Rare Disease Warrior: अक्सर हम छोटी-छोटी परेशानियों में टूट जाते हैं, लेकिन भीलवाड़ा के विनोद चौधरी की कहानी हमें सिखाती है कि जब शरीर साथ छोड़ दे, तब आत्मा को कैसे जगाया जाता है। विनोद के लिए ‘दुर्लभ’ शब्द का मतलब कमजोरी नहीं, बल्कि ‘अनमोल’ होना है। विश्व दुर्लभ रोग दिवस पर पत्रिका को विनोद ने बताया कि मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी बीमारी सुनने में जितनी वैज्ञानिक लगती है, जीने में उतनी ही दर्दनाक है।
यह एक ऐसी स्थिति है जहां इंसान का अपना ही शरीर धीरे-धीरे उसका साथ छोड़ देता है। मांसपेशियां गलने लगती हैं, सांसें भारी होने लगती हैं और दौड़ता-भागता जीवन अचानक एक व्हीलचेयर की चारदीवारी में सिमट जाता है। लेकिन विनोद ने चारदीवारी को अपनी कैद नहीं, बल्कि अपना कमांड सेंटर’ बना लिया। आज वे व्हीलचेयर पर बैठकर हार का शोक नहीं मनाते, बल्कि उन हजारों लोगों के लिए उम्मीद की मशाल जला रहे हैं जो दुर्लभ बीमारियों के अंधेरे में खो गए हैं।
बीमारी कोई सजा नहीं
विनोद चौधरी के शब्दों में एक अजब सी चमक है। वे कहते हैं कि “मुझे गर्व है कि भगवान ने मुझे ‘दुर्लभ’ बनाया। आखिर दुर्लभ वही तो होता है, जिसके जैसा दुनिया में कोई दूसरा न हो। यह बीमारी मेरे लिए कोई सजा नहीं, बल्कि एक हर दिन लड़ी जाने वाली जंग है, और मैं इस जंग का मुस्कुराता हुआ सिपाही हूं।
विनोद का सबसे बड़ा दर्द उन मासूम बच्चों के लिए है जो इस बीमारी के कारण अपना बचपन खेल के मैदानों में नहीं बिता पाते। उन्होंने अपनी जिंदगी का एक मकसद बना लिया है कि उन बच्चों और परिवारों का सहारा बनना। वे ‘दुर्लभ रोगी जागरूकता अभियान’ के जरिए घर-घर जाकर यह संदेश फैला रहे हैं कि शरीर सीमित हो सकता है, लेकिन सपने नहीं।
दया नहीं, चाहिए सम्मान का हक
अक्सर समाज दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति को ‘बेचारा’ समझकर दया की नजर से देखता है। विनोद इसी सोच को बदलना चाहते हैं। उनकी समाज और सरकार से एक ही गुहार है कि हमें दया की भीख नहीं, इलाज का अधिकार चाहिए। हॉस्पिटलों में हमारे लिए सस्ती दवाएं और पुनर्वास की जगह हो।


