हाल ही में राम नवमी के पावन पर्व के अवसर पर गुजरात के जाने-माने उद्योगपति,शाम सेवा फाउंडेशन के चेरमेन और प्रखर समाजसेवी श्री मगनभाई पटेलने एक धार्मिक कार्यक्रम में अपने संबोधन में कहा कि रामायण केवल एक महाकाव्य या धार्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखानेवाला एक गहरा भंडार है। भगवान श्री राम का जीवन हमें सत्य, धर्म, त्याग और कर्तव्य पालन का मार्ग दिखाता है।
प्राचीन समय में एक वनवासी परिवार में एक बहुत ही सुंदर बालक का जन्म हुआ। घर में चारों ओर खुशियाँ मनाई जा रही थीं और मंगल गीत गाए जा रहे थे, तभी एक नि:संतान वनवासी स्त्री आई और उस बालक को उठा ले गई। परिवार ने बहुत खोजबीन की पर बालक कहीं नहीं मिला। दूसरी ओर, उस वनवासी स्त्री उस बालक का पालन-पोषण अपने पुत्र की तरह करने लगी और उसका नाम ‘रत्नाकर’ रख दिया। धीरे-धीरे रत्नाकर बड़ा होने लगा,धनुष-बाण उसके साथी और मांस उसका भोजन बन गया। वह अन्य वनवासी बालकों के साथ खेलता और घूमता था, जिसके कारण उसका स्वभाव और आदतें भी वैसी ही हो गईं। समय के साथ वह एक क्रूर, अत्याचारी और पापी लुटेरा बन गया।
एक दिन जब देवर्षि नारद वहाँ से गुजर रहे थे, तब रत्नाकर ने उन्हें रोक कर कहा, ‘तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह मुझे दे दो, वरना तुम यहाँ से जीवित नहीं जा सकोगे।’ तब देवर्षि नारदने सहजता से कहा, ‘अरे मूर्ख ! हम ऋषि-मुनि संसार की भौतिक सुख-सुविधाओं से ऊपर होते हैं। तू अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए यह पाप करता है, पर क्या वे तेरे इस पाप के भागीदार बनेंगे ?’ रत्नाकरने घर जाकर अपने परिवार से पूछा, तो सभी ने उसके पाप का भागीदार बनने से साफ इनकार कर दिया। यह जानकर उसे गहरा आघात लगा और उसने संसार का त्याग करने का निर्णय लिया और एक पेड़ के नीचे बैठकर प्रायश्चित करने के लिए तपस्या करने लगा। लंबी तपस्या के दौरान उसके शरीर पर दीमकों का ढेर बन गया (दीमक को संस्कृत में ‘वाल्मीक’ कहा जाता है)। समय के साथ उसे अलौकिक ब्रह्मांड का ज्ञान प्राप्त हुआ। तपस्या पूर्ण होने के बाद अब वह वालिया लुटारे से वाल्मीकि ऋषि बन गया और उन्होंने वहाँ एक आश्रम बनाया, जहाँ आदिवासी लोग रहते थे और गौ-सेवा होती थी। उन्होंने वहाँ फल-सब्जियों का उत्पादन शुरू किया और आध्यात्मिक ज्ञान पर प्रवचन देकर उस आश्रम को अध्यात्म का एक आदर्श केंद्र बना दिया।
श्रवण की कथा
एक श्रवण नाम का युवा अपने अंधे माता-पिता को ‘कांवड़’ में बैठाकर तीर्थयात्रा पर निकला था। यात्रा के दौरान जब माता-पिता को प्यास लगी, तो श्रवण घड़ा लेकर सरयू नदी के तट पर पानी लेने गया। उसी समय अयोध्या के राजा दशरथ शिकार के लिए निकले थे। घड़े में पानी भरने की आवाज सुनकर उन्हें लगा कि कोई हिंसक वन्य जीव पानी पी रहा है। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रकृति की रचना के अनुसार, जब बाघ, सिंह या तेंदुआ जैसे मांसाहारी जीव अपनी जीभ से पानी पीते हैं, तो ‘चप-चप’ की आवाज आती है; जबकि हिरण,गाय या भैंस जैसे शाकाहारी जीव जब अपने होंठों से पानी पीते हैं, तो कोई आवाज नहीं होती। राजा दशरथने आवाज की दिशा में ‘शब्दभेदी बाण’ चलाया, जो सीधा श्रवण की छाती में जा लगा। घायल श्रवण की चीख सुनकर राजा दशरथ वहां दौड़े आए।
मृत्यु के समीप जानेवाले श्रवणने राजा दशरथ को अपने माता-पिता की दिशा बताते हुए कहा कि मेरे अंधे माता-पिता प्यासे हैं, उन्हें जाकर पानी पिलाइए। राजा दशरथ जब श्रवण के माता-पिता के पास पहुंचे और श्रवण की आवाज में पानी पीने को कहा, तब उन्होंने पहचान लिया कि वह श्रवण नहीं है। तब दशरथने पूरी सच्चाई बताई तब श्रवण के अंध माता-पिता को गहरा आघात लगा और अपने पुत्र के वियोग में प्राण त्यागने से पहले उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया कि, ‘जिस प्रकार हम पुत्र वियोग में अपने प्राण त्याग रहे हैं, वैसे ही तुम्हारा अंत भी पुत्र वियोग में ही होगा’।
