इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक अहम आदेश में कहा कि जब मजिस्ट्रेट कुछ खास लोगों के मामले में उनके लिए ‘असुविधाजनक’ जांच के आदेश देते हैं तो कभी-कभी बड़े पुलिस अधिकारी उन पर ‘दबाव डालने’ की कोशिश करते हैं।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने मजिस्ट्रेटों को साफ तौर पर सलाह दी कि अगर उन्हें किसी पुलिस अधिकारी की तरफ से ऐसी कोई शर्मिंदगी या दबाव महसूस हो, तो वे कभी भी हाईकोर्ट में अवमानना का मामला भेज सकते हैं। जरूरी आदेश देने में मजिस्ट्रेट हिचकिचाएं नहीं बेंच ने अपने आदेश में कहा, “मजिस्ट्रेट को ज़रूरी आदेश देने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, सिर्फ इसलिए कि किसी समय किसी मनमानी करने वाले पुलिस अधिकारी ने उन्हें कुछ परेशानी दी हो। अगर सच में किसी पुलिस अधिकारी की तरफ से मजिस्ट्रेट को किसी तरह की शर्मिंदगी या दबाव महसूस होता है तो वे कभी भी इस कोर्ट में अवमानना का मामला भेज सकते हैं।” फर्रुखाबाद के केस में सख्त हाईकोर्ट हाईकोर्ट ने यह बात तब कही जब वह उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद ज़िले में प्राथमिकी दर्ज करने से जुड़े एक मामले में एक क्रिमिनल रिट याचिका को सीधे तौर पर खारिज कर रही थी। असल में याचिकाकर्ता संदीप औदिच्य ने फर्रुखाबाद के पुलिस अधीक्षक को निर्देश देने की मांग की थी कि वे 19 अगस्त, 2025 की उसकी अर्जी जो प्राथमिकी दर्ज करने के लिए दी गई थी उसे एक तय समय सीमा के अंदर फैसला लेने का निर्देश दिया जाय। कोर्ट को “लगभग बेअसर” बना देती हैं ऐसी मांगों पर नाराज़गी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को अर्जियों पर फैसला लेने का निर्देश देने वाली मांगें कोर्ट को “लगभग बेअसर” बना देती हैं, क्योंकि अधिकारी यह मान लेते हैं कि कोर्ट उनसे सिर्फ फैसला लेने के लिए कह सकता है, न कि खुद मामले पर फैसला दे सकता है। बेंच ने कहा कि इससे “रिट याचिकाओं की बाढ़” आ जाती है, जिनमें कोर्ट को असल में कुछ भी फैसला नहीं लेना होता।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में, जहां किसी पुलिस थाने का इंचार्ज अधिकारी, बीएनएस की धारा 173 (4) के तहत किसी संज्ञेय अपराध (गंभीर अपराध) की जानकारी दर्ज करने से मना कर देता है, तो शिकायत करने वाले के पास यह विकल्प होता है कि वह उस जानकारी का सार लिखकर डाक से संबंधित पुलिस अधीक्षक को भेज दे। कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी जानकारी मिलने पर एसपी का यह दायित्व है कि यदि उससे किसी संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो वह या तो स्वयं उस अपराध की जांच करे, या बीएनएसएस के तहत निर्धारित तरीके से अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी को जांच करने का निर्देश दे। बेंच ने आगे स्पष्ट किया कि यदि एसपी भी अपने कर्तव्य में कोताही बरतता है तो इसका उपाय बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि न्यायिक मजिस्ट्रेट को बीएनएसएस की धारा 173(4) के तहत शपथ-पत्र के साथ कोई आवेदन प्राप्त होता है तो वह—ऐसी जांच करने के बाद जिसे वह आवश्यक समझता है और पुलिस अधिकारी द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के बाद—पुलिस द्वारा जांच किए जाने का आदेश दे सकता है। ऐसी परिस्थितियों में अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता के लिए उपाय यह है कि वह बीएनएसएस की धारा 174(3) के तहत एक आवेदन के माध्यम से संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जाए। बेंच ने स्वीकार किया कि कुछ मामलों में ऐसा होता है कि जब मजिस्ट्रेटों के समक्ष ऐसे आवेदन किए जाते हैं और जांच के आदेश दिए जाते हैं—विशेषकर ऐसे आदेश जो कुछ लोगों के लिए असहज हों—तो इससे “पुलिस के तथाकथित ‘वरिष्ठ अधिकारियों’ की त्योरियां चढ़ जाती हैं और वे मजिस्ट्रेटों को डराने-धमकाने के हथकंडे अपनाने लगते हैं। अदालत ने मजिस्ट्रेटों को आगे यह सलाह दी कि वे आवश्यक आदेश पारित करने में संकोच न करे। केवल इसलिए कि किसी समय, किसी मनमानी करने वाले पुलिस अधिकारी ने मजिस्ट्रेट को कुछ असुविधा पहुंचाई हो। और यदि आवश्यक हो तो हाईकोर्ट को अवमानना का संदर्भ भेजें। हाईकोर्ट ने इस याचिका में वैधानिक वैकल्पिक उपाय की उपलब्धता को देखते हुए इसे खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज करवाने के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट के पास जाने का याचिकाकर्ता का उपाय अभी भी खुला है।


