ना डीजे, ना बैंड-बाजा… 25 बैलगाड़ियों में निकली 3 किमी लंबी बारात, बुंदेलखंड में लौटी सदियों पुरानी शान

ना डीजे, ना बैंड-बाजा… 25 बैलगाड़ियों में निकली 3 किमी लंबी बारात, बुंदेलखंड में लौटी सदियों पुरानी शान

Wedding Bundelkhand Tradition: उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में सदियों पुरानी बैलगाड़ी से बारात निकालने की परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी। मौदहा थाना क्षेत्र के अंतिम गांव गुड़ा में रहने वाले जागेंद्र द्विवेदी के पुत्र मोहित द्विवेदी की शादी को पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना दिया। वर्षों से बंद पड़ी इस परंपरा को परिवार और ग्रामीणों के सहयोग से दोबारा शुरू किया गया, जिसने आधुनिक दौर में लोक-संस्कृति के प्रति लोगों का भरोसा फिर से मजबूत किया।

25 बैलगाड़ियों में सवार होकर निकली बारात

करीब 25 बैलगाड़ियों में सवार होकर निकली यह अनोखी बारात लगभग तीन किलोमीटर तक खेतों और कच्चे रास्तों से गुजरती हुई फार्म हाउस तक पहुंची। इस बारात में करीब 200 लोग शामिल रहे। न डीजे था, न बैंड-बाजा और न ही आधुनिक शोर-शराबा, पूरी बारात शांति और परंपरा के रंग में रंगी नजर आई। राह चलते ग्रामीण और राहगीर इस दृश्य को देखकर हैरान रह गए और कई लोगों ने इसे कैमरे में कैद भी किया।

50 साल बाद जगी विरासत

परिवार वालों के मुताबिक, गांव में पिछले करीब 50 वर्षों से बैलगाड़ी से बारात निकालने की परंपरा पूरी तरह बंद हो चुकी थी। मोहित और उनके परिवार ने इस परंपरा को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया, ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जा सके। गांव के बुजुर्गों ने भी इस पहल को सराहा और कहा कि ऐसे आयोजनों से ग्रामीण संस्कृति को नई पहचान मिलती है।

तीन दिनों तक चली रस्में

विवाह समारोह तीन दिनों तक पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ। पहले दिन तिलक की रस्म हुई, दूसरे दिन द्वारचार और तीसरे दिन विदाई का आयोजन किया गया। खास बात यह रही कि दुल्हन की विदाई भी बैलगाड़ी से ही कराई गई, जिसने पूरे आयोजन को और भी खास बना दिया। यह पल न केवल परिवार बल्कि पूरे गांव के लिए भावनात्मक और यादगार रहा।

देसी व्यंजनों और लोक नृत्य का रंग

बारात जब फार्म हाउस पहुंची तो वहां पारंपरिक कठघोड़वा नृत्य और लौंडा नाच का आयोजन किया गया। तमूरा भजन और महिलाओं द्वारा गाए गए बुंदेलखंडी लोकगीतों ने माहौल को पूरी तरह देसी रंग में रंग दिया। भोजन के लिए पत्तलों पर कद्दू, आलू-बैंगन की सब्जी सहित पारंपरिक व्यंजन परोसे गए। सभी मेहमानों को सम्मानपूर्वक बैठाकर भोजन कराया गया, जिससे ग्रामीण आतिथ्य की झलक साफ दिखाई दी।

नई पीढ़ी को मिला सांस्कृतिक संदेश

दूल्हा मोहित द्विवेदी पेशे से मोबाइल की दुकान चलाता है, लेकिन उसने अपने विवाह को आधुनिक दिखावे से दूर रखकर परंपरा के रंग में रंगने का फैसला लिया। दोनों परिवारों की सहमति से बैलगाड़ियों की बुकिंग की गई और आयोजन को पूरी तरह लोक-संस्कृति के अनुरूप रखा गया। यह पहल न केवल एक शादी का आयोजन बनी, बल्कि क्षेत्र में सांस्कृतिक चेतना को फिर से जगाने वाली मिसाल बन गई है।

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