“माता-पिता की सेवा ही ईश्वर की सर्वोपरि सेवा है जिसे श्रवणने सही अर्थों में सिद्ध कर दिखाया है। आज के समय में युवा पीढ़ी के पास अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा के लिए समय नहीं है। जिन माता-पिताने अपने बच्चों के भविष्य निर्माण के लिए अनगिनत संघर्ष किए और कई कष्ट सहकर उन्हें बड़ा किया, उन्हीं बच्चों के पास अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुंचे असहाय माता-पिता की देखभाल के लिए समय नहीं है और इसी कारण आज ‘वृद्धाश्रम’ जैसी व्यवस्थाओं का निर्माण हुआ है। आधुनिक संसार में आज रामायण जैसा ‘श्रवण’ कोई नहीं बना है, परंतु श्रवण जैसा बनने के प्रयास निरंतर किए जा रहे हैं।”
“तुलसी हाय गरीब की, कभु न खाली जाय,
मुए ढोर के चाम से, लोहा भस्म हो जाय।”
भावार्थ
इन पंक्तियों का अर्थ है कि गरीब या असहाय व्यक्ति की ‘बददुआ कभी विफल नहीं होती। जिस प्रकार मरे हुए पशु के चमड़े से बनी धौंकनी (Blower) से निकलनेवाली हवा लोहे को भी पिघलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार सताए हुए गरीब की आह किसी का भी विनाश कर सकती है। कभी भी किसी असहाय या गरीब व्यक्ति की बददुआ नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि भले ही उनके पास शारीरिक शक्ति न हो, लेकिन उसकी प्रार्थना में बहुत बड़ी ताकत होती है।
स्वयं भगवान के पिता राजा दशरथ को भी इसका परिणाम भुगतना पड़ा था। राजा दशरथ का अंत भी पुत्र वियोग में ही हुआ और जब उनकी मृत्यु हुई, तब राम, भरत, लक्ष्मण या शत्रुघ्न में से कोई भी उनके पास उपस्थित नहीं था।
भगवान श्री राम का जन्म
श्री राम और उनके भाइयों के जन्म से पहले राजा दशरथ और रानी कौशल्या की एक पुत्री थी, जिनका नाम शांता था। कौशल्या की बड़ी बहन वर्षिणी और उनके पति, अंग देश के राजा रोमपद की कोई संतान नहीं थी। अतः मित्रता के नाते राजा दशरथने अपनी पुत्री शांता उन्हें गोद दे दी । शांता का विवाह ऋषि श्रृंगी के साथ हुआ था। जब राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति के लिए चिंतित थे, तब उन्होंने ऋषि श्रृंगी से यज्ञ करवाया और पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मांगा। इसके परिणामस्वरूप कौशल्याने राम, कैकेयीने भरत और सुमित्राने लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न को जन्म दिया। श्री राम का जन्म सूर्यवंश (इक्ष्वाकु वंश) में हुआ था। इसी कुल में ‘रघु’ नाम के अत्यंत तेजस्वी राजा हुए, जिनके नाम पर यह वंश ‘रघुकुल’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। रघुकुल अपनी परंपरा “रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाए पर बचन न जाई” (वचन पालन) के लिए आज भी जाना जाता है।
श्री राम की शिक्षा और गुरुकुल
श्री राम और उनके भाइयों की शिक्षा महर्षि वशिष्ठ के गुरुकुल में हुई थी। वहाँ उन्होंने वेद, पुराण और शास्त्रों के साथ-साथ शस्त्रविद्या, धनुर्विद्या और राजनीति का गहन ज्ञान प्राप्त किया था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह गुरुकुल अयोध्या के निकट सरयू नदी के तट पर स्थित था। राजकुमार होने के बावजूद,चारों भाइयोंने महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में सामान्य विद्यार्थियों की तरह कठोर नियमों का पालन किया। उन्हें राजसी वैभव त्यागकर आश्रम में साधारण वस्त्र पहनने पड़ते थे और जमीन पर चटाई बिछाकर सोना पड़ता था।गुरुकुल के नियम के अनुसार, विद्यार्थियों को अहंकार से दूर रखने के लिए और विनम्रता सीखने के लिए गाँव में जाकर भिक्षा माँगनी पड़ती थी। उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए आश्रम के कार्य जैसे—रसोई के लिए लकड़ियाँ बीनना, खेती करना,पानी भरना और गौ-सेवा करना इत्यादि था।
एक बार महर्षि वशिष्ठने चारों भाइयों की बुद्धिमानी की परीक्षा लेने के लिए उन्हें एक-एक मुट्ठी गेहूँ दिए और कहा,’इन्हें इस तरह उपयोग करो कि ये कभी खत्म न हों।’ लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नने उन गेहूँ के दानों को संभालकर अपने पास रखा,जबकि श्री रामने उन दानों को आश्रम के पास के एक खेत में बो दिया। समय आने पर उन दानों से कई गुना अधिक गेहू की फसल तैयार हुई। यह श्री राम के बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का उत्तम उदाहरण है।
