MP News: ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने श्योपुर नगर पालिका अध्यक्ष से जुड़े मामले में राज्य सरकार और उसके अधिकारियों की कड़ी आलोचना की है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया ने कहा कि राज्य सरकार कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश कर रही है और दोषी अधिकारियों को बचाने में लगी हुई है। कोर्ट ने चंबल संभाग के कमिश्नर सुरेश कुमार की कार्यशैली को ‘धोखाधड़ीपूर्ण’ बताते हुए उनकी निंदा की और मुख्य सचिव को श्योपुर कलेक्टर (रिटर्निंग ऑफिसर) व कमिश्नर की जांच करने के निर्देश दिए हैं।
नगर परिषद चुनाव से जुड़ा है मामला
मामला श्योपुर नगर परिषद के चुनाव से जुड़ा है, जहां निर्वाचित प्रतिनिधि अंतरिम आदेश के कारण पद से बाहर हैं, जबकि सरकार मामले को बार-बार टालने की कोशिश कर रही है। कोर्ट ने कहा कि यह एक अजीबोगरीब स्थिति है। एक तरफ अंतरिम आदेश के कारण निर्वाचित प्रतिनिधि पद से बाहर हैं, दूसरी तरफ राज्य सरकार और उसके अधिकारी मामले को टालने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। कोर्ट इस रिवीजन को जल्द निपटाना चाहता है, लेकिन सरकार की ‘गैर-जिम्मेदाराना’ रवैये के कारण सुनवाई टल रही है। कोर्ट ने चिंता जताई, क्या हमें राजस्व संभाग के कमिश्नर स्तर के अधिकारियों से निष्पक्षता की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए?
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग लिंक शेयर करने पर निंदा
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने चंबल संभाग कमिश्नर सुरेश कुमार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़ने को कहा था। लेकिन कमिश्नर ने लिंक अनधिकृत व्यक्तियों से शेयर कर दिया, जिसे कोर्ट ने ‘कोर्ट की कार्यवाही में हस्तक्षेप’ माना। कमिश्नर ने बिना कोर्ट की अनुमति के लिंक शेयर किया, जो रिकॉर्डिंग करने की मंशा हो सकती है। उनकी इस हरकत की निंदा की जाती है। इसके बाद कोर्ट ने कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया।
कमिश्नर को शाम 4:30 बजे हाजिर होना पड़ा। पूछताछ में कमिश्नर ने स्वीकार किया कि उन्होंने कलेक्टर श्योपुर को कोई नोटिस नहीं जारी किया और बिना उनकी टिप्पणी लिए ही उन्हें क्लीन चिट दे दी। कोर्ट ने इसे पूर्वाग्रहपूर्ण जांच बताया और कहा कि कमिश्नर ने अपनी मर्जी से क्लीन चिट दी, जो दोषी को बचाने की कोशिश है।
जांच पर उठे सवाल, बिना तथ्यों क की जांच
कोर्ट ने जांच रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए। राज्य सरकार ने पहले ओआईसी (ऑफिसर इन चार्ज) संजय जैन को नोटिस जारी किया था, लेकिन बाद में पता चला कि आवेदन पर ओआईसी के हस्ताक्षर ही नहीं थे। कमिश्नर ने स्वीकार किया कि उन्होंने कलेक्टर श्योपुर के प्रस्ताव पर आंख बंद करके नोटिस जारी किया, बिना तथ्यों की जांच किए। आदेश में लिखा है, यह ‘गुड फेथ नहीं है, बल्कि कोर्ट पर धोखा खेलने की कोशिश है। बीएनएस की धारा 2(11) के मुताबिक, गुड फेथ में उचित सावधानी जरूरी है।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि रिटर्निंग ऑफिसर (कलेक्टर श्योपुर) चुनाव आयोग के अधीन काम करता है, फिर राज्य सरकार का ओआईसी बिना आयोग की मंजूरी के कैसे उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है? कमिश्नर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।
मामला क्या है
यह विवाद सिविल रिवीजन से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता सुमेर सिंह ने नगर पालिका अध्यक्ष रेणु गर्ग के निर्वाचन को चुनौती दी है। तर्क दिया कि निर्वाचित उम्मीदवार का चुनाव राजपत्र में अधिसूचित होने से पहले ही उन्हें नगर परिषद अध्यक्ष का पदभार सौंप दिया गया, जो गलत था। हालांकि, अब राज्य सरकार इस आवेदन से मुकर रही है और कह रही है कि यह बिना उसकी मंजूरी के दाखिल किया गया। कोर्ट ने इसे ‘धोखा’ करार दिया और कहा कि सरकार दोषियों को बचाने के लिए कोर्ट को भटका रही है। (MP News)


