सिटी रिपोर्टर }जयपुर की होली पूरी दुनिया में मशहूर है। कभी चारदीवारी तक सीमित शहर में चौपड़ों पर गांव और शहर का अनूठा संगम होली जलने के साथ होता था। रात में भी चंग-ढप के साथ रसिया गान और लोकनृत्य के उत्सव होते थे। राजा सवाई जयसिंह हाथी पर सवार होकर गुलाल गोटे से होली खेलते हुए गुजरते थे। हालांकि अब भी यह परंपरा निभाई जाती है, लेकिन उस तरह से नहीं होता। शहर का विस्तार हुआ तो यह क्लबों और होटलों तक फैलता चला गया। उस समय गुलाल और रंगों के बीच ढोलक और मंजीरा की धुन पर नृत्य के आयोजन होते थे। शहर के कला संस्कृति विद रामू रामदेव ने उस परंपरा को न केवल चित्र में सजाया बल्कि बताया कि उस समय का उत्साह बहुत अलग होता था। गांव के लोग व्यंजनों को बांटते हुए आपस में सौहार्द बांटते थे। उस समय भी पानी की बचत का संदेश देते हुए गुलाल और अबीर को प्रमुखता दी जाती थी।