गुरुकुल से विद्या प्राप्त कर जब चारों भाई अयोध्या लौटे, तब श्री राम तुरंत राजकाज में नहीं लगे। वाल्मीकि रामायण और अन्य ग्रंथों के अनुसार,उन्होंने पिता दशरथ से अनुमति लेकर पूरे भारतवर्ष की तीर्थयात्रा की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने सामान्य जनता की कठिनाइयों और देश की भौगोलिक स्थिति को बहुत करीब से देखा। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद श्री राम अत्यंत गंभीर और उदास हो गए थे। संसार की क्षणभंगुरता को देखकर उनके मन में वैराग्य जागृत हुआ था। उस समय गुरु वशिष्ठने उन्हें जो दिव्य ज्ञान दिया,उसे ‘योग वाशिष्ठ’ कहा जाता है। इस संवाद में ब्रह्मांड और जीवन के रहस्यों को समझने के बाद ही श्री राम पुनः सांसारिक कर्तव्यों के प्रति सक्रिय हुए थे।
सारांश
आज की शिक्षा हिंदू संस्कृति के अनुरूप नहीं है, जिसके कारण आज के विद्यार्थी ऊँची डिग्रियाँ तो प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। इसके गंभीर परिणाम हम आज समाज में देख रहे हैं; इसलिए पाठ्यक्रम में ‘गुरुकुल’ जैसी शिक्षा पद्धति का समावेश होना अनिवार्य है। प्राचीन समय में गुरुकुल शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान (Literacy) नहीं, बल्कि ‘चरित्र निर्माण’ था। श्री रामने गुरुकुल में केवल शस्त्र और शास्त्र ही नहीं सीखे, बल्कि गुरु के प्रति परम आदर भाव भी बनाए रखा। आज की शिक्षा में आर्थिक स्तर के आधार पर भेदभाव दिखाई देता है, जिससे बच्चों में बचपन से ही ऊंच-नीच की भावना जन्म लेती है,इसके विपरीत, गुरुकुल में गुरु केवल एक शिक्षक ही नहीं,बल्कि ‘आध्यात्मिक पिता’ भी होते थे।
आज गुरु-शिष्य का संबंध व्यावसायिक (Professional) हो गया है और शिक्षा एक ‘संस्कार’ के बजाय ‘व्यवसाय’ बन गई है। गुरुकुल में शिक्षा प्रकृति की गोद में दी जाती थी, जिससे विद्यार्थी पर्यावरण से जुड़े रहते थे, जबकि आज हम बंद कमरों में मोबाइल और लैपटॉप के सामने सिमट गए हैं। भगवान श्री कृष्ण, सुदामा और बलराम का सांदीपनि आश्रम भी इसी आदर्श परंपरा का प्रतीक था।
सीता स्वयंवर
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, ऋषि विश्वामित्र का उल्लेख भी श्री राम के गुरु के रूप में मिलता है। वे राम और लक्ष्मण को राजा जनक के निमंत्रण पर मिथिला नगरी (जनकपुरी) में उनकी पुत्री सीता के स्वयंवर में ले गए। वहां भगवान शिव द्वारा राजा जनक को दिया गया धनुष रखा गया था, जिसका नाम ‘पिनाक’ था। यह धनुष भगवान शिव ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ के समय उपयोग किया था, जिसे बाद में देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवरात को धरोहर के रूप में सौंपा था। राजा जनक ने शर्त रखी थी कि जो कोई इस शिव धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा (डोरी) चढ़ाएगा, उसी के साथ सीता का विवाह होगा। यह धनुष इतना भारी था कि इसे हिलाने के लिए भी अनेक बलशाली पुरुषों की आवश्यकता पड़ती थी। बचपन में एक बार सीता जी ने खेल-खेल में इस धनुष को एक हाथ से उठा लिया था। यह देखकर राजा जनक समझ गए थे कि सीता कोई साधारण कन्या नहीं हैं और उनके लिए वर भी वैसा ही पराक्रमी होना चाहिए।
स्वयंवर में देश-भर के राजाओं के साथ लंका का राजा रावण भी आया था। एक-एक करके सभी राजाओं ने प्रयास किया, लेकिन वे धनुष को हिला तक न सके। अपने बल पर अभिमान करनेवाला रावण भी असफल रहा और अपमानित होकर लौट गया। तब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से श्री राम उठे और उन्होंने अत्यंत सहजता से धनुष उठाकर उसकी प्रत्यंचा खींचते हुए उसे बीच से तोड़ दिया।धनुष टूटने की ध्वनि अत्यंत भयानक थी। धनुष टूटने के पश्चात राजा जनकने सभी की उपस्थिति में श्री राम को सीता के पति के रूप में घोषित किया और समस्त राजाओं उपस्थिति में सीताजीने श्री राम को वरमाला पहनाई। इसके बाद राजा जनकने राजा दशरथ को सादर निमंत्रण भेजा और एक ही भव्य विवाह मंडप में राम-सीता के साथ-साथ लक्ष्मण का उर्मिला से, भरत का मांडवी से और शत्रुघ्न का श्रुतकीर्ति के साथ विवाह संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात श्री राम और सीताजी लगभग १२ वर्षों तक अयोध्या में रहे। यह समय उनके जीवन का सबसे शांत और सुखद समय माना जाता है।
सारांश
