NEET छात्रा से रेप-मौत, भास्कर के सवाल पर DGP खामोश:3 घंटे इंतजार कराया, कहा-अभी नो कमेंट,पुलिसवालों ने कैमरा बंद कराया; पढ़िए सवाल क्या हैं

NEET छात्रा से रेप-मौत, भास्कर के सवाल पर DGP खामोश:3 घंटे इंतजार कराया, कहा-अभी नो कमेंट,पुलिसवालों ने कैमरा बंद कराया; पढ़िए सवाल क्या हैं

NEET की तैयारी कर रही छात्रा से रेप और संदिग्ध हालात में मौत के बाद बिहार के लोगों में गुस्सा है। सड़कों पर प्रदर्शन हो रहा है, सभी की जुबान पर एक ही सवाल है, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पुलिस की शुरुआती थ्योरी से क्यों नहीं मैच की। पुलिस ने झूठ क्यों बोला और अब तक कोई बड़ा एक्शन क्यों नहीं? ऐसे वक्त में जवाब देने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बिहार पुलिस के मुखिया की बनती है, लेकिन वो खामोश हैं। भास्कर डिजिटल की टीम जब इन्हीं सवालों के जवाब लेने बिहार पुलिस मुख्यालय पहुंची, तो तीन घंटे तक इंतजार कराया गया। इसके बाद भी मुलाकात नहीं कराई गई। बाहर निकलते वक्त DGP विनय कुमार से सीधे सवाल पूछे गए, लेकिन जवाब मिला— “नो कमेंट”। इसी दौरान एक पुलिसकर्मी ने कैमरा बंद कराने की कोशिश की। यह पूरा दृश्य कैमरे में कैद है। DGP से भास्कर ये 5 सवाल पूछना चाहता है? 1- लापरवाही करने वाले पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
6 जनवरी से 9 जनवरी तक मामला पुलिस की जानकारी में रहा। फिर भी FIR, सीन प्रिजर्वेशन, CCTV जब्ती और संदिग्धों से पूछताछ में देरी क्यों हुई? 2- जिस अस्पताल ने रेप या गंभीर चोट का स्पष्ट जिक्र नहीं किया, उस पर एक्शन कब?
जब बाद में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और परिजनों के बयान से मामला स्पष्ट हो गया, तो क्या अस्पताल पर एक्शन नहीं होना चाहिए? 3- हॉस्टल की संचालिका, उसके दोनों बेटे और केयर टेकर अब कहां हैं?
घटना के इतने दिन बाद भी ये लोग पुलिस की पकड़ से बाहर क्यों हैं? किस आधार पर इन्हें थाने बुलाया गया था और किसके दबाव में छोड़ दिया गया? 4- मुख्य आरोपियों में अब तक किस-किस की गिरफ्तारी हुई?
अगर यह मामला इतना संवेदनशील है, तो अब तक गिरफ्तारी शून्य क्यों है? कुछ संदिग्धों को उठाया गया है उनका खुलासा कब होगा। 5- परिजनों को डराने-धमकाने के आरोपों पर पुलिस क्या कार्रवाई करेगी?
