अयोध्या में शिवभक्तों की आस्था का केंद्र है नागेश्वरनाथ मंदिर:सरयू तट पर त्रेताकाल में प्रकट हुए थे भगवान महादेव, जलाभिषेक से पूरी होती है मनोकामना

सरयू के प्राचीन तट पर स्थित नागेश्वरनाथ मंदिर करोड़ों शिवभक्तों की आस्था एवं श्रद्धा का केन्द्र है। मान्यता के अनुसार सावन के महीने में नागेश्वरनाथ का अभिषेक करने से भक्त सभी पापों से मुक्त हो जाता है। अधिकमास , महाशिवरात्रि मे शिवालय में भगवान शिव के पूजन एवं अभिषेक से भक्त की सभी कामनाएं पूरी हो जाती है । यह मंदिर देश क़े 108 ज्योतिर्लिंग में एक हैl 27 आक्रमणों को झेल कर चुका है यह ऐतिहासिक मंदिर नागेश्वर नाथ की महिमा का वर्णन न केवल हिन्दू भक्तों ने अपितु अंग्रेजो ने भ किया है। अंग्रेजी विद्वान विंसेटस्मिथ ने लिखा कि 27 आक्रमणों को झेल कर भी यह मंदिर अपनी अखंण्डरता को बनाये रखे है। हैमिल्टान ने लिखा है कि पूरे विश्व में इसके समान दूसरा दिव्य स्थान कोई नही है। अनेक संतों ने भी इसकी महिमा का गायन किया है। सोमनाथ, काशी विश्वनाथ के समान ही अयोध्या के नागेश्वर नाथ भी प्रख्यात विद्वान मैक्सकमूलर ने लिखा है कि सैकडों तूफानों को झेल कर भी यह मदिर अपनी अडिगता से अपने आप को स्थापित किए हुए है। कनिघंम ने उल्लेख किया है कि प्राणी को सच्ची शांति का विश्व में एक मात्र स्थान यही है। इतिहासकार लोचन का कहना कि रामेश्वरम, सोमनाथ, काशी विश्वनाथ के समान ही अयोध्या के नागेश्वर नाथ का भी शिवआराधना में विशिष्ट स्थान है। एक रात कुश को स्वप्न अयोध्या उनको पुकार रही थी
शिवालय के स्थापना के विषय में बहुत से आख्यान व संर्दभ प्राप्त होते है। धार्मिक मान्‍यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम अनंत धाम जाने से पूर्व अयोध्या राज्य को आठ भागों में बांट दिया था। उन्हो नें भरत के पुत्र पुष्कल तथा मणिभद्र लक्ष्मण के पुत्र अंगद व सुबाहु और शत्रुहन के पुत्र नील तथा भद्रसेन और अपने पु्त्र लव तथा कुश को समान भागों में बांट दिया। जिसमें कुश को कौशाम्बी् का राज्ये मिला, एक रात कुश को स्वप्न आया जिसमें अयोध्या नगरी उनसे कह रही थी कि भगवान श्रीराम के अनंत धाम जाने के बाद मेरी स्थित पूर्व की भांति नही रह गई । अयोध्या की जिम्मेपदारी हनुमान जी को सौपी गई थी। परन्तु् वे अपने स्वामी की गद्दी पर बैठना अनुचित मानते है। इस कारण आप आकर अयोध्या पर शासन करें। इस स्वप्न के आधार पर कुश अयोध्या् आकर इसे अपनी राजधानी बना कर रहने लगे। शिव पुराण के एक आलेख के अनुसार एक बार नौका बिहार करते समय उनके हाथ का कंगन सलिला सरयू में गिर गया जो कंगन सरयू में वास करने वाले कुमुद नाग की पुत्री के पास गिरा। यह कंगन वापस लेने के लिए राजा कुश तथा नाग कुमुद के मध्य घोर संग्राम हुआ जब नाग को यह लगा कि वह यहां पराजित हो जायेगा तो उसने भगवान शिव का ध्यान किया। कुश ने अनुरोध किया कि वे स्वंय यहां सर्वदा यही वास करें भगवान स्वंय प्रकट होकर युद्व को रूकवाया कुमुद ने कंगन देने के साथ भगवान शिव से यह अनुरोध है कि उनकी पु्त्री कुमुदनी का विवाह कुश के साथ करवाया दें । कुश ने इसे स्वीकार किया तथा भगवान शिव से यह अनुरोध किया कि वे स्वंय यहां सर्वदा यही वास करें भगवान शिव ने उनकी इस याचना को स्वीकार कर लिया। नागों के ध्यान( रक्षा )करने पर भगवान शिव प्रकट हुए थे। अत: इसे नागेश्वर नाथ के नाम से जाना जाता है । इसके बाद राजा कुश ने अयोध्यार में नागेश्वर नाथ मंदिर की स्थाापना की। कुश के द्वारा मंदिर के मुख्य द्वार पर एक शिलालेख लगवाया गया था। जो नष्ट हो चुका है।

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