रामायण में आदर्श पिता के रूप में ‘राजा जनक’ और आदर्श पुत्री के रूप में ‘माता सीता’ का वर्णन मिलता है। श्री राम से विवाह के पश्चात राजा जनक या उनके परिवारने सीताजी के वैवाहिक जीवन में कभी हस्तक्षेप नहीं किया; उनके दुखों में वे केवल आँसू बहाते रहे। जब सीताजी गर्भवती थीं और लोक-निंदा के कारण उन्हें वाल्मीकि ऋषि के आश्रम जाना पड़ा, तब भी उन्होंने अत्यंत धैर्य और पति की आज्ञा का पालन करते हुए वहां शरण ली। वहां उन्होंने लव और कुश जैसे तेजस्वी बालकों को जन्म दिया, जिन्होंने महर्षि वाल्मीकि के मार्गदर्शन में श्री राम से भी श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त किया।यहाँ महत्वपूर्ण यह है कि १४ वर्ष के वनवास और बाद में वाल्मीकि आश्रम भेजने के श्री राम के कठिन निर्णय पर भी राजा जनकने कभी कोई शिकायत या हस्तक्षेप नहीं किया। जबकि आज के समय में, यदि बेटी को ससुराल में थोड़ी सी भी समस्या होती है, तो माता-पिता तुरंत हस्तक्षेप करके उसका घर बिगाड़ देते हैं, जिसके कारण आज अदालतों में अनगिनत पारिवारिक विवाद लंबित हैं। आज के माता-पिता को राजा जनक के धैर्य को समझकर रामायण से यह सीख लेने की आवश्यकता है कि गरिमापूर्ण जीवन और सुखी संसार के लिए सामाजिक मर्यादा और विश्वास कितना अनिवार्य है।
“नहीं जाना जानकीनाथ ने, कि कल सुबह क्या होने वाला है”
श्री राम का वनवास
राजा दशरथ अब वृद्ध हो रहे थे और वे अपने ज्येष्ठ पुत्र राम का अयोध्या के राजा के रूप में राज्याभिषेक करना चाहते थे। उन्होंने ऋषि वशिष्ठ और प्रजा की सहमति लेकर राज्याभिषेक की तैयारियाँ शुरू करवा दीं। इसी समय, कैकेयी की दासी मंथराने कैकेयी के कान भरने शुरू किए। इसके परिणामस्वरूप, कैकेयीने राजा दशरथ से अपने वे दो वचन मांगे जो राजाने उसे दिए थे जिसमे पहला—राम को १४ वर्ष का वनवास और दूसरा—राम के स्थान पर भरत का राज्याभिषेक था।
सारांश
आज के समय में भी ‘अविद्या’ रूपी मंथरा जीवित है। आज भी सुखी परिवारों में कलह पैदा करनेवाले कई लोग मौजूद हैं, जो भाई-भाई, पति-पत्नी और पिता-पुत्र के बीच भेदभाव और विवाद की स्थिति उत्पन्न कर एक हँसते-खेलते परिवार को बिखेरने में संकोच नहीं करते। परिवार में होनेवाले झगड़े, छल-कपट, षड्यंत्र और ईर्ष्या जैसे दोष इसी ‘मंथरा वृत्ति’ की उपज हैं। अतः यदि हम समय रहते ऐसी मंथराओं को पहचान कर उन्हें अपने जीवन और घर से बाहर निकाल देंगे, तो व्यक्ति के जीवन में सुख-शांति की कभी कमी नहीं रहेगी।
यहाँ एक तर्क यह भी है कि यदि मंथरा न होती, तो राम केवल अयोध्या के राजा के रूप में जाने जाते; मंथरा के कारण ही वे ‘पूर्ण पुरुषोत्तम’ बन सके।
जब कैकेयीने राजा दशरथ से अपने दो वचन मांगे, तब राजा दशरथ पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। किंतु ‘रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाहुँ बरु बचन न जाई’ की परंपरा को निभाते हुए दशरथजीने राम को वन भेजने का कठिन निर्णय लिया। यह समाचार अयोध्या में वायुवेग से फैल गया और पूरी नगरी में हाहाकार मच गया। श्री राम, जो मर्यादा पुरुषोत्तम थे, पिता के वचन पालन हेतु सहर्ष वन जाने को तैयार हो गए। उनके साथ माता सीता और उनकी सेवा हेतु लक्ष्मण जी भी वन जाने के लिए तैयार हुए।
वन जाने से पहले श्री राम ने सर्वप्रथम माता कैकेयी के चरण स्पर्श किए। यह राम के चरित्र का एक उत्तम उदाहरण है—जिस कैकेयी के कारण उन्हें वनवास मिला, उन्हीं के प्रति उन्होंने अपना विवेक, त्याग और सम्मान दिखाया। यह हमें सिखाता है कि चाहे कितना भी अन्याय हो, हमें सामनेवाले के प्रति पवित्र भावना रखनी चाहिए। माता कौशल्या, सुमित्रा और गुरुजनों का आशीर्वाद लेकर वे वन की ओर निकल पड़े।
श्री राम के वन प्रस्थान के बाद भरतजीने उनकी चरण पादुकाएं मांग लीं और उन्हें सिंहासन पर रखकर अयोध्या का राजकार्य संभाला। यह प्रसंग सिखाता है कि विकट परिस्थिति में भी पिता की आज्ञा मानना एक आदर्श पुत्र (राम) का कर्तव्य है, संकट में पति का साथ देना आदर्श पत्नी (सीता) का धर्म है और भाई का साथ निभाना आदर्श भाई (लक्ष्मण) की पहचान है।
आज के समाज में संपत्ति विवाद और रामायण की प्रासंगिकता