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देने में देरी और धमकी के आरोपों पर जवाब कौन देगा? अब जानिए किस पुलिस अफसर ने कहां सही जिम्मेदारी नहीं निभाई… जिम्मेदारी: थाना प्रभारी के रूप में रौशनी कुमारी को 6 जनवरी को मिली सूचना को मेडिको-लीगल केस (MLC) मानना था। कानून में भी स्पष्ट है यदि कोई छात्रा संदिग्ध हालत में बेहोश मिलती है, तो पुलिस को तत्काल मौके पर पहुंचकर कमरे को सील, हॉस्टल को सर्च और परिवार को सूचित करना होता है। उन्हें चाहिए था कि वे FIR की प्रक्रिया शुरू करातीं, फोरेंसिक टीम बुलातीं और अस्पताल में इलाज के दौरान किसी निष्कर्ष से बचतीं। लापरवाही : तीन दिन तक पुलिस की गैरहाजिरी सबसे बड़ा सवाल है। इस दौरान हॉस्टल का कमरा खुला रहा। तीन लोगों को हिरासत में लेकर छोड़ दिया गया, लेकिन हॉस्टल की जांच नहीं हुई। सबसे गंभीर चूक यह रही कि थाना प्रभारी की शुरुआती रिपोर्ट ही आगे की पूरी जांच की बेसलाइन बन गई, जिसे बाद में कोई अधिकारी चुनौती देता नहीं दिखा। या उसे क्रॉस चेक करवाने की प्रक्रिया भी नहीं की गई। जिम्मेदारी: ASP स्तर पर केस की री-एप्रेजल होती है। यह देखा जाता है कि क्या शुरुआती जांच में कोई एंगल छूटा तो नहीं है। उन्हें चाहिए था कि वे 6–9 जनवरी की पुलिस गैरहाजिरी पर सवाल उठाते और हॉस्टल की दोबारा जांच के आदेश देते। यही नहीं नीट छात्रा का स्टेटमेंट भी लेना चाहिए था। जैसे-उसके शरीर पर चोट कैसे लगी, प्राइवेट पार्ट में चोट है या नहीं। लापरवाही: ASP अभिनव कुमार ने थाना प्रभारी की रिपोर्ट को ही आधार मान लिया। न कमरे की फोरेंसिक जांच कराई गई, न नए सिरे से संदिग्धों को जोड़ा गया। यह वह टाइम था, जहां केस को सही दिशा में मोड़ा जा सकता था, लेकिन कैजुअल एप्रोच से ही काम किया गया। ऐसा मान लिया गया कि मामला सुसाइड का है, दब जाएगा। जिम्मेदारी: SP स्तर पर किसी भी संवेदनशील केस में पोस्टमॉर्टम से पहले निष्कर्ष नहीं दिया जाता है। मीडिया ब्रीफिंग में संयम जरूरी होता है। यहां सीधे जजमेंटल बयान आ गया कि रेप हुआ ही नहीं है। लापरवाही: एसपी परिचय कुमार ने बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के सीधे इसे सुसाइड बताया। नींद की गोली और मोबाइल सर्च की कहानी सामने लाए। मेडिकल रिपोर्ट में उनकी सभी बातें उलट साबित हुईं। बिना जांच के नीचे के अफसरों की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। SSP कॉन्फ्रेंस में जल्दबाजी की जिम्मेदारी: SSP का काम अधीनस्थ अधिकारियों की रिपोर्ट को क्रॉस-वेरिफाई करना होता है। खासकर तब, जब मामला यौन शोषण जैसे मुद्दे से जुड़ा हो। लापरवाही: SSP ने भी यौन शोषण की संभावना को सीधे खारिज कर दिया। यह बयान तब आया, जब मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आई भी नहीं थी। पता नहीं कैसे एसएसपी ने किसी प्राइवेट डॉक्टर की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद वही बयान पुलिस के लिए असहज सवाल बन गया। महिला डॉक्टर का हवाला देकर रेप से इनकार, शरीर पर चोट बताई जिम्मेदारी: प्रारंभिक डॉक्टर की जिम्मेदारी होती है कि यदि संकेत अस्पष्ट हों, तो रिपोर्ट रिजर्व रखी जाए। डॉक्टर को कानूनी निष्कर्ष नहीं देना चाहिए। हालांकि प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल के डॉक्टर ने रेप से इनकार किया, लेकिन शरीर पर चोट के निशान बताए थे। वो कैसे आए ये न तो पुलिस बता पाई और न डॉक्टर। लापरवाही: डॉ. सतीश ने जिस महिला डॉक्टर के आधार पर रिपोर्ट बताई उसी की शुरुआती राय से पुलिस ने रेप की संभावना से इनकार कर दिया। जबकि पोस्टमॉर्टम में जननांग पर चोट, टिश्यू ट्रॉमा और संघर्ष के निशान मिले हैं। यहीं से सवाल उठता है- क्या शुरुआती मेडिकल जांच अधूरी थी? और पुलिस जल्दबाजी कर गई। अब जानिए उन आरोपियों के बारे में जिनकी अब तक तलाश है आरोपी –1: हॉस्टल मालकिन नीलम अग्रवाल नीलम अग्रवाल शंभू गर्ल्स हॉस्टल की संचालिका हैं। छात्रा इसी हॉस्टल में रहती थी। 