राजगीर के भव्य अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में 21 से 25 दिसंबर तक नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन किया जा रहा है। इस बार बिहारी खानपान की समृद्ध परंपरा पर एक विशेष सत्र का आयोजन होगा। यह आयोजन न केवल साहित्य प्रेमियों के लिए, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को संजोने वाले हर व्यक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर बनने जा रहा है। प्रख्यात विद्वानों की मौजूदगी 24 दिसंबर को होने वाले इस विशेष सत्र में देश के जाने-माने भोजन विशेषज्ञ और विचारक प्रोफेसर पुष्पेश पंत, प्रसिद्ध अभिनेता अखिलेंद्र मिश्र के साथ पावापुरी के युवा साहित्यकार रविशंकर उपाध्याय बिहारी व्यंजनों के इतिहास-सांस्कृतिक महत्व पर गहन परिचर्चा करेंगे। इस सत्र में बिहारी खानपान से जुड़े कई रोचक प्रसंग और ऐतिहासिक तथ्य दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे। बिहारी व्यंजनों पर शोध का सिलसिला रविशंकर उपाध्याय, जो बिहार के खानपान पर गहन शोध कर रहे हैं, उन्होंने इस विषय पर ‘बिहार के व्यंजन: संस्कृति और इतिहास’ नामक पुस्तक भी लिखी है। उनके आलेख देश के प्रमुख समाचारपत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं। बिहारी खानपान पर किए गए उनके कार्य को देखते हुए उन्हें बिहार राजभाषा सम्मान और पंडित प्रताप नारायण मिश्र युवा साहित्यकार पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें लाडली मीडिया पुरस्कार 2020 और 2021 भी प्राप्त हो चुका है। साहित्य और संस्कृति का संगम पांच दिवसीय इस महोत्सव में साहित्य, राजनीति और संगीत की दुनिया की अनेक विभूतियां हिस्सा लेंगी। डॉ. शशि थरूर और प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी के बीच संवाद, अमिताभ कांत के साथ प्रोफेसर सुनयना सिंह की बातचीत, प्रसिद्ध फिल्मकार अदूर गोपाल कृष्णन का गंगा कुमार के साथ विशेष सत्र, और सोनल मानसिंह के साथ डॉ. विक्रम संपत का वार्तालाप इस आयोजन की खास आकर्षण होंगे। महोत्सव में पुरुषोत्तम अग्रवाल, भैरवलाल दास, निराला बिदेसिया, अरूप कुमार दत्ता, शाहू पाटोले, कोरल दासगुप्ता और देवदत्त पट्टनायक समेत विभिन्न भाषाओं के लेखक, कवि, अनुवादक और विद्वान अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे। ज्ञान की परंपरा को आगे बढ़ाता आयोजन फेस्टिवल डायरेक्टर गंगा कुमार ने इस आयोजन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सदियों से नालंदा ज्ञान और सीख का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां भाषा, विज्ञान और कला का सदैव समन्वय रहा है। आज जब भारत की बौद्धिक विरासत और क्षेत्रीय साहित्य के प्रति रुचि बढ़ रही है, यह महोत्सव नालंदा की गौरवशाली परंपरा को समकालीन संदर्भों से जोड़ने का प्रयास है। यह मंच देश भर के लेखकों, विद्वानों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों को एक साथ लाएगा, जहां नालंदा की भाषाओं, लिपियों, मौखिक परंपराओं और विचारधाराओं पर गहन विमर्श होगा। यह महोत्सव बिहार की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। राजगीर के भव्य अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में 21 से 25 दिसंबर तक नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन किया जा रहा है। इस बार बिहारी खानपान की समृद्ध परंपरा पर एक विशेष सत्र का आयोजन होगा। यह आयोजन न केवल साहित्य प्रेमियों के लिए, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को संजोने वाले हर व्यक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर बनने जा रहा है। प्रख्यात विद्वानों की मौजूदगी 24 दिसंबर को होने वाले इस विशेष सत्र में देश के जाने-माने भोजन विशेषज्ञ और विचारक प्रोफेसर पुष्पेश पंत, प्रसिद्ध अभिनेता अखिलेंद्र मिश्र के साथ पावापुरी के युवा साहित्यकार रविशंकर उपाध्याय बिहारी व्यंजनों के इतिहास-सांस्कृतिक महत्व पर गहन परिचर्चा करेंगे। इस सत्र में बिहारी खानपान से जुड़े कई रोचक प्रसंग और ऐतिहासिक तथ्य दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे। बिहारी व्यंजनों पर शोध का सिलसिला रविशंकर उपाध्याय, जो बिहार के खानपान पर गहन शोध कर रहे हैं, उन्होंने इस विषय पर ‘बिहार के व्यंजन: संस्कृति और इतिहास’ नामक पुस्तक भी लिखी है। उनके आलेख देश के प्रमुख समाचारपत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं। बिहारी खानपान पर किए गए उनके कार्य को देखते हुए उन्हें बिहार राजभाषा सम्मान और पंडित प्रताप नारायण मिश्र युवा साहित्यकार पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें लाडली मीडिया पुरस्कार 2020 और 2021 भी प्राप्त हो चुका है। साहित्य और संस्कृति का संगम पांच दिवसीय इस महोत्सव में साहित्य, राजनीति और संगीत की दुनिया की अनेक विभूतियां हिस्सा लेंगी। डॉ. शशि थरूर और प्रोफेसर सचिन चतुर्वेदी के बीच संवाद, अमिताभ कांत के साथ प्रोफेसर सुनयना सिंह की बातचीत, प्रसिद्ध फिल्मकार अदूर गोपाल कृष्णन का गंगा कुमार के साथ विशेष सत्र, और सोनल मानसिंह के साथ डॉ. विक्रम संपत का वार्तालाप इस आयोजन की खास आकर्षण होंगे। महोत्सव में पुरुषोत्तम अग्रवाल, भैरवलाल दास, निराला बिदेसिया, अरूप कुमार दत्ता, शाहू पाटोले, कोरल दासगुप्ता और देवदत्त पट्टनायक समेत विभिन्न भाषाओं के लेखक, कवि, अनुवादक और विद्वान अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे। ज्ञान की परंपरा को आगे बढ़ाता आयोजन फेस्टिवल डायरेक्टर गंगा कुमार ने इस आयोजन के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सदियों से नालंदा ज्ञान और सीख का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां भाषा, विज्ञान और कला का सदैव समन्वय रहा है। आज जब भारत की बौद्धिक विरासत और क्षेत्रीय साहित्य के प्रति रुचि बढ़ रही है, यह महोत्सव नालंदा की गौरवशाली परंपरा को समकालीन संदर्भों से जोड़ने का प्रयास है। यह मंच देश भर के लेखकों, विद्वानों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों को एक साथ लाएगा, जहां नालंदा की भाषाओं, लिपियों, मौखिक परंपराओं और विचारधाराओं पर गहन विमर्श होगा। यह महोत्सव बिहार की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।