आज देश और दुनिया में संपत्ति को लेकर अनेक परिवारों में झगड़े देखने को मिलते हैं। बात इतनी बिगड़ जाती है कि ‘जर (संपत्ति), जमीन और जोरू (पत्नी)’ को लेकर भाई ही भाई का दुश्मन बन जाता है। जहाँ आपसी समझ से बात नहीं सुलझती, वहाँ मामला अदालत तक पहुँच जाता है। आज हमारे देश में संपत्ति विवाद के इतने मामले लंबित हैं कि उन्हें सुलझने में कई साल लग जाते हैं। कई जगहों पर तो भाइयों का यह विवाद हिंसा का रूप ले लेता है। यदि व्यक्ति रामायण के आदर्शों को अपने जीवन में उतारे, तो अनेक प्रकार के सामाजिक और पारिवारिक विवाद कम हो सकते हैं।
शूर्पणखा का अपमान
शूर्पणखा कैकसी की पुत्री और रावण की बहन थी। उसके नाखून बड़े होने के कारण उसका नाम ‘शूर्पणखा’ पड़ा था। जन्म के समय शूर्पणखा का नाम मीनाक्षी था। जब शूर्पणखा चित्रकूट आती है, तब राम और लक्ष्मण पर मोहित होकर सबसे पहले राम के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखती है। परंतु राम उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं। तत्पश्चात वह लक्ष्मण के पास जाती है, लेकिन लक्ष्मण भी उसके प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं। तब शूर्पणखा विवाह के लिए दबाव बनाती है, और असफल होने पर आवेश में आकर सीताजी पर हमला करने दौड़ती है, उसी समय लक्ष्मणजी उसकी नाक काट देते हैं। लक्ष्मणजी द्वारा शूर्पणखा की नाक काटना मात्र एक सजा नहीं थी, बल्कि इसके पीछे गहरा नैतिक और आध्यात्मिक बोध छिपा है।
शूर्पणखा कामवासना का प्रतीक है। कामवासना और अनियंत्रित इच्छाएं हमेशा पतन की ओर ले जाती हैं। अपमान का बदला लेने की उसकी जिद के कारण पूरे राक्षस कुल का विनाश हुआ। वैरभाव रखने से न केवल सामनेवाले व्यक्ति का, बल्कि हमारा और हमारे परिवार का भी अहित होता है। जब कोई व्यक्ति समाज और नैतिकता की मर्यादा लांघता है, तब उसे अपमान और पतन का सामना करना पड़ता है।
इस अपमान का बदला लेने के लिए वह रावण के पास जाती है और सीताजी के रूप की प्रशंसा करके रावण को सीता-हरण के लिए उकसाती है। तब रावण साधु का वेश धारण कर चित्रकूट जाता है और सीताजी का हरण कर उन्हें लंका ले जाता है, जो अंततः उसके विनाश का कारण बनता है।
माता शबरी और मीठे बेर
सीताजी की खोज में दक्षिण की ओर बढ़ते हुए राम और लक्ष्मण मातंग ऋषि के आश्रम में पहुँचे, जहाँ वृद्ध भक्त शबरी वर्षों से उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। शबरी ने अत्यंत भक्तिभाव से राम को मीठे बेर खिलाए। यह सुनिश्चित करने के लिए कि बेर खट्टे न हों, वह प्रत्येक बेर स्वयं चखकर ही प्रभु को अर्पित कर रही थी।
सारांश
भगवान के लिए सोने के थाल या छप्पन भोग महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि अर्पण करनेवाले का भाव महत्वपूर्ण है। शबरीने बेर इसलिए चखे थे क्योंकि उसे डर था कि कहीं उसके प्रभु भूल से भी कोई खट्टा या कड़वा बेर न खा लें। यह ‘जूठा’ नहीं बल्कि ‘प्रेम से शुद्ध’ किया हुआ समर्पण था। राम एक राजकुमार और ईश्वर होने के बावजूद उन्होंने एक आदिवासी भील स्त्री के जूठे बेर बड़े चाव से खाए। यह प्रसंग सिखाता है कि भक्ति के मार्ग में जाति, वर्ण, अमीरी या गरीबी का कोई स्थान नहीं है। राम के लिए केवल ‘भक्ति’ ही सबसे बड़ा फल है।
हनुमानजी से मिलन
शबरी के मार्गदर्शन के बाद राम-लक्ष्मण ऋष्यमूक पर्वत के निकट पहुँचे। वहाँ सुग्रीवने राम-लक्ष्मण को देखकर शंका की कि वे बाली द्वारा भेजे गए सैनिक हो सकते हैं। इसलिए, उन्होंने सत्य जानने के लिए हनुमानजी को भेजा। हनुमानजीने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और राम का परिचय प्राप्त किया। जब उन्हें सत्य का पता चला, तब वे राम के चरणों में गिर पड़े और इस प्रकार भक्त और भगवान का अद्वितीय मिलन हुआ। हनुमानजी सीधे अपनी पहचान देने के बजाय ब्राह्मण का रूप लेकर गए थे। यह बोध देता है कि अनजान व्यक्ति या परिस्थिति में सावधानी रखनी चाहिए और पहले सत्य की परख करनी चाहिए। कार्य की सफलता के लिए उचित ‘रणनीति’ आवश्यक है।
हनुमानजी स्वयं अत्यंत शक्तिशाली और विद्वान थे, फिर भी राम का परिचय मिलते ही वे समस्त अभिमान त्यागकर उनके चरणों में झुक गए। सच्चा ज्ञान व्यक्ति को विनम्र बनाता है। ईश्वर के प्रति शरणागति ही भक्ति का प्रथम सोपान है। सुग्रीव डरे हुए थे, लेकिन हनुमानजी ने अपनी बुद्धि से राम-लक्ष्मण की सज्जनता को पहचान लिया था। यह प्रसंग सिखाता है कि संकट के समय घबराने के बजाय विवेकबुद्धि से काम लेना चाहिए और सच्चे सहायक की पहचान करनी चाहिए।
