सीवान सदर अस्पताल में एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। पुराने ओपीडी बी ब्लॉक भवन को तोड़ने के दौरान एक कमरे से लाखों रुपए की एक्सपायर हो चुकी दवाएं और मेडिकल उपकरण बरामद हुए हैं। यह घटना स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के गृह जिले से सामने आई है, जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सीसीयू निर्माण के लिए पुराने भवन को खाली कराकर तोड़ा जा रहा था। मजदूरों ने दूसरी मंजिल के एक कमरे की दीवार तोड़ी, तो अंदर छुपाकर रखे गए दवाओं के कार्टून नीचे गिरने लगे। मौके पर मौजूद लोगों ने देखा कि कई कार्टून तो कभी खोले भी नहीं गए थे।
2015 बैच की बताई जा रही दवाएं बरामद दवाएं 2013 से 2015 बैच की बताई जा रही हैं, जो वर्षों पहले ही अपनी उपयोग अवधि पार कर चुकी थीं। इनमें बच्चों की एंटीबायोटिक, मल्टीविटामिन, ईयर ड्रॉप, सिप्रोफ्लोक्सासिन, ओफ्लोक्सासिन-ऑर्निडाजोल, एसिटामिनोफेन, मिडजोलम इंजेक्शन और गामा बेंजीन हेक्साक्लोराइड जैसी महत्वपूर्ण दवाएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, हजारों की संख्या में गॉज, कॉटन, चादर और सर्जिकल सामग्री जैसे मेडिकल उपकरण भी पाए गए। इनकी अनुमानित कीमत 10 से 15 लाख रुपए आंकी गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस कमरे से ये दवाएं मिलीं, उसके ठीक बगल में वर्षों तक सहायक औषधि नियंत्रक का कार्यालय संचालित होता रहा। दवाओं को छुपाकर रखा गया था इसके बावजूद इतनी बड़ी मात्रा में दवाओं को छुपाकर रखा गया और किसी अधिकारी को इसकी भनक तक नहीं लगी। यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब मरीजों को अक्सर अस्पताल में दवाओं की कमी का सामना करना पड़ता है, जबकि लाखों की दवाएं यहां सड़ रही थीं। इस घटना ने सरकारी संसाधनों की खुली बर्बादी और जनता के साथ धोखे को उजागर किया है। हैरानी की बात यह रही कि सूचना मिलने के लगभग दो घंटे बाद तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। केवल दो कर्मचारी पहुंचे, जिन्होंने स्थिति संभालने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। यह अस्पताल प्रशासन की घोर लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी को दर्शाता है। सीवान सदर अस्पताल में एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। पुराने ओपीडी बी ब्लॉक भवन को तोड़ने के दौरान एक कमरे से लाखों रुपए की एक्सपायर हो चुकी दवाएं और मेडिकल उपकरण बरामद हुए हैं। यह घटना स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के गृह जिले से सामने आई है, जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सीसीयू निर्माण के लिए पुराने भवन को खाली कराकर तोड़ा जा रहा था। मजदूरों ने दूसरी मंजिल के एक कमरे की दीवार तोड़ी, तो अंदर छुपाकर रखे गए दवाओं के कार्टून नीचे गिरने लगे। मौके पर मौजूद लोगों ने देखा कि कई कार्टून तो कभी खोले भी नहीं गए थे।
2015 बैच की बताई जा रही दवाएं बरामद दवाएं 2013 से 2015 बैच की बताई जा रही हैं, जो वर्षों पहले ही अपनी उपयोग अवधि पार कर चुकी थीं। इनमें बच्चों की एंटीबायोटिक, मल्टीविटामिन, ईयर ड्रॉप, सिप्रोफ्लोक्सासिन, ओफ्लोक्सासिन-ऑर्निडाजोल, एसिटामिनोफेन, मिडजोलम इंजेक्शन और गामा बेंजीन हेक्साक्लोराइड जैसी महत्वपूर्ण दवाएं शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, हजारों की संख्या में गॉज, कॉटन, चादर और सर्जिकल सामग्री जैसे मेडिकल उपकरण भी पाए गए। इनकी अनुमानित कीमत 10 से 15 लाख रुपए आंकी गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस कमरे से ये दवाएं मिलीं, उसके ठीक बगल में वर्षों तक सहायक औषधि नियंत्रक का कार्यालय संचालित होता रहा। दवाओं को छुपाकर रखा गया था इसके बावजूद इतनी बड़ी मात्रा में दवाओं को छुपाकर रखा गया और किसी अधिकारी को इसकी भनक तक नहीं लगी। यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब मरीजों को अक्सर अस्पताल में दवाओं की कमी का सामना करना पड़ता है, जबकि लाखों की दवाएं यहां सड़ रही थीं। इस घटना ने सरकारी संसाधनों की खुली बर्बादी और जनता के साथ धोखे को उजागर किया है। हैरानी की बात यह रही कि सूचना मिलने के लगभग दो घंटे बाद तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचा। केवल दो कर्मचारी पहुंचे, जिन्होंने स्थिति संभालने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। यह अस्पताल प्रशासन की घोर लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी को दर्शाता है।


