मां की मौत, पिता ने छोड़ा…मासूम को थैलेसीमिया मेजर:ढाई साल की बच्ची के दस्तावेज नहीं, बुआ बोली- बोन मैरो ट्रांसप्लांट कैसे होगा

मां की मौत, पिता ने छोड़ा…मासूम को थैलेसीमिया मेजर:ढाई साल की बच्ची के दस्तावेज नहीं, बुआ बोली- बोन मैरो ट्रांसप्लांट कैसे होगा

‘मैंने बच्ची को गोद लिया। उसकी मां मर गई। पिता का अता-पता नहीं है। जब वह 11 महीने की हुई, तो डॉक्टरों ने थैलेसीमिया मेजर बताया। तब से हर 15 से 20 दिन में इंदौर के अस्पताल ले जाकर खून चढ़वाना पड़ता है। स्थाई इलाज बोन मैरो ट्रांसप्लांट है। इसमें भी 25 से 30 लाख खर्च होने हैं। दस्तावेजों के अभाव में इलाज नहीं हो पा रहा।’ ये दर्द संगीता और उनके पति दरियाव सिंह का है। शुजालपुर के मंदाना गांव में रहती हैं। अपने भाई लखन सिंह की बेटी नक्षत्रा को गोद लिया है। ढाई महीने की थी, तब मां की मौत हो गई। एक साल से पिता का अता-पता नहीं है। मां की मौत के बाद जो गोद मिली, वह बुआ की थी। जैसे-तैसे एक साल की हुई। बीमार रहने लगी, बुआ संगीता और फूफा दरियाव सिंह उसे अस्पताल लेकर पहुंचे। तमाम जांचों के बाद करीब एक महीने बाद पता चला कि उसे थैलेसीमिया है। बच्ची तो ढाई साल की हो गई, लेकिन इसकी पहचान नहीं है। उसके पास न तो आधार है न कोई और दस्तावेज, जिससे सरकारी मदद मिल सके। मासूम घर के आंगन में जब अपनी गाय की बछिया के साथ खेलती है, तो उसकी खुशी देखते ही बनती है। दैनिक भास्कर की टीम गांव पहुंची। यहां बच्ची की बुआ और फूफा से बात की। पढ़िए रिपोर्ट… बच्ची की देखरेख में ही दिन निकल जाता है
बच्ची की बुआ संगीता कहती हैं कि मेरा भाई लखन इस बच्ची को छोड़कर न जाने कहां चला गया। इसका हमारे अलावा कोई नहीं है। मेरे दो बेटे हैं, जब इसे लेकर घर आई तो लगा बेटी नहीं थी, भगवान ने इसे भेजकर हमारा परिवार पूरा कर दिया। बहुत छोटी थी, बहुत रोती थी। मेरा तो पूरा दिन इसकी देखरेख में ही निकल जाता था। भाई की शादी उज्जैन में हुई थी। 29 अगस्त 2023 को बेटी का जन्म हुआ। नाम रखा नक्षत्रा। ये भाई-भाभी की तीसरी संतान है। इससे बड़ी दो बहने हैं। वे अपने दादा के साथ गुजरात में रहती हैं। ये करीब ढाई महीने की थी, तभी भाभी की तबीयत खराब हो गई। हम लोगों ने उनका बहुत इलाज कराया, लेकिन बच नहीं पाई। उनके हार्ट में परेशानी आई थी। बुआ-फूफा ने लिया गोद
लखन की बहन संगीता और जीजा दरियाव ने बच्ची को गोद ले लिया। 6 अप्रैल 2024 को लखन ने गोदनामा नोटराइज्ड करवाया। दरियाव के साथ शाजापुर जिला मुख्यालय पहुंचकर महिला बाल विकास विभाग सहित अन्य दफ्तरों में बच्ची के पिता के रूप में दरियाव का नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन दिए। दफ्तरों में कभी ‘सिस्टम बंद’ तो कभी अन्य कारण बताकर टाल दिया गया। इसके बाद से लखन गांव मदाना छोड़कर लापता हो गया। फूफा बोले- 15 से 20 दिन में चढ़वाना पड़ता है खून
संगीता के पति दरियाव कहते हैं कि कर्ज के चलते लखन के पिता और छोटे भाई का मकान बैंक ने कुर्क कर लिया। परिवार के लोग गांव छोड़कर चले गए। लखन की दो बड़ी बेटियां मयूरी और पलक सरकारी आवासीय छात्रावास में पढ़ती थीं, उन्हें भी कुछ महीने पहले दादा शिवनारायण अपने साथ ले गए। जब नक्षत्रा 11 महीने की हुई, उसकी तबीयत बार-बार बिगड़ने लगी। डॉक्टरों ने बताया कि ये थैलेसीमिया से पीड़ित है। तब से हर 15 से 20 दिन में उसे इंदौर के अस्पताल ले जाकर खून चढ़वाना पड़ता है। हर महीने पांच हजार का खर्च
दरियाव पेशे से राजमिस्त्री हैं। खुद का परिवार भी है। जब भी बच्ची को ब्लड की जरूरत होती है, उसमें पांच हजार रुपए से ज्यादा खर्च हो जाते हैं। वह कहते हैं कि 19 अगस्त 2025 को शाजापुर कलेक्टर कार्यालय में आवेदन देकर बच्ची के इलाज के लिए आर्थिक मदद मांगी, लेकिन आज तक न सहायता मिली, न कोई जवाब। इलाज की उम्मीद में दरियाव 24 अगस्त 2025 को प्रतापगढ़ के एक कैंप में बच्ची को लेकर गए। यहां उसकी ह्यूमन ल्यूकोसाइट एंटीजन (एचएलए) जांच हुई। इस जांच का मैच उसकी सगी बहनों मयूरी और पलक से भी कराया गया। रिपोर्ट हाल ही में आई, जिसमें पलक से एचएलए मैच पाया गया। इस टेस्ट के बाद पलक अपनी बहन को बोन मैरो देने को तैयार है। इसमें भी 25 से 30 लाख रुपए खर्च होना है। बच्ची के नाम से दस्तावेज नहीं
अब सबसे बड़ी रुकावट दस्तावेज हैं। दरियाव किसी भी कागज में बच्ची के पिता दर्ज नहीं है। जैविक पिता लापता है, इसलिए बच्ची का आधार कार्ड नहीं बन पा रहा। पिता का आय प्रमाण पत्र, अन्य दस्तावेज नहीं होने से बोन मैरो ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया अटकी है। कोल इंडिया कंपनी की थैलेसीमिया बाल सेवा योजना, प्रधानमंत्री सहायता कोष और मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान जैसी योजनाओं में आवेदन के लिए भी पिता का आय प्रमाण पत्र, अन्य दस्तावेज जरूरी है। आखिर में संगीता कहती हैं, “नन्ही थी, तब से सीने से लगाकर पाल रही हूं। हमारी बच्ची का आधार कार्ड नहीं बन पाया, इसलिए वह लाडली लक्ष्मी योजना में भी दर्ज नहीं है। दिव्यांग पेंशन का कार्ड भी नहीं बन सका।” दरियाव कहते हैं, “हम चाहते हैं कि कागजों में हम इसके माता-पिता बन जाएं। सरकार और समाज मदद करे, तभी यह बच्ची बच पाएगी। इलाज में भी सरकार और समाज की मदद चाहिए। महिला एवं बाल विकास अधिकारी संजय त्रिपाठी ने बताया, संबंधित को बुलाकर मदद का प्रयास करेंगे, अभी कोई दस्तावेज नहीं मिले हैं।

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