राम को हनुमानजी जैसा भक्त मिला और उन्होंने एक उत्तम सेवक बनकर अपना सीना चीर कर समस्त विश्व को राम-सीता के दर्शन कराए और जगत के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। आज पूरे विश्व में जहाँ भी राम मंदिर होता है, वहाँ हनुमानजी की मूर्ति भी अवश्य होती है, जो एक वफादार सेवक का श्रेष्ठ उदाहरण है। आज भी हमारे देश में राम मंदिरों की तुलना में हनुमानजी के मंदिर अधिक हैं।
लंका दहन और रामसेतु का निर्माण
हनुमानजीने राम और सुग्रीव की मित्रता करवाई। रामने अन्यायी बाली का वध कर सुग्रीव को उनका राज्य वापस दिलाया। सुग्रीवने वानर सेना को सीताजी की खोज में चारों दिशाओं में भेजा। जांबवंतने हनुमानजी को उनकी शक्तियों का स्मरण कराया और उन्हें लंका भेजा, जहाँ उन्होंने रावण की सभा में जाकर उसे समझाया, पर रावण नहीं माना और हनुमानजी की पूंछ में आग लगाने का आदेश दिया। रावण के सैनिकों ने हनुमानजी की पूंछ पर ढेर सारा कपड़ा लपेटा और तेल डाला, तब हनुमानजी अपनी पूंछ लंबी करते गए, जिससे लंका का सारा कपड़ा और तेल कम पड़ गया। अंत में, राक्षसों ने उनकी पूंछ में आग लगा दी। पूंछ में आग लगते ही हनुमानजीने लघु रूप धारण कर बंधन तोड़ दिए। फिर विशाल रूप धरकर वे लंका के एक महल से दूसरे महल पर कूदने लगे। सोने की लंका धू-धू कर जलने लगी। हनुमानजीने केवल विभीषण के घर को छोड़कर (जहाँ तुलसी का पौधा और हरि नाम था) पूरी लंका भस्म कर दी। अंत में समुद्र में पूंछ डुबोकर आग बुझाई और सीताजी की आज्ञा लेकर वापस लौट आए। दूसरी ओर, सुग्रीव की वानर सेना ने समुद्र पर “राम” नाम लिखे हुए पत्थर डाले जो तैरने लगे और रामसेतु का निर्माण हुआ। राम की सेना लंका पहुँची और भीषण युद्ध हुआ, जिसमें कुंभकर्ण और मेघनाद जैसे योद्धा मारे गए।
राम-रावण युद्ध और मंदोदरी का बोध
रावण एक विद्वान ब्राह्मण था। उसमें दस सिरों जितना बल था, इसलिए उसे ‘दशानन’ कहा जाता था। वह भगवान शंकर का परम उपासक था और चारों वेदों का ज्ञाता था। जब रावण ने सीताजी का अपहरण किया, तब रावण की पत्नी मंदोदरी ने इसका कड़ा विरोध किया था। मंदोदरी असुर शिल्पी मयासुर और अप्सरा हेमा की पुत्री थीं। उन्होंने रावण से बार-बार विनती की थी कि सीताजी को सम्मानपूर्वक भगवान राम को सौंप देना चाहिए, ताकि लंका का विनाश न हो।
रावण जैसे अहंकारी राजा की पत्नी होने के बावजूद, वे हमेशा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलीं। रावण की अनेक गलतियों के बाद भी, मंदोदरी ने एक पत्नी के रूप में अपना कर्तव्य निभाया। उन्होंने रावण को गलत मार्ग पर जाने से रोकने के अथक प्रयास किए, लेकिन रावण के अहंकार के कारण वे सफल नहीं हुईं।
मंदोदरी के जीवन से हमें यह अमूल्य सीख मिलती है कि भले ही आपके सामने खड़ा व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि वह गलत है, तो उसे टोकना और सही मार्ग दिखाना हमारा कर्तव्य है। अधर्मी वातावरण में रहकर भी खुद को धर्म के मार्ग पर कैसे अडिग रखा जा सकता है, यह मंदोदरी से सीखा जा सकता है।
राम-रावण युद्ध का अंत और लक्ष्मण को ज्ञान
राम और रावण के बीच भीषण युद्ध होता है। जब रावण मृत्यु के समीप होता है, तब राम लक्ष्मण से कहते हैं, “दुनिया का महान ज्ञानी और भगवान शंकर का भक्त इस पृथ्वी से विदा ले रहा है, उनसे ज्ञान प्राप्त कर लो।” तब लक्ष्मण रावण के सिर के पास जाकर खड़े हो जाते हैं। रावण कहता है कि यदि ज्ञान प्राप्त करना हो, तो मेरे चरणों के पास आओ। तब लक्ष्मण रावण के चरणों के पास जाते हैं और ज्ञान प्राप्त करते हैं। अंत में रावण देह त्याग देता है और विभीषण को लंका का राजा बनाया जाता है।युद्ध समाप्त होने के बाद राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या वापस लौटते हैं। 14 वर्ष का वनवास पूर्ण करने के बाद वे अयोध्या का राजकार्य संभालने लगते हैं। प्राचीन काल में हिंदू राजा युद्ध में किसी भी देश को जीतते थे, तो उसे वहाँ के उत्तराधिकारी या राजा को वापस कर देते थे। इसी प्रकार, लंका जीतने के बाद राम ने लंका का राज्य विभीषण को सौंप दिया।
