इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर आरोप पत्र में अथवा कर्मचारी के जवाब में कोई गवाह उल्लेखित नहीं है तो भी विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई में मौखिक सुनवाई अनिवार्य है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हिस्सा है।
न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने झांसी में लेखपाल रहे रामस्वरूप शुक्ला की याचिका स्वीकार कहते हुए कहा है कि जांच अधिकारी ने कर्मचारी को मौखिक सुनवाई का अवसर नहीं दिया, जो अनिवार्य था। इसलिए, अनुशासनात्मक कार्रवाई और बर्खास्तगी का आदेश रद किया जाता है।
सेवा में बहाली नहीं की जा सकती हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा है कि कर्मचारी ने सेवानिवृत्ति की आयु प्राप्त कर ली है, इसलिए सेवा में बहाली नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा है कि विभागीय जांच भारत के संविधान के अनुच्छेद 311 और 14 के अंतर्गत प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हिस्सा है। कोर्ट ने पाया कि चार्ज-शीट के जवाब के बाद जांच अधिकारी ने किसी भी आगे की सुनवाई के लिए तिथि और समय निर्धारित नहीं की न ही दोषी कर्मचारी को मौखिक सुनवाई का अवसर प्रदान दिया। कोर्ट ने कहा– स्थापित सिद्धांत के अनुसार, जांच अधिकारी का यह अंर्तनिहित कर्तव्य है कि वह दोषी कर्मचारी को सुनवाई का अवसर प्रदान करे। मामले से जुड़े तथ्य यह हैं कि 17दिसंबर 2009 के आदेश से अनुशासनात्मक प्राधिकारी एसडीएम ने याची की सेवाएं समाप्त कर दीं। अपीलीय प्राधिकरण ने भी 30 अप्रैल 2010 को पारित आदेश में राहत नहीं दी।
नौ जनवरी 2018 को सेवानिवृत्ति हो चुका याची नौ जनवरी 2018 को सेवानिवृत्ति हो चुका है। इससे पहले उसने दोनों ही आदेशों को चुनौती दी थी। वह वर्ष 1980 में लेखपाल नियुक्त हुआ था। डोमागोर क्षेत्र में तैनात मिली थी। राजस्व निरीक्षक बुद्धि प्रकाश की शिकायत पर उसके खिलाफ चार अक्टूबर 2008 को धारा 419, 420, 467, 471, 477ए और 120बी आइपीसी के तहत मामला अपराध संख्या 686/2008 दर्ज किया गया।
इसमें आरोप था कि लेखपाल ने ब्रजकिशोर नामक व्यक्ति को मृत घोषित कर उसके वारिसों के नाम जमीन दाखिल खारिज की है। जांच में पाया गया कि लेखपाल ने कोई अपराध नहीं किया है, लेकिन फिर भी उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई। ब्रज किशोर ने 1988 में संन्यास ले लिया था। वह वर्ष 2006 में साधु के रूप में गांव में लौटे।