9 जनवरी को नीलम अग्रवाल खुद अस्पताल पहुंचती हैं और परिजनों से कहती हैं कि “हॉस्टल का नाम बदनाम हो जाएगा, केस वापस ले लीजिए।” यह बयान अपने आप में गंभीर है। गर हॉस्टल में सब कुछ ठीक था, तो केस वापस लेने का लालच क्यों दिया गया? नीलम अग्रवाल को कुछ देर के लिए थाने ले जाया गया, लेकिन बाद में छोड़ दिया गया। सवाल है, किस आधार पर छोड़ा गया? हॉस्टल की CCTV फुटेज, रजिस्टर, एंट्री-एग्जिट लॉग, सबकी जिम्मेदारी हॉस्टल संचालक की होती है। लेकिन अब तक न तो CCTV सामने आया, न यह साफ है कि हॉस्टल की रात की गतिविधियों की जांच हुई या नहीं। आरोपी –2: केयर टेकर नीतू और चंचला केयर टेकर नीतू छात्रा को अस्पताल लेकर जाती है, लेकिन पहले सेंट्रल हॉस्पिटल न ले जाकर प्रभात मेमोरियल ले जाती है। यह फैसला किसके कहने पर हुआ, इसका जवाब आज तक नहीं मिला। 7 और 8 जनवरी को हॉस्टल में मौजूद दूसरी केयर टेकर चंचला की भूमिका भी संदिग्ध है। रिश्तेदारों का दावा है कि उस वक्त CCTV चेक किया जा रहा था। घटना के बाद दोनों केयर टेकर कहां चली गईं— यह पुलिस अब तक सार्वजनिक नहीं कर पाई है। आरोपी –3: मकान मालिक मनीष रंजन के गार्ड कहां हैं जिस इमारत में हॉस्टल चलता है, उसका मालिक मनीष रंजन है, जो उसी बिल्डिंग के ऊपरी फ्लोर पर रहता है। परिजनों का आरोप है कि 6 जनवरी से लेकर प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल में आखिरी दिन तक मनीष रंजन का गार्ड परिजनों के पीछे-पीछे घूमता रहा। अब मकान मालिक का गार्ड कहां हैं।
यह निगरानी क्यों हो रही थी? क्या किसी को डराने या कंट्रोल करने की कोशिश हो रही थी? इस पर अब तक कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया है। पुलिस ने अब तक क्या क्या किया NEET की तैयारी कर रही छात्रा से रेप और संदिग्ध हालात में मौत के बाद बिहार के लोगों में गुस्सा है। सड़कों पर प्रदर्शन हो रहा है, सभी की जुबान पर एक ही सवाल है, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पुलिस की शुरुआती थ्योरी से क्यों नहीं मैच की। पुलिस ने झूठ क्यों बोला और अब तक कोई बड़ा एक्शन क्यों नहीं? ऐसे वक्त में जवाब देने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बिहार पुलिस के मुखिया की बनती है, लेकिन वो खामोश हैं। भास्कर डिजिटल की टीम जब इन्हीं सवालों के जवाब लेने बिहार पुलिस मुख्यालय पहुंची, तो तीन घंटे तक इंतजार कराया गया। इसके बाद भी मुलाकात नहीं कराई गई। बाहर निकलते वक्त DGP विनय कुमार से सीधे सवाल पूछे गए, लेकिन जवाब मिला— “नो कमेंट”। इसी दौरान एक पुलिसकर्मी ने कैमरा बंद कराने की कोशिश की। यह पूरा दृश्य कैमरे में कैद है। DGP से भास्कर ये 5 सवाल पूछना चाहता है? 1- लापरवाही करने वाले पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी?
6 जनवरी से 9 जनवरी तक मामला पुलिस की जानकारी में रहा। फिर भी FIR, सीन प्रिजर्वेशन, CCTV जब्ती और संदिग्धों से पूछताछ में देरी क्यों हुई? 2- जिस अस्पताल ने रेप या गंभीर चोट का स्पष्ट जिक्र नहीं किया, उस पर एक्शन कब?
जब बाद में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और परिजनों के बयान से मामला स्पष्ट हो गया, तो क्या अस्पताल पर एक्शन नहीं होना चाहिए? 3- हॉस्टल की संचालिका, उसके दोनों बेटे और केयर टेकर अब कहां हैं?
