मेंटल हेल्थ– सक्सेसफुल लोगों को इंस्टा पर स्टॉक करती हूं:लगता है सब सफल और खुश हैं, मैं ही पीछे रह गई, इस दुख से कैसे निकलूं

मेंटल हेल्थ– सक्सेसफुल लोगों को इंस्टा पर स्टॉक करती हूं:लगता है सब सफल और खुश हैं, मैं ही पीछे रह गई, इस दुख से कैसे निकलूं

सवाल- मैं 26 साल की वर्किंग प्रोफेशनल हूं। मेरी प्रॉब्लम ये है कि मैं हर वक्त अपनी तुलना सक्सेसफुल लोगों से करती रहती हूं। फिर चाहे वो सेलिब्रिटीज हों या मेरे आसपास के लोग। मैं हर सफल व्यक्ति के पैरलल खुद को रखकर उससे कंपैरिजन करने लगती हूं। कई बार मैं देर रात तक उन्हें सोशल मीडिया पर स्टॉक करती रहती हूं, उनके वेकेशन के फोटोज देखती रहती हूं। सोचती हूं कि सब कितने खुश, कितने सक्सेसफुल हैं और मेरा जीवन कितना बोरिंग है। इससे मेरी सेल्फ वर्थ भी कम हो रही है। मैं क्या करूं? एक्सपर्ट- डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। जवाब- आप जो महसूस कर रही हैं, वह बहुत रियल और कॉमन है, खासतौर पर आज के सोशल मीडिया दौर में। अच्छी बात यह है कि ये कोई स्थायी समस्या नहीं है। यह एक समझने और बदलने योग्य पैटर्न है। मैं साइकोलॉजी के कुछ टूल्स और फ्रेमवर्क्स की मदद से आपको एक प्रैक्टिकल रोडमैप देने की कोशिश करूंगा। आपकी स्थिति की क्लिनिकल अंडरस्टैंडिंग सबसे पहले हम आपकी सिचुएशन को मनोविज्ञान के नजरिए से समझने की कोशिश करेंगे। ये देखकर मन में ऑटोमैटिक ये ख्याल आते हैं- साइकोलॉजिकल एनालिसिस: ऐसा क्यों हो रहा है? मनोविज्ञान में एक कॉन्सेप्ट है, सोशल कंपैरिजन थ्योरी। यह थ्योरी कहती है कि हम खुद को समझने के लिए दूसरों से तुलना करते हैं। लेकिन समस्या तब होती है, जब यह तुलना “अपवर्ड कंपैरिजन” बन जाती है। यानी हम हमेशा सिर्फ हमसे बेहतर, अमीर, सुंदर या सफल लोगों से ही तुलना करते हैं। अपवर्ड कंपैरिजन का प्रभाव अपवर्ड कंपैरिजन के कुछ ऐसे साइकोलॉजिकल प्रभाव हो सकते हैं- सोशल मीडिया की झूठी दुनिया सोशल मीडिया पर आप कुछ लोगों की जो जिंदगी देख रही हैं, वो उनकी पूरी लाइफ नहीं है। वो सिर्फ उतनी ही है, जो वो आपको दिखाना चाहते हैं। इसलिए हमें ये बात याद रखनी चाहिए- ज्यादा सोशल मीडिया यूज के नुकसान सोशल मीडिया का बहुत ज्यादा इस्तेमाल इसलिए खतरनाक है क्योंकि मेंटल, इमोशनल और हेल्थ संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इससे सिर्फ सेल्फ वर्थ ही कम नहीं होती बल्कि नींद, भूख जैसे बेसिक हेल्थ पैरामीटर्स पर भी इसका नेगेटिव प्रभाव पड़ता है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें- डोपामिन लूप और स्टॉकिंग बिहेवियर सोशल मीडिया पर बार-बार किसी की फोटो, वीडियो और लाइफ अपडेट को देखते हुए हम एक तरह के डोपामिन लूप में फंसते जाते हैं। यह एक तरह का बिहेवियरल लूप बन जाता है- सेल्फ वर्थ: सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 9 सवाल हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए आपका जवाब अगर ‘बिल्कुल नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘बहुत ज्यादा’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। अगर आपका टोटल स्कोर 0 से 8 के बीच में है तो ये सामान्य हल्का प्रभाव है। लेकिन अगर आपका स्कोर 19 से 27 के बीच है तो कंपैरिजन स्केल पर आपका स्कोर बहुत ज्यादा है। आप बहुत ज्यादा तुलना करती हैं और आपकी सेल्फ वर्थ कम है। ऐसे में आपको एक्टिव कदम उठाने की जरूरत है। 2. संभावित डायग्नोस्टिक फॉर्मुलेशन यह कोई स्पष्ट मानसिक बीमारी नहीं है। यह सिर्फ लो सेल्फ एस्टीम और गलत कंपैरिजन पैटर्न में फंसने का मामला है। हालांकि अगर यह पैटर्न ज्यादा बढ़ जाए और एडिक्टिव स्टेज तक पहुंच जाए तो ये जोखिम हो सकते हैं- CBT आधारित सेल्फ हेल्प प्लान यहां मैं आपको कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी पर आधारित एक सेल्फ हेल्प प्लान दे रहा हूं। स्टेप 1 अवेयरनेस स्टेप 2 अपनी सोच को चुनौती देना अपने मन में आने वाले नकारात्मक ख्यालों को चुनौती दें। स्टेप 3 व्यवहार में बदलाव 1. सोशल मीडिया से जुड़े नए नियम 2. सोशल मीडिया का पैसिव नहीं, एक्टिव उपयोग 3. कंपैरिजन डिटॉक्स एक्सरसाइज स्टेप 4 सेल्फ वर्थ रीबिल्ड हर दिन अपनी कोई भी तीन छोटी उपलब्धियां लिखें। आज मैंने क्या अच्छा किया? कुछ उदाहरण: स्टेप 5 इमोशनल रेगुलेशन प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी? अगर ये बिहेवियर पैटर्न डिप्रेशन की ओर ले जाए, नींद और भूख के पैटर्न में बहुत ज्यादा बदलाव हो या उदासी लंबे समय तक बनी रहे तो प्रोफेशनल हेल्प से मदद मिल सकती है। सबसे जरूरी बात याद रखें, तुलना अक्सर अधूरी जानकारी पर आधारित होती है। हम अपनी पूरी जिंदगी जानते हैं, जबकि दूसरे की सिर्फ उतनी, जितनी वह हमें दिखा रहा है। अपनी सेल्फ वर्थ पर फोकस करें और अपनी सफलता की परिभाषा खुद तय करें। ………………
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