इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत प्राप्त प्रत्येक आवेदन पर मजिस्ट्रेट एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं है। न्यायालय ने कहा कि मजिस्ट्रेट अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए ऐसे प्रकरण को ‘शिकायत’ के रूप में भी दर्ज कर सकता है।और एफआईआर दर्ज कर विवेचना करने का निर्देश भी दे सकता है।यह उसके विवेक पर निर्भर है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला ने प्रदीप कुमार की याचिका को खारिज करते हुए दिया। आरोप है कि संदीप पर जानलेवा हमला कर उसे मोटरसाइकिल से घसीटा गया, जिससे उसका पैर कट गया। पुलिस कार्रवाई न होने पर आवेदक ने कानपुर देहात के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दिया, जिसे एफआईआर के बजाय शिकायत के रूप में दर्ज किया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 175(3) काफी हद तक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के समान है और पूर्व के सिद्धांत लागू रहेंगे। जब साक्ष्य स्वयं प्रस्तुत किए जा सकते हों, तब पुलिस जांच आवश्यक नहीं होती। अदालत ने मजिस्ट्रेट के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।केस कार्यवाही जारी रहेगी।