सीताजी की अग्नि परीक्षा
सीताजी की अग्नि परीक्षा रामायण का सबसे संवेदनशील और गहन बोध देने वाला प्रसंग है। लंका विजय के बाद जब श्री राम और सीताजी का मिलन हुआ, तब यह घटना घटी। रावण के वध के पश्चात विभीषण सीताजी को आदरपूर्वक श्री राम के समक्ष लाए। परंतु, श्री राम ने सीताजी को स्वीकार करने से पहले सामाजिक मर्यादा और लोक-अपवाद को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए कहा। श्री राम के इन कठोर वचनों को सुनकर सीताजी अत्यंत दुखी हुईं, किंतु उन्होंने धर्म का पालन करने का निर्णय लिया और उन्होंने अग्निदेव से प्रार्थना की, “यदि मैं मन, वचन और कर्म से श्री राम के प्रति पवित्र हूँ, तो यह अग्नि मेरी रक्षा करे।” जब सीताजीने अग्नि में प्रवेश किया, तब अग्निदेव स्वयं प्रकट हुए और सीताजी को सुरक्षित बाहर लाए, और यह साक्ष्य दिया कि माता सीता परम पवित्र हैं। श्री राम जानते थे कि सीताजी पवित्र हैं, लेकिन एक राजा के रूप में उन्होंने प्रजा के मन में कोई शंका न रहे, इसलिए यह कठोर निर्णय लिया था। यह ‘राजधर्म’ का उत्तम उदाहरण है।
सीताजी ने आरोपों के विरुद्ध लड़ने के बजाय शांति और धैर्य से अपनी निर्दोषता सिद्ध की। यह स्त्री शक्ति और सहनशीलता का प्रतीक है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि रावण जिस सीताजी का हरण कर ले गया था, वह ‘माया द्वारा रचित सीता’ थीं, और अग्नि परीक्षा के माध्यम से असली सीताजी अग्नि से पुनः प्रकट हुईं।
सीताजी का त्याग और वाल्मीकि आश्रम
अयोध्या लौटने के बाद सीताजी का त्याग और उनका वाल्मीकि आश्रम जाना रामायण का अत्यंत करुण और गंभीर प्रसंग है। श्री राम के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में सुख-शांति थी। परंतु एक दिन श्री राम को ज्ञात हुआ कि नगर का एक धोबी अपनी पत्नी के चरित्र पर संदेह कर उसे दुत्कार रहा था और रावण की लंका में रहकर आई सीताजी की पवित्रता पर परोक्ष रूप से प्रश्न उठा रहा था।
श्री राम जानते थे कि सीताजी परम पवित्र हैं, परंतु एक ‘आदर्श राजा’ के रूप में प्रजा के मन में अपने कुल या रानी के प्रति कोई संदेह रहे, यह उन्हें स्वीकार नहीं था। प्रजा के संतोष और ‘राजधर्म’ निभाने के लिए रामने भारी मन से सीताजी का त्याग करने का निर्णय लिया। लक्ष्मणजी सीताजी को रथ में बैठाकर गंगा किनारे ले गए और राम की आज्ञा बताई। सीताजी स्तब्ध रह गए, परंतु उन्होंने राम के निर्णय को स्वीकार किया और महर्षि वाल्मीकि के आश्रम चले गए,जहाँ उन्होंने लव और कुश जैसे तेजस्वी बालको को जन्म दिया। सीताजी सुबह जल्दी उठकर आश्रम के सभी कार्य जैसे रसोई के लिए लकड़ियाँ चुनना, कपड़े धोना और गायों को घास डालना जैसे सभी कार्य करते थे।
सीता त्याग का बोध
राजा के लिए सुख-सुविधा से ऊपर प्रजा का विश्वास और मर्यादा सर्वोपरि होती है। राम ने अपने व्यक्तिगत प्रेम की तुलना में कर्तव्य को अधिक महत्व दिया। सीताजीने बिना किसी शिकायत के इस अन्याय को सहा और आश्रम में रहकर अपने पुत्रों को श्रेष्ठ संस्कार दिए। वह आत्मनिर्भरता और दृढ़ता की प्रतीक हैं। जीवन में चाहे कितना भी सुख हो, अचानक दुख आ सकता है, परंतु उस समय भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
अश्वमेध यज्ञ
श्री रामने साम्राज्य विस्तार और धर्म की स्थापना के लिए अश्वमेध यज्ञ किया और एक सुसज्जित घोड़ा (श्यामकर्ण अश्व) घूमने के लिए छोड़ा। इस घोड़े की रक्षा के लिए शत्रुघ्न एक बड़ी सेना के साथ थे। घूमते-घूमते यह घोड़ा महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के पास पहुँचा। वहाँ खेल रहे लव और कुश ने राजसी ठाठ देखकर उस घोड़े को पकड़ लिया और आश्रम के एक वृक्ष से बांध दिया। जब सैनिकों ने घोड़ा छोड़ने के लिए कहा, तब कुमारों ने युद्ध करने का निर्णय लिया। सबसे पहले शत्रुघ्न के साथ और उसके बाद लक्ष्मण तथा भरत के साथ युद्ध हुआ, जिसमें लव-कुश ने उन्हें भी मूर्छित कर दिया। अंत में स्वयं श्री राम रणभूमि में आए। राम समझ नहीं पा रहे थे कि ये दो छोटे बालक इतने शक्तिशाली कैसे हैं। युद्ध के दौरान जब राम मंत्रमुग्ध होकर उन्हें देख रहे थे, तभी सीताजी और महर्षि वाल्मीकि वहाँ पहुँचे और सत्य प्रकट किया कि ये राम के ही पुत्र हैं।
