दुनिया के 70 से अधिक देश स्वास्थ्य को कानूनी अधिकार के रूप में मान्यता देते हैं।

दवाओं पर 70 फीसदी खर्च

आयोजकों ने कहा कि भारत में ओपीडी इलाज के कुल खर्च का करीब 60-70 प्रतिशत हिस्सा दवाओं पर ही खर्च हो जाता है, जिससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार आर्थिक संकट में फंस जाते हैं।

एसएए-के द्वारा 2023 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य के 12 जिलों में मरीजों ने उन दवाओं पर 2.58 लाख रुपए से अधिक खर्च किया, जो सरकारी अस्पतालों में मुफ्त मिलनी चाहिए थीं। मरीजों को प्रति विजिट औसतन 433 रुपए जेब से खर्च करने पड़े।

निजी अस्पतालों की मनमानी

जत्था के दौरान निजी अस्पतालों में इलाज की ऊंची लागत पर भी चिंता जताई गई। कार्यकर्ताओं ने निजी अस्पतालों की फीस पर सख्त नियमन की मांग की और सात जिला अस्पतालों को पीपीपी मॉडल पर निजी हाथों में सौंपने के प्रस्ताव का विरोध किया।आयोजकों ने बल्लारी में गर्भवती महिलाओं की मौत के मामलों की स्वतंत्र जांच, दोषियों पर कार्रवाई और पीडि़त परिवारों को मुआवजा देने की भी मांग दोहराई।

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