मुंगेर में सिर्फ कट्टा नहीं, मशीन गन और रॉकेट लॉन्चर भी बनेगा, गन फैक्ट्रियों को मिलेगी नई जिंदगी

बिहार में मुंगेर गन फैक्ट्रियों को लेकर कभी मशहूर हुआ करता था। लेकिन, पिछले कुछ वर्षो में सख्त लाइसेंसिंग नियमों और गैर-कानूनी हथियार बनाने के बढ़ते चलन की वजह से इसने अपनी फायरपावर खो दी थी। लेकिन अब इसको एक डिफेंस कॉरिडोर के तौर पर नई ज़िंदगी मिलने वाली है, जो हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट, एक्सप्लोसिव, हेलमेट, बॉडी आर्मर और नाइट विज़न डिवाइस सहित कई तरह के डिफेंस इक्विपमेंट बनाने का काम करेगी।

ब्रीच-लोडिंग फायरआर्म्स का हब

बिहार के मुंगेर ज़िले में मौजूद ये फैक्ट्रियां भारत की सबसे पुरानी बची हुई हथियार बनाने वाली यूनिट्स में से एक हैं, 1762 में कॉलोनियल राज के दौरान इसे बनाया गया था। फिर ये फैक्ट्रियां ब्रीच-लोडिंग फायरआर्म्स बनाने का एक खास हब बन गईं, यह एक ऐसा हुनर ​​है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है और मुंगेर शहर की इकॉनमी और पहचान में गहराई से जुड़ा हुआ है। दशकों तक, ये फैक्ट्रियां मुख्य रूप से आम लोगों की मांग को पूरा करती थीं, और अपने पीक पर, इनमें करीब 1,500 परिवार काम करते थे।

मुंगेर 37 प्राइवेट गन फैक्ट्रियां

बिहार इंडस्ट्रियल एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (BIADA) की करीब आठ एकड़ ज़मीन पर 37 प्राइवेट गन फैक्ट्रियां हैं। अकेले 2001 में, फैक्ट्रियों ने 2-3 करोड़ रुपये की एक्साइज ड्यूटी दी थी। हालांकि, 2016 में भारत की आर्म्स लाइसेंसिंग पॉलिसी में बदलाव के बाद, एक सिविलियन लाइसेंस होल्डर के पास हथियारों की संख्या तीन से घटाकर दो कर दी गई। इसके अलावा, डुप्लीकेट हथियारों, खासकर देसी कट्टा के पैरेलल प्रोडक्शन और असेंबलिंग की वजह से फैक्ट्री धीरे-धीरे बंद होने लगी। पहले हर हफ़्ते 1,000-1,200 वर्कर काम करते थे, लेकिन अब इसमें करीब 150 वर्कर हैं। इन फैक्ट्रियों में नौकरी गंवाने वाले कई लोगों ने अब राजमिस्त्री या ऑटो ड्राइवर का काम करना शुरू कर दिया है।

सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग पार्क

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार बिहार के डिप्टी चीफ मिनिस्टर और होम मिनिस्टर सम्राट चौधरी ने इन फैक्ट्रियों को फिर से शुरू करने को लेकर कहा, बिहार कैबिनेट ने हाल ही में एक नया टेक हब बनाने की मंज़ूरी दी है, जिसमें एक डिफेंस कॉरिडोर, एक सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग पार्क, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर, एक मेगा टेक सिटी और एक फिनटेक सिटी शामिल हैं। नए डिफेंस कॉरिडोर के तहत मुंगेर की गन फैक्ट्रियों को फिर से शुरू और अपग्रेड किया जाएगा।

रोजगार को मिलेंगे अवसर

डिफेंस कॉरिडोर बनने से मुंगेर में ऑटोमैटिक मशीन गन, गोला-बारूद और रॉकेट लॉन्चर जैसे हथियार बन सकते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर रोज़गार के अवसर भी पैदा होंगे। डिफेंस कॉरिडोर एक स्ट्रेटेजिक रूप से प्लान किया गया इलाका है जो डिफेंस और एयरोस्पेस से जुड़ी चीज़ों के स्वदेशी प्रोडक्शन को बढ़ावा देता है, जिसका मकसद भारत को डिफेंस प्रोडक्शन में आत्मनिर्भर बनाना है। कॉरिडोर देश की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग क्षमताओं को बढ़ाने, इम्पोर्ट कम करने और एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।

लाइसेंसिंग पॉलिसी में बदलाव से मंदा पड़ा था धंधा

मुंगेर गन मैन्युफैक्चरर्स (लाइसेंसी) एसोसिएशन के जॉइंट सेक्रेटरी संदीप कुमार शर्मा ने द इंडियन एक्सप्रेस के साथ बातचीत में कहा कि “2016 में लाइसेंसिंग पॉलिसी में बदलाव से कस्टमर की पसंद बदल गई। ब्रीच-लोडिंग हथियारों की डिमांड की जगह पिस्टल और राइफल जैसे तेज़ फायर करने वाले हथियारों की डिमांड ने ले ली। कई आम लोगों को भी अपने हथियार सरेंडर करने पड़े। ज़ाहिर है, एक ऐसी फैक्ट्री के लिए जो लगभग पूरी तरह से उस कैटेगरी के फायरआर्म्स के आस-पास बनी थी, इसका असर तुरंत और लंबे समय तक रहा।”

देश में 108 गन फैक्ट्रियां

शर्मा ने कहा कि मुंगेर के कारीगर, बंदूक बनाने (बैरल, प्रिसिजन पार्ट्स, असेंबली) में अपनी सदियों पुरानी एक्सपर्टीज़ के साथ, कई तरह की बंदूकें बना सकते हैं, जिनमें छोटे हथियार, राइफल और शॉटगन शामिल हैं, साथ ही एम्युनिशन, कार्ट्रिज, हथियार के कंपोनेंट और पार्ट्स, साथ ही स्पोर्टिंग फायरआर्म्स, नॉन-लीथल हथियार और डिफेंस एक्सपोर्ट के लिए आइटम भी हैं। भारत में कुल 108 गन फैक्ट्रियां, जिनमें मुंगेर की 37 फैक्ट्रियां शामिल हैं, जो कि काम की कमी से जूझ रही थीं, क्योंकि 2016 से पूरे भारत में सिर्फ़ लगभग 600 नए हथियार बनाने के लाइसेंस जारी किए गए थे।

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