घटना के इतने दिन बाद भी ये लोग पुलिस की पकड़ से बाहर क्यों हैं? किस आधार पर इन्हें थाने बुलाया गया था और किसके दबाव में छोड़ दिया गया? 4- मुख्य आरोपियों में अब तक किस-किस की गिरफ्तारी हुई?
अगर यह मामला इतना संवेदनशील है, तो अब तक गिरफ्तारी शून्य क्यों है? कुछ संदिग्धों को उठाया गया है उनका खुलासा कब होगा। 5- परिजनों को डराने-धमकाने के आरोपों पर पुलिस क्या कार्रवाई करेगी?
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देने में देरी और धमकी के आरोपों पर जवाब कौन देगा? अब जानिए किस पुलिस अफसर ने कहां सही जिम्मेदारी नहीं निभाई… जिम्मेदारी: थाना प्रभारी के रूप में रौशनी कुमारी को 6 जनवरी को मिली सूचना को मेडिको-लीगल केस (MLC) मानना था। कानून में भी स्पष्ट है यदि कोई छात्रा संदिग्ध हालत में बेहोश मिलती है, तो पुलिस को तत्काल मौके पर पहुंचकर कमरे को सील, हॉस्टल को सर्च और परिवार को सूचित करना होता है। उन्हें चाहिए था कि वे FIR की प्रक्रिया शुरू करातीं, फोरेंसिक टीम बुलातीं और अस्पताल में इलाज के दौरान किसी निष्कर्ष से बचतीं। लापरवाही : तीन दिन तक पुलिस की गैरहाजिरी सबसे बड़ा सवाल है। इस दौरान हॉस्टल का कमरा खुला रहा। तीन लोगों को हिरासत में लेकर छोड़ दिया गया, लेकिन हॉस्टल की जांच नहीं हुई। सबसे गंभीर चूक यह रही कि थाना प्रभारी की शुरुआती रिपोर्ट ही आगे की पूरी जांच की बेसलाइन बन गई, जिसे बाद में कोई अधिकारी चुनौती देता नहीं दिखा। या उसे क्रॉस चेक करवाने की प्रक्रिया भी नहीं की गई। जिम्मेदारी: ASP स्तर पर केस की री-एप्रेजल होती है। यह देखा जाता है कि क्या शुरुआती जांच में कोई एंगल छूटा तो नहीं है। उन्हें चाहिए था कि वे 6–9 जनवरी की पुलिस गैरहाजिरी पर सवाल उठाते और हॉस्टल की दोबारा जांच के आदेश देते। यही नहीं नीट छात्रा का स्टेटमेंट भी लेना चाहिए था। जैसे-उसके शरीर पर चोट कैसे लगी, प्राइवेट पार्ट में चोट है या नहीं। लापरवाही: ASP अभिनव कुमार ने थाना प्रभारी की रिपोर्ट को ही आधार मान लिया। न कमरे की फोरेंसिक जांच कराई गई, न नए सिरे से संदिग्धों को जोड़ा गया। यह वह टाइम था, जहां केस को सही दिशा में मोड़ा जा सकता था, लेकिन कैजुअल एप्रोच से ही काम किया गया। ऐसा मान लिया गया कि मामला सुसाइड का है, दब जाएगा। जिम्मेदारी: SP स्तर पर किसी भी संवेदनशील केस में पोस्टमॉर्टम से पहले निष्कर्ष नहीं दिया जाता है। मीडिया ब्रीफिंग में संयम जरूरी होता है। यहां सीधे जजमेंटल बयान आ गया कि रेप हुआ ही नहीं है। लापरवाही: एसपी परिचय कुमार ने बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के सीधे इसे सुसाइड बताया। नींद की गोली और मोबाइल सर्च की कहानी सामने लाए। मेडिकल रिपोर्ट में उनकी सभी बातें उलट साबित हुईं। बिना जांच के नीचे के अफसरों की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। SSP कॉन्फ्रेंस में जल्दबाजी की जिम्मेदारी: SSP का काम अधीनस्थ अधिकारियों की रिपोर्ट को क्रॉस-वेरिफाई करना होता है। खासकर तब, जब मामला यौन शोषण जैसे मुद्दे से जुड़ा हो। लापरवाही: SSP ने भी यौन शोषण की संभावना