कभी-कभी हम जिनसे लड़ रहे होते हैं, वे हमारे अपने ही होते हैं। क्रोध या युद्ध करने से पहले सत्य को जानना अत्यंत आवश्यक है।
सीताजी का धरती में समाना
सीताजी का धरती में समाना रामायण का सबसे भावुक और अंतिम प्रसंग है। जब लव और कुश ने अयोध्या में रामायण का गान किया और राम को सत्य का पता चला, तब राम ने सीताजी को पुनः सभा में बुलाया। श्री राम ने सीताजी से सभा में आकर एक बार फिर अपनी पवित्रता सिद्ध करने के लिए कहा, ताकि प्रजा के मन में कोई शंका न रहे। सीताजी सभा में आईं, लेकिन इस बार उनका हृदय ग्लानि और दुख से भरा हुआ था। उन्होंने बार-बार अपनी पवित्रता की परीक्षा देने के बजाय इस संसार का त्याग करने का निर्णय लिया। सीताजी ने हाथ जोड़कर अपनी माता पृथ्वी से प्रार्थना की, “हे माता ! यदि मैं मन, वचन और कर्म से केवल श्री राम को ही चाहती हूँ और यदि मैं पवित्र हूँ, तो अपनी गोद में मुझे स्थान दो और मुझे स्वयं में समाहित कर लो।” सीताजी की यह प्रार्थना सुनते ही धरती फट गई और उसमें से एक भव्य सिंहासन प्रकट हुआ, जिस पर धरती माता विराजमान थीं। उन्होंने सीताजी को अपनी गोद में बैठाया और सीताजी सदेह धरती में समा गईं। श्री राम उन्हें रोकने के लिए दौड़े, लेकिन तब तक सीताजी धरती में विलीन हो चुकी थीं।
सीता त्याग और आत्मसम्मान का बोध
सीताजीने यह दर्शाया कि प्रेम चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, जब बार-बार चरित्र पर प्रश्न उठाए जाते हैं, तब आत्मसम्मान की रक्षा के लिए कठोर निर्णय लेना आवश्यक हो जाता है। सीताजीने एक पत्नी और माता के रूप में अपने सभी कर्तव्यों को पूर्ण किया था, इसलिए उन्होंने परमधाम जाने का विकल्प चुना। पृथ्वी के समान धैर्य रखने वाला व्यक्ति भी जब अन्याय की सीमा पार होते देखता है, तब वह विलीन हो जाता है।
श्री राम का महाप्रयाण
सीताजी के पृथ्वी में समा जाने के बाद, श्री राम अत्यंत शोकग्रस्त रहने लगे। उन्होंने कुछ समय तक शासन किया और फिर लव-कुश को राजगद्दी सौंप दी। जब श्री राम के अवतार का कार्य पूर्ण हुआ, तब काल (यमराज) एक तपस्वी के वेष में अयोध्या आए। उन्होंने राम के साथ एकांत में वार्ता करने की शर्त रखी कि, “हमारी बातचीत के दौरान जो कोई भी अंदर आएगा, उसे मृत्युदंड मिलेगा।” राम ने लक्ष्मणजी को द्वारपाल के रूप में खड़ा कर दिया। उसी समय दुर्वासा ऋषि वहाँ आए और तुरंत राम से मिलने की जिद करने लगे। उन्होंने धमकी दी कि यदि उन्हें मिलने नहीं दिया गया, तो वे पूरी अयोध्या को श्राप दे देंगे। अयोध्या को बचाने के लिए लक्ष्मणजीने अपने जीवन का बलिदान देने का निर्णय लिया और वे सभा में प्रविष्ट हुए। शर्त के अनुसार, लक्ष्मणजी ने सरयू नदी में जाकर देह त्याग दिया (वे शेषनाग का रूप धरकर वैकुंठ चले गए)।
लक्ष्मणजी के जाने के बाद श्री रामने भी संसार छोड़ने का निर्णय लिया। वे अयोध्या के समस्त भक्तों, हनुमानजी और परिवार के साथ सरयू नदी के तट पर गए। श्री राम ने मंत्रोच्चार के साथ सरयू के जल में प्रवेश किया और अपने वास्तविक स्वरूप भगवान विष्णु में विलीन हो गए। उनके साथ भरत और शत्रुघ्न भी परमधाम सिधार गए।
इस संसार में जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। ईश्वर भी जब मनुष्य देह धारण करते हैं, तब उन्हें भी समय की मर्यादा का पालन करना पड़ता है। लक्ष्मणजी ने अयोध्या के कल्याण के लिए अपने प्राणों का त्याग किया, जो बलिदान का सर्वोच्च उदाहरण है। रामायण की पूर्णाहुति सिखाती है कि पृथ्वी पर जीवन एक मिशन (कार्य) है। कार्य पूर्ण होने के बाद जीवात्मा को परमात्मा में मिल जाना होता है।
आदिकवि वाल्मीकि और रामायण
महर्षि वाल्मीकि ने भगवान श्री राम के जीवन पर आधारित प्रथम महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना की। रामायण के रचयिता होने के कारण उन्हें ‘आदिकवि’ के रूप में भी जाना जाता है।
रामायण की यह संपूर्ण यात्रा हमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के जीवन दर्शन और उनके आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा देती है।
II जय श्री राम II