को सीधे खारिज कर दिया। यह बयान तब आया, जब मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आई भी नहीं थी। पता नहीं कैसे एसएसपी ने किसी प्राइवेट डॉक्टर की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद वही बयान पुलिस के लिए असहज सवाल बन गया। महिला डॉक्टर का हवाला देकर रेप से इनकार, शरीर पर चोट बताई जिम्मेदारी: प्रारंभिक डॉक्टर की जिम्मेदारी होती है कि यदि संकेत अस्पष्ट हों, तो रिपोर्ट रिजर्व रखी जाए। डॉक्टर को कानूनी निष्कर्ष नहीं देना चाहिए। हालांकि प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल के डॉक्टर ने रेप से इनकार किया, लेकिन शरीर पर चोट के निशान बताए थे। वो कैसे आए ये न तो पुलिस बता पाई और न डॉक्टर। लापरवाही: डॉ. सतीश ने जिस महिला डॉक्टर के आधार पर रिपोर्ट बताई उसी की शुरुआती राय से पुलिस ने रेप की संभावना से इनकार कर दिया। जबकि पोस्टमॉर्टम में जननांग पर चोट, टिश्यू ट्रॉमा और संघर्ष के निशान मिले हैं। यहीं से सवाल उठता है- क्या शुरुआती मेडिकल जांच अधूरी थी? और पुलिस जल्दबाजी कर गई। अब जानिए उन आरोपियों के बारे में जिनकी अब तक तलाश है आरोपी –1: हॉस्टल मालकिन नीलम अग्रवाल नीलम अग्रवाल शंभू गर्ल्स हॉस्टल की संचालिका हैं। छात्रा इसी हॉस्टल में रहती थी। 9 जनवरी को नीलम अग्रवाल खुद अस्पताल पहुंचती हैं और परिजनों से कहती हैं कि “हॉस्टल का नाम बदनाम हो जाएगा, केस वापस ले लीजिए।” यह बयान अपने आप में गंभीर है। गर हॉस्टल में सब कुछ ठीक था, तो केस वापस लेने का लालच क्यों दिया गया? नीलम अग्रवाल को कुछ देर के लिए थाने ले जाया गया, लेकिन बाद में छोड़ दिया गया। सवाल है, किस आधार पर छोड़ा गया? हॉस्टल की CCTV फुटेज, रजिस्टर, एंट्री-एग्जिट लॉग, सबकी जिम्मेदारी हॉस्टल संचालक की होती है। लेकिन अब तक न तो CCTV सामने आया, न यह साफ है कि हॉस्टल की रात की गतिविधियों की जांच हुई या नहीं। आरोपी –2: केयर टेकर नीतू और चंचला केयर टेकर नीतू छात्रा को अस्पताल लेकर जाती है, लेकिन पहले सेंट्रल हॉस्पिटल न ले जाकर प्रभात मेमोरियल ले जाती है। यह फैसला किसके कहने पर हुआ, इसका जवाब आज तक नहीं मिला। 7 और 8 जनवरी को हॉस्टल में मौजूद दूसरी केयर टेकर चंचला की भूमिका भी संदिग्ध है। रिश्तेदारों का दावा है कि उस वक्त CCTV चेक किया जा रहा था। घटना के बाद दोनों केयर टेकर कहां चली गईं— यह पुलिस अब तक सार्वजनिक नहीं कर पाई है। आरोपी –3: मकान मालिक मनीष रंजन के गार्ड कहां हैं जिस इमारत में हॉस्टल चलता है, उसका मालिक मनीष रंजन है, जो उसी बिल्डिंग के ऊपरी फ्लोर पर रहता है। परिजनों का आरोप है कि 6 जनवरी से लेकर प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल में आखिरी दिन तक मनीष रंजन का गार्ड परिजनों के पीछे-पीछे घूमता रहा। अब मकान मालिक का गार्ड कहां हैं।
यह निगरानी क्यों हो रही थी? क्या किसी को डराने या कंट्रोल करने की कोशिश हो रही थी? इस पर अब तक कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया है। पुलिस ने अब तक क्या क्या